PoK Independence Protest: पाकिस्तान के भीतर से आ रही बगावत और जंग की लपटों ने जिन्ना के बनाए मुल्क के वजूद पर अब तक का सबसे बड़ा संकट खड़ा कर दिया है. एक तरफ जहां बलूचिस्तान के भीतर से खुद को पाकिस्तान से पूरी तरह ‘आजाद’ घोषित करने और समानांतर हुकूमत चलाने की खबरों ने इस्लामाबाद को हिलाकर रख दिया है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान के नाजायज कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में भी आजादी का महा-संग्राम अपने चरम पर पहुंच चुका है. दशकों के दमन और बर्बरता के खिलाफ पीओके के नागरिकों का सब्र अब पूरी तरह टूट गया है.
बलूचिस्तान की आजादी के ऐलानिया उद्घोष के बाद अब पीओके में पाकिस्तानी रेंजर्स और सुरक्षा बलों द्वारा की गई अंधाधुंध फायरिंग में 7 निर्दोष कश्मीरियों की मौत ने आग में घी डालने का काम किया है. इस जघन्य हत्याकांड के बाद पूरे मुज़फ्फराबाद और रावलाकोट में जनता का आक्रोश फूट पड़ा है और पाकिस्तान के जुल्म के खिलाफ एक ऐसी सामूहिक बगावत शुरू हो गई है.
पाकिस्तानी सेना और अर्धसैनिक बलों (रेंजर्स) ने प्रदर्शनकारियों को कुचलने के लिए सीधे सीने और सिर को निशाना बनाकर गोलियां चलाईं, जिसमें 7 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई. इस गोलीबारी में 5 बहनों के इकलौते भाई वाजिद हयात की भी मौत हो गई. लेकिन इस बर्बरता के आगे घुटने टेकने के बजाय, वाजिद की बहनों ने पूरे पीओके के लिए एक ऐसा ऐतिहासिक पैगाम भेजा जिसने आंदोलनकारियों के सीने में आजादी की आग जला दी है.
वाजिद की बहनों ने फख्र से कहा कि उनके भाई ने अपने बुनियादी हकों और कौम की आजादी के लिए शहादत दी है. इसलिए जब तक असली मकसद पूरा नहीं हो जाता और पाकिस्तानी सेना को खदेड़ नहीं दिया जाता, तब तक एक भी कश्मीरी पीछे नहीं हटेगा. धरने के बीच जब 5 बहनों के इस खौफनाक जज्बे वाले पैगाम को लाउडस्पीकर पर पढ़कर सुनाया गया, तो पूरा मुज़फ्फराबाद ‘आजादी’ के नारों से गूंज उठा. प्रदर्शनकारियों ने साफ कर दिया है कि उनके भाइयों का खून बेकार नहीं जाएगा.
पाकिस्तानी हुकूमत ने सोचा था कि 7 हत्याओं के बाद लोग खौफ के मारे घरों में छुप जाएंगे, लेकिन इसका उल्टा असर हुआ है. बलूचिस्तान द्वारा खुद को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में रेखांकित करने वाली खबरों से उत्साहित होकर, पीओके की जनता ने आज आर-पार की जंग का ऐलान कर दिया है. आज सुबह ठीक 11 बजे मुजफ्फराबाद और रावलाकोट की मुख्य सड़कों पर लाखों लोगों का हुजूम ‘महा-मार्च’ के लिए निकला.
स्थानीय नेताओं के मुताबिक, यह मार्च केवल बिजली बिल या आटे की सब्सिडी के लिए नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के दमन के खिलाफ एक खुला विद्रोह है. पूरे इलाके को पूरी तरह से बंद कर दिया गया है और जनता पाकिस्तानी चौकियों को उखाड़ फेंकने के लिए आगे बढ़ रही है.
बलूचिस्तान में चल रहे मुक्ति संग्राम और पीओके के मुज़फ्फराबाद-रावलाकोट में 7 कश्मीरियों के कत्लेआम के बाद पैदा हुए हालात ने पाकिस्तान को एक बार फिर 1971 के उस मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है, जब पूर्वी पाकिस्तान टूटकर बांग्लादेश बन गया था. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की लाचार असैन्य सरकार और रावलपिंडी के जीएचक्यू (GHQ) में बैठे सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के पास अब इस बगावत का कोई कूटनीतिक या प्रशासनिक जवाब नहीं बचा है.
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बंदूक की नोक पर बलूच और कश्मीरी आवाम को बंधक बनाकर रखने का पाकिस्तान का 77 साल पुराना ढोंग अब अंतिम सांसें गिन रहा है. अगर बलूचिस्तान और पीओके का यह आक्रोश इसी तरह संयुक्त रूप से बढ़ता रहा, तो बहुत जल्द दुनिया के नक्शे से पाकिस्तान का भूगोल पूरी तरह बदलने वाला है.
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