India-Pakistan relations after Tarique Rahman: बांग्लादेश की राजनीति में 17 साल के लंदन निर्वासन के बाद तारिक रहमान की वापसी और बीएनपी की प्रचंड जीत ने देश को नया मोड़ दे दिया है. अभी तक के अनऑफिशियल नतीजों (Bangladesh Elections 2026 result) में बीएनपी ने 151 सीटों का पूर्ण बहुमत पार कर लिया है. मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार जल्द सत्ता ट्रांसफर कर सकती है. तारिक रहमान अब बांग्लादेश के अगले प्रधानमंत्री बनने की दहलीज पर खड़े हैं. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि ‘न दिल्ली, न पिंडी… सबसे पहले बांग्लादेश’ कहने वाले तारिक के नेतृत्व में भारत और पाकिस्तान के साथ रिश्ते कैसे होंगे?
दरअसल जनवरी में चुनाव अभियान के दौरान सिलहट रैली के दौरान तारिक रहमान ने जोरदार नारा दिया कि “न दिल्ली, न पिंडी…सबसे पहले बांग्लादेश”. इस नारे के जरिए उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि उनकी प्राथमिकता हमेशा देश की हितों और स्वायत्तता होगी. इससे तारिक ने विदेश नीति पर भी अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए इशारा कर दिया कि भारत के साथ संबंध बराबरी और आपसी सम्मान पर आधारित होंगे, जिससे दोनों देशों के बीच संतुलित और स्थिर रिश्ते बने रहेंगे.
इसके अलावा, तारिक ने दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) को फिर से सक्रिय करने और ASEAN की सदस्यता प्राप्त करने की दिशा में काम करने की योजना भी साझा की थी. पाकिस्तान के साथ मेल-मिलाप और संवाद कायम रखने पर भी उन्होंने जोर दिया, ताकि क्षेत्र में स्थिरता और सहयोग बढ़ सके. यह रुख संकेत देता है कि उनका मंत्र हमेशा ‘बांग्लादेश पहले, फिर सहयोग और संतुलन’ रहेगा, जिससे देश की स्वतंत्र विदेश नीति और क्षेत्रीय कूटनीति मजबूत बनेगी.
बताते चलें कि BNP की जीत और रहमान की वापसी को भारत न तो संकट मानेगा, न ही जश्न का मौका. यह एक तरह से यह भारत के लिए टेस्ट केस होगा. भारत के लिए सुरक्षा सहयोग, विदेश नीति का संतुलन और आर्थिक साझेदारी तय करेंगे कि बांग्लादेश की नई सरकार के साथ उसके रिश्ते किस दिशा में जाते हैं. अगर रहमान सरकार दिल्ली को भरोसा दे पाती है, तो भारत जरूर बांग्लादेश से सहयोग बढ़ाएगा. बता दें कि भारत पूरी तरह से प्रैक्टिकल होकर अपने विकल्पों को तौलेगा और आगे के फैसलों को लेगा.
कुल मिलाकर बांग्लादेश-भारत रिश्तों(India-Bangladesh Relations) के मौजूद हालातों को देखते हुए बात करें तो भले ही ऐतिहासिक रूप से BNP के नेत्रत्व में दिल्ली के रिश्ते सहज नहीं रहे हों, फिर भी मौजूदा परिदृश्य में भारत उसे अपेक्षाकृत नरम और लोकतांत्रिक विकल्प के तौर पर देखने लगा है. शेख हसीना की अवामी लीग पहले ही राजनीतिक दौड़ से बाहर हो चुकी थी. इसलिए नई दिल्ली की उम्मीद यही रही कि रहमान के नेतृत्व में BNP सरकार में वापसी करे. अंततः वही हुआ. इस स्थिति में भारत के सामने यही विकल्प था कि कम नुकसानदेह वाले रास्ता को चुनना था.
पाकिस्तान के लिए तारिक की वापसी मिला-जुला मौका है. बीएनपी का पाकिस्तान से पुराना रिश्ता रहा है. जियाउर रहमान के समय और खालिदा जिया के दौर में पाकिस्तान समर्थक जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन हुआ. लेकिन तारिक का ‘न दिल्ली, न पिंडी’ नारा और जमात-ए-इस्लामी को दुश्मन बताना पाकिस्तान के असर को कम कर सकता है.
अगस्त 2024 में शेख हसीना के हटने के बाद मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारे थे. दोनों देशों के सैन्य और राजनीतिक अधिकारी एक-दूसरे के देश गए. समुद्र के रास्ते सीधा व्यापार शुरू हुआ. पाकिस्तान से फाइटर जेट और सैन्य उपकरण खरीदने की बात हुई. लेकिन तारिक के आने से यह सब बदल सकता है. तारिक ने 1971 के इतिहास और पाकिस्तान समर्थक ताकतों पर निशाना साधा है.
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-भारत एक्सप्रेस
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