सोचिए कि आप जल्दी में हैं और एक कौवे को बेरुखी से भगा देते हैं. सुनने में तो यह बात बिलकुल नॉर्मल लगती है. पर साइंस इसे नॉर्मल नहीं मानता है.
अमेरिका के वाशिंगटन विश्वविद्यालय के अनुसार, इस घटना की वजह से हो सकता है कि आपने कौवे के रूप में एक ऐसा ख़तरनाक दुश्मन बना लिया है जो लगभग दो दशकों तक आपसे दुश्मनी पाल सकता है. इसलिए अगर वह हर बार आपको देखने पर आक्रामक रूप से चीख़े और उसके झूंड के और दोस्त भी, जो अब आपसे उतनी ही नफ़रत करते हैं, तो हैरान न हों.
वाशिंगटन यूनिवर्सिटी (Washington University) के शोधकर्ताओं ने 2000 के दशक की शुरुआत में ही इसको साबित करने के लिए कौवों पर दशकों लंबा एक व्यापक अध्ययन (Crows Intelligence Study) करने का फ़ैसला किया.
2005 में वन्यजीव जीवविज्ञानी डॉ. जॉन एम. मार्ज़लफ़ (Wildlife Biologist Dr John M. Marzluff) के नेतृत्व में शोधकर्ताओं की एक टीम ने यह अनोखा प्रयोग शुरू किया. इसका मकसद यह जांचना था कि क्या कौवे उन लोगों के चेहरे याद रख सकते हैं जिन्होंने उनके साथ बुरा किया था. अगर हाँ, तो कितने समय तक?
टीम के कुछ सदस्यों को कौवों को फंसाने और उनको बांधने का काम सौंपा गया था. पहली टीम के लोगों ने एक खास रबर का गुफावासियाों जैसा मास्क पहन कर उन्हें परेशान किया – जिससे कौवों को उनके चेहरे याद रखने में मदद मिली.
वहीं टीम के बाकी सदस्यों ने साधारण मास्क पहना और कौवों के झुंड को बिना परशान किए बेफिक्र छोड़ दिया.
इसके तुरंत बाद शोधकर्ता अपने-अपने मास्क पहनकर कौवों के रिएक्शन देखने के लिए बाहर निकल गए. प्रयोग से ये सामने आया कि जिन लोगों ने कौवों को परेशान किया. कौवों ने उन पर बेकाबू होकर आक्रामक हो गए और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने और चीखने लगे, कौवे आसामान से मास्क पहने लोगों के सिर से कुछ ही फीट की दूरी पर उड़ते और अपने इलाके को चिह्नित करने के लिए झपट्टा मारते. कौवों ने पूरे परिसर में इन मास्क पहले लोगों का पीछा भी किया. जबकि साधारण मास्क वालों के साथ कौवों ने ऐसा कोई व्यवहार नहीं किया.
शोध के दौरान एक दिलचस्प मोड़ तब आया जब कुछ समय बाद जिन कौवों को परेशान नहीं किया गया, वे भी भीड़ में शामिल हो गए. यह सिलसिला कई सालों तक चलता रहा. इस प्रयोग में गौर करने वाली बात यह है कि यह 17 वर्षों तक चला. इन सभी वर्षों के दौरान, कौवे आक्रमक बने रहे और मास्क पहने लोगों को परेशान करते रहे.
इस शोध से ये पता चला कि कौवे अपना ज्ञान और नफ़रत, समुदाय के बाकी सभी कौवों तक पहुंचा सकते हैं. हालांकि, कौवों के बीच संवाद केवल खतरे तक ही सीमित नहीं है. वे भोजन के स्रोतों जैसी अन्य चीज़ों के बारे में भी अलग-अलग स्वरों में बातचीत करते हैं.
कौवे बुद्धिमान होने के अलावा अत्यधिक चौकन्ने भी होते हैं और एक-दूसरे की शारीरिक भाषा और खाने की शैली की नकल कर सकते हैं. ये अपने करीबी परिवारों के लिए एक तरह के अंतिम संस्कार का भी आयोजन करते हैं, जिसमें झुंड अपने मृत साथी के चारों ओर मौन शोक मनाने के लिए इकट्ठा होता है.
कौवे ही एकमात्र ऐसे पक्षी नहीं हैं जो खतरनाक व्यक्तियों के प्रति आक्रामक व्यवहार दिखा सकते हैं. ऑस्ट्रेलियाई मैगपाई, उत्तरी मॉकिंगबर्ड, कनाडा गीज़, सीगल, लाल पंखों वाले ब्लैकबर्ड और नीलकंठ जैसे उनके अन्य पक्षियों की भी जीवित रहने की ऐसी ही रणनीतियां हैं.
इस तरह की आक्रामकता की रणनीति को “मॉबिंग” कहा जाता है, जिसमें पूरा झुंड चीख़ने, गोता लगाने, झपट्टा मारने और धमकी देने लगता है. इससे खतरे को डराने में मदद मिलती है और साथ ही उसका ध्यान केंद्रित करना और हमला करना मुश्किल हो जाता है.
मामला चाहे जो भी हो, अगर आप किसी कौवे से ऐसा व्यवहार करते हैं तो उसके पूरे कुनबे द्वारा परेशान किए जाने के लिए तैयार रहिएगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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