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इतिहास की वो गलती जिसको लेकर रूस आज भी करता है अफसोस! रूस ने कैसे गंवा दिया था अलास्का?

यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने शुक्रवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की. इस मुलाकात में दोनों के बीच यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे युद्ध को खत्म करने को लेकर बातचीत हुई. हालांकि इस बातचीत का कोई हल नहीं निकल पाया, लेकिन इसी बीच इस मुलाकात को लेकर अलास्का एक बार फिर चर्चा में आ गया. क्या आपको पता है कि अलास्का कभी रूस का हिस्सा हुआ करता था. जिसे रूस ने 1867 में अमेरिका को बेच दिया था.

चौंक गए ना लेकिन ये सच है. यह एक ऐसा सच है जिसे आज भी रूस के नेता एक बड़ी ऐतिहासिक गलती मानते हैं. आइये बताते हैं कि आखिर रूस ने किन वजहों से अलास्का को अमेरिका के हाथों बेच दिया और आज भी रूस इसे क्यों ऐतिहासिक भूल मानता है.

1720 से शुरू होती है कहानी

यह बात 1720 की है. रूस के सम्राट पीट द ग्रेट ने कुछ रूसी खोजकर्ताओं को नए क्षेत्रों की खोज पर भेजना शुरू किया. इसी अभियान के दौरान कुछ रूसी खोजकर्ता एशिया और उत्तरी अमेरिका को जोड़ने वाले संकरे जलडमरूमध्य को पार कर मौजूदा अलास्का पहुंचे और उसे रूसी क्षेत्र घोषित कर दिया.

समुद्री उदबिलाव की खाल इकठ्ठा करने की होड़

अलास्का यूनिवर्सिटी एंकरेज के प्रोफेसर और इतिहासकार पियर्स बैटमैन ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि शुरुआती रूसी खोजकर्ताओं में नए क्षेत्रों को खोजने के लिए काफी मारामारी वाला माहौल था. वो अलेउतियन द्वीपों और आसपास के इलाकों में समुद्री उदबिलाव की खाल इकठ्ठा करने की होड़ में लगे हुए थे. जिसकी चीन में बहुत मांग थी.

प्रोफेसर बैटमैन बताते हैं कि रूसी खोजकर्ताओं ने इस अंधी दौड़ में स्थानीय आदिवासियों पर जमकर अत्याचार किये.

रूसी खोजकर्ताओं ने जमकर किये अत्याचार

वहीं अलास्का के इतिहासकार और पूर्व डेमोक्रेटिक सीनेटर विलियम एल इग्गिआग्रुक हेंस्ले के मुताबिक, रूसी खोजकर्ताओं ने वहां पहुंचकर स्थानीय आदिवासी नेताओं के बच्चों का अपहरण करना शुरू कर दिया और उनकी नावें और शिकार के औजारों को नष्ट कर दिया.

1799 में रूसी साम्राज्य बसाने लगा बस्तियां

समय के साथ रूस का अलास्का में आर्थिक तौर पर आकर्षण घटने लगा. 1799 में रूसी साम्राज्य ने फर व्यापार को सही तरीके से संचालित करने और वहां स्थायी बस्तियां बसाने के लिए रूसी-अमेरिकन कंपनियों को काम पर लगाना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे यह व्यापार कैलिफोर्निया तक फैल गया.

फर व्यापार बन गया घाटे का सौदा

रूसी-अमेरिकन कंपनियों ने वहां इतना ज्यादा शिकार कर दिया कि फर व्यापार घाटे का सौदा बन गया. जिसकी वजह से रूसी, अमेरिकी और ब्रिटिश फर व्यापारियों में तनाव भी बढ़ने लगा, क्योंकि दोनों देशों की सीमाएं और शिकार के क्षेत्र स्पष्ट नहीं थे. इसके अलावा अलास्का में रूस की कम बस्तियां मौजूद थी. जिसकी वजह से उनकी सुरक्षा भी वहां कमजोर थी.

भू-राजनीतिक कारण बनी बिक्री की मुख्य वजह

अलास्का पर नियंत्रण के बाद रूस के लिए भू-राजनीति चुनौतियां बेहद जटिल हो गईं. इसमें कई कारण थे. जिसमें व्यापार और युद्ध महत्वपूर्ण भूमिका निभाए.

1. व्यापार

रूस अपने सुदूर पूर्वी इलाकों में अपने साम्राज्य को विस्तार देना चाहता था. जिसको लेकर वो अलास्का तक पहुंचा, लेकिन सीमा निर्धारण नहीं होने की वजह से रूस और ब्रिटेन के बीच तनाव फैल गया था.
2. युद्ध

1853 में जब रूस ने ब्रिटेन फ्रांस और आटोमन साम्राज्य से क्रीमिया में लड़ाई करना शुरू कर दिया. तब रूसी अधिकारियों को ये चिंता सताने लगी कि कहीं ब्रिटिश फौजें उतत्री अमेरिका से रूस के सुदूर पूर्व पर हमला ना कर दें. जिसका खतरा बढ़ता ही जा रहा था.

लड़ाई खत्म होने के बाद भी रूस को हमेशा प्रशांत महासागर में ब्रिटेन की मौजूदगी को लेकर भय था. उसे यह भी संदेह था कि अलास्का पर अमेरिकी फौजें हमला कर सकती हैं. क्योंकि 1853 तक अमेरिका ने टेक्सस को भी अपने साम्राज्य में जोड़ चुका था और कैलिफोर्नियां जहां तक रूसी कंपनियां अपने फर व्यापार को लेकर पहुंच चुकी थी उसे भी अमेरिका ने मैक्सिको से युद्ध कर उसे हासिल कर चुका था.

“मैनिफेस्ट डेस्टिनी” का अमेरिका में माहौल

उस समय अमेरिका में “मैनिफेस्ट डेस्टिनी” यानी अमेरिका का पूरे महाद्वीप पर कब्जे का विचार चर्चा में था. इन तमाम परिस्थितियों को देखते हुए रूसी अधिकारियों जिसमें प्रशांत महासागर के बेडे़ के कमांडर भी शामिल थे. रूसी नेताओं को अलास्का बेच देने की सलाह दी.

ये भी पढ़ें- अलास्का में ट्रंप-पुतिन मुलाकात के क्या हैं मायने? पुतिन के लिए यह मुलाकात क्यों मानी जा रही बड़ी कूटनीतिक राहत?

दोनों पक्षों के लिए था फायदे का सौदा

औबर्न यूनिवर्सिटी के इतिहासकार डॉ. ली फैरो बताते हैं कि, रूस के लिए परिस्थितियां जटिल हो रही थी. इसलिए कूटनीतिक माहौल में यह बिक्री के लिए सही समय था. दूसरी तरफ अमेरिका और रूस के बीच अच्छे संबंध बन रहे थे. दोनों के बीच व्यापार भी बढ़ रहा था. दोनों ही देश उस समय की महाशक्ति ब्रिटेन से दूर जा रहे थे.

मार्च 1867 में अमेरिकी विदेश मंत्री विलियम हेनरी स्यूवर्ड ने रूस को एक पेशकश की. उन्होंने रूस के मंत्री एडुआर्ड स्टॉकल को अलास्का के लिए 5 मिलियन डॉलर में सौदा करने की पेशकश की.

इसके दो हफ्ते बाद ही रूस ने अमेरिका के साथ 7.2 मिलियन डॉलर में अलास्का को बेचने पर सहमती दे दी. यानी प्रति एकड़ दो सेंट से भी कम. इसे कांग्रेस और जार अलेक्जेंडर द्वितीय ने मंजूरी दे दी.

हालांकि इसको लेकर दोनों देशों में तनातनी भी हुई. अमेरिका ने रकम का भुगतान देर से किया. इस दौरान आरोप लगे कि राजनेताओं और पत्रकारों को रिश्वत के रूप में कुछ हिस्सेदारी दी गई.

इन्हीं आलोचकों में से एक थे “स्यूवर्ड फॉली”. जिन्होंने आरोप लगाया कि एक जमी हुई वीरान जमीन लेने में क्या ही फायदा होगा.

अलास्का को लेकर रूस आज भी करता है अफसोस

इतिहासकार माइकल ए हिल की स्टडी के मुताबिक, यह विरोध कुछ चंद अखबार ही कर रहे थे. बहुत से अमेरिकी अलास्का के प्राकृतिक संसाधनों को लेकर बेहद ही उत्साहित थे.

बाद में अलास्का में सोना, लकड़ी और पेट्रोलियम जैसे संसाधन मिले. जिसके बाद अमेरिका के लिए यह सौदा एक सोने की खान के जैसा साबित हुआ. 1959 में अमेरिका ने अलास्का को 49वें राज्य के रूप में मान्यता दी.

– भारत एक्सप्रेस

Govind Kumar Singh

मैं गोविंद सिंह हूं और मूल रूप से बिहार के कैमूर की पहाड़ियों वाले इलाके से आता हूं। मेरी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई वाराणसी के उदय प्रताप कॉलेज से हुई। इसके बाद मैंने पटना कॉलेज, पटना से मास कम्यूनिकेशन में ग्रेजुएशन किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने करियर की शुरुआत की और अलग-अलग संस्थानों में काम करते हुए खबरों की दुनिया को करीब से समझा। अपने पेशेवर सफर में मुझे ईटीवी भारत, इनशॉर्ट्स और श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन जैसे संस्थानों के साथ काम करने का अवसर मिला। इन जगहों पर काम करते हुए मैंने रिपोर्टिंग, कंटेंट लेखन, रिसर्च और समाचारों की प्रस्तुति से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातें सीखीं। फिलहाल मैं भारत एक्सप्रेस में सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हूं। यहां मेरी मुख्य रुचि विदेश, राजनीति और बिहार से जुड़ी खबरों को कवर करने में है।

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