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India vs China Manufacturing: भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है और इस यात्रा की रीढ़ मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर है. ‘मेक इन इंडिया’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘PLI स्कीम’ जैसी पहलों ने देश के औद्योगिक ढांचे में नई ऊर्जा भरी है. जब गाड़ियां, इलेक्ट्रॉनिक्स और परिधान देश के भीतर बनते हैं, तो न केवल आयात बिल घटता है, बल्कि लाखों युवाओं को रोजगार मिलता है और विदेशी मुद्रा का संचय होता है. हालांकि, दुनिया का अगला ‘ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब’ बनने की इस दौड़ में भारत के सामने कई अवसर और चुनौतियां दोनों मौजूद हैं.
ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनने का सपना संभव है, लेकिन इसके लिए केवल घरेलू बाजार पर निर्भर रहने के बजाय निर्यात-उन्मुख (Export-Oriented) बनना होगा. सेमीकंडक्टर जैसी अत्याधुनिक तकनीकों के साथ-साथ कपड़ा और जूता उद्योग जैसे श्रम-गहन (Labor-Intensive) क्षेत्रों को प्रोत्साहन देना आवश्यक है. यदि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर श्रम और भूमि सुधारों को सुगमता से लागू करें और MSMEs को प्रतिस्पर्धी बनाएं, तो भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का प्रमुख केंद्र बन सकता है.
वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट में भारत की हिस्सेदारी लगभग 2% है और वह दुनिया का 5वां सबसे बड़ा उत्पादक देश है. इसके विपरीत, चीन को ‘वर्ल्ड की फैक्ट्री’ कहा जाता है, जिसकी वैश्विक उत्पादन में 30% हिस्सेदारी है. चीन का औद्योगिक उत्पादन $4.5 ट्रिलियन से अधिक है, जबकि भारत का दायरा लगभग $500 अरब का है—अर्थात चीन का उत्पादन भारत से लगभग नौ गुना बड़ा है. यद्यपि रातों-रात इस अंतर को पाटना संभव नहीं है, लेकिन वैश्विक कंपनियों की ‘चीन + 1’ नीति और अमेरिका-चीन व्यापार तनाव भारत के लिए नए अवसर पैदा कर रहे हैं.
मैन्युफैक्चरिंग का सीधा संबंध ऊर्जा सुरक्षा से है. भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है. वैश्विक राजनीति और अमेरिकी नीतियों (जैसे कि रूसी तेल पर टैरिफ से जुड़े कानून) का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. कच्चे तेल के महंगे होने से माल ढुलाई, बिजली और कच्चे माल की दरें बढ़ जाती हैं, जिससे भारतीय उत्पादों की लागत चीन, वियतनाम और बांग्लादेश की तुलना में बढ़ जाती है. तेल आयात में भारी विदेशी मुद्रा खर्च होने से बुनियादी ढांचे और R&D में निवेश के लिए पूंजी सीमित हो जाती है.
बीते दशक में भारत ने ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को बेहतर बनाने के लिए कई ढांचागत बदलाव किए हैं. 14 से अधिक प्रमुख सेक्टरों के लिए शुरू की गई PLI योजनाओं के चलते भारत आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता बन चुका है और आईफोन असेंबलिंग में बड़ी हिस्सेदारी हासिल कर रहा है. इसके साथ ही एक्सप्रेस-वे, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, नए बंदरगाहों और ‘पीएम गतिशक्ति’ योजना के माध्यम से लॉजिस्टिक्स को रफ्तार दी जा रही है. सेमीकंडक्टर और चिप मैन्युफैक्चरिंग में भारी निवेश भविष्य की तकनीकों के लिए नींव तैयार कर रहा है.
जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग का योगदान लंबे समय से 16-17% पर स्थिर है. इसके पीछे मुख्य रूप से चार कारण हैं:
सरकार का लक्ष्य जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा बढ़ाकर 25% करना है. विशेषज्ञों के अनुसार, यदि भारत 10% की वार्षिक औद्योगिक वृद्धि दर बनाए रखता है, तो 2035 से 2040 के बीच इस लक्ष्य को पाया जा सकता है. आगामी 5 वर्षों में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, रक्षा और फार्मास्यूटिकल्स में वैश्विक सप्लाई हब बनने की क्षमता रखता है.
-भारत एक्सप्रेस
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