विश्लेषण

राज दरभंगा से लेकर हथुआ और डुमरांव तक… आखिर कैसे बिहार के ऐतिहासिक घरानों की पुश्तैनी दुर्गा पूजा खींच लाती है लोगों को अपनी जड़ों की ओर?

बिहार में दुर्गा पूजा की तस्वीर सिर्फ बड़े-बड़े पंडालों, रोशनी और भीड़ तक सीमित नहीं है. राज्य के कई हिस्सों में इस त्योहार की एक ऐसी परंपरा भी आज तक जीवित है, जिसका रिश्ता पुराने जमींदार घरानों, पुश्तैनी मंदिरों और परिवार की कुलदेवी से जुड़ा हुआ है. इन परिवारों के लिए दुर्गा पूजा कैलेंडर में आने वाला एक और त्योहार भर नहीं, बल्कि घर लौटने का बहाना है. एक ऐसा मौका है, जब देश के अलग-अलग शहरों में रहने वाले परिवार के लोग अपनी जड़ों की तरफ वापस आते हैं.

पटना, नई दिल्ली और दूसरे शहरों में रहने वाले परिवार के सदस्य कई बार साल भर अपने काम और रोजमर्रा की जिंदगी में व्यस्त रहते हैं. लेकिन जैसे ही शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा का समय करीब आता है, पुश्तैनी गांव, हवेली या मंदिर की याद फिर से ताजा हो जाती है. यात्रा की तैयारियां शुरू होती हैं. रिश्तेदारों से संपर्क किया जाता है. मंदिर की सफाई होती है. पूजा की व्यवस्था देखी जाती है और यह तय किया जाता है कि कौन कब पहुंचेगा.

फिर वही पुराना आंगन लोगों से भरने लगता है, जहां कभी परिवार की पिछली पीढ़ियां बैठा करती थीं.

यही वजह है कि बिहार के पुराने जमींदार परिवारों की दुर्गा पूजा को सिर्फ धार्मिक आयोजन के नजरिए से देखना शायद अधूरा होगा. इसमें आस्था है, लेकिन उसके साथ परिवार की स्मृति भी है. इसमें परंपरा है, लेकिन बदलते समय की छाप भी दिखाई देती है. और सबसे खास बात यह है कि निजी पारिवारिक पूजा कई जगह धीरे-धीरे पूरे समुदाय से जुड़ने वाला आयोजन बन जाती है.

शहर की जिंदगी से गांव की चौखट तक लौटने की कहानी

पुराने जमींदार परिवारों के कई वंशज अब उन जगहों पर नहीं रहते, जहां उनके पूर्वजों ने अपना जीवन बिताया था. परिवार के लोग पढ़ाई, नौकरी और कारोबार के सिलसिले में पटना, दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में बस गए हैं. फिर भी दुर्गा पूजा उन्हें हर साल अपने पुराने घर की ओर खींच लाती है.

इस वापसी में सिर्फ भावुकता नहीं होती. इसके पीछे धार्मिक और पारिवारिक जिम्मेदारी का भाव भी जुड़ा होता है.

पुश्तैनी मंदिर में पूजा करना, कुलदेवी के सामने माथा टेकना, पुराने पुजारी और मंदिर की व्यवस्था संभालने वाले लोगों से मिलना और परिवार की परंपराओं को आगे बढ़ाना—ये सब उस वार्षिक वापसी का हिस्सा बन जाते हैं.

किसी बच्चे के लिए यह अपने दादा-दादी या परदादा की कहानियों से जुड़ने का मौका हो सकता है. वह पहली बार उस मंदिर को देखता है, जिसके बारे में उसने घर में कई बार सुना होगा. परिवार के बुजुर्ग बताते हैं कि किस जगह कौन-सी पूजा होती थी, कौन-सा कमरा किस काम आता था और किस तरह पहले के समय में पूरे इलाके के लोग त्योहार के दौरान यहां जमा होते थे.

इस तरह दुर्गा पूजा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सिर्फ पूजा की विधि नहीं पहुंचाती. वह एक पूरा पारिवारिक इतिहास भी साथ लेकर चलती है.

इन घरानों में पूजा की तैयारी महीनों पहले शुरू हो जाती है

बड़े शहरों में रहने वाले लोगों के लिए दुर्गा पूजा की तैयारी शायद त्योहार से कुछ दिन पहले शुरू होती हो, लेकिन कई पुश्तैनी घरानों में इसकी तैयारी काफी पहले से चलने लगती है.

सबसे पहले मंदिर और पूजा स्थल की स्थिति देखी जाती है. पुराने पूजा के सामान की जांच होती है. मंदिर की सफाई और मरम्मत की जरूरत है या नहीं, यह देखा जाता है. पूजा में इस्तेमाल होने वाली चीजों की व्यवस्था की जाती है. पुजारी और दूसरे जरूरी लोगों से संपर्क किया जाता है.

इसके बाद परिवार के सदस्यों के आने-जाने की योजना बनती है.

यह सुनने में साधारण बात लग सकती है, लेकिन जब परिवार के लोग देश के अलग-अलग शहरों में रहते हों, तो कई लोगों को एक साथ पुश्तैनी घर तक लाना अपने आप में एक बड़ा काम होता है. कोई ट्रेन से आता है, कोई सड़क से, तो कोई हवाई यात्रा करके नजदीकी शहर पहुंचता है.

लेकिन इन तमाम आधुनिक साधनों के बीच मंजिल वही रहती है—वह घर, वह मंदिर और वह देवी, जहां परिवार की कई पीढ़ियां पहले भी माथा टेकती रही हैं.

पंडाल से अलग है इन पुश्तैनी मंदिरों की दुनिया

दुर्गा पूजा का नाम आते ही कोलकाता के विशाल पंडालों की तस्वीर सामने आना स्वाभाविक है. वहां पूजा कला, रोशनी, थीम और विशाल सजावट का बड़ा उत्सव बन चुकी है. बिहार में भी शहरों और कस्बों में भव्य पंडाल लगाए जाते हैं.

लेकिन पुराने जमींदार घरानों की पूजा का रंग कुछ अलग होता है.

यहां ध्यान अक्सर किसी अस्थायी पंडाल के बजाय पुराने मंदिर, देवी की प्रतिमा, परिवार की पूजा पद्धति और वर्षों से चले आ रहे अनुष्ठानों पर रहता है. फूल, दीपक, धूप, शंख की आवाज, ढोल-नगाड़े और मंदिर में जुटते लोग मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं, जिसकी खूबसूरती दिखावे से ज्यादा उसकी निरंतरता में होती है.

यहां सजावट का मतलब हमेशा बहुत बड़ा मंच या चमकदार रोशनी नहीं होता. कभी मंदिर का पुराना आंगन ही सबसे बड़ा आकर्षण बन जाता है. सुबह के समय जलते दीपक और पूजा की घंटियों की आवाज पूरे माहौल को बदल देती है.

कहानी असल में सजावट की भव्यता से ज्यादा उस भरोसे की है, जो पीढ़ियों से उसी जगह कायम है.

कुलदेवी से जुड़ा रिश्ता इन परिवारों के लिए खास है

कई पुराने जमींदार परिवारों में दुर्गा पूजा का केंद्र उनकी कुलदेवी होती हैं. कुलदेवी यानी वह देवी, जिनकी पूजा परिवार की परंपरा में लंबे समय से होती चली आ रही है.

इसलिए यहां देवी को केवल नवरात्र के दौरान पूजे जाने वाले धार्मिक स्वरूप के रूप में नहीं देखा जाता. परिवार के लिए वह घर की रक्षक, आस्था का केंद्र और वंश की आध्यात्मिक पहचान का हिस्सा होती हैं.

इसी वजह से पूजा के दौरान परिवार के लोगों की मौजूदगी का महत्व बढ़ जाता है. शहर में रहने वाला परिवार का कोई सदस्य भले ही रोजमर्रा की जिंदगी में धार्मिक गतिविधियों से उतना जुड़ा न हो, लेकिन कुलदेवी की पूजा के लिए पुश्तैनी घर लौटना उसके लिए अलग अर्थ रख सकता है.

यह भाव बिहार के कई पुराने घरानों की दुर्गा पूजा में दिखाई देता है.

राज दरभंगा और दुर्गा-काली की आराधना

बिहार के पुराने जमींदार घरानों की चर्चा हो और राज दरभंगा का नाम ना आए, ऐसा मुश्किल है. यह घराना लंबे समय से दुर्गा और काली की आराधना के लिए जाना जाता रहा है. शक्ति की उपासना की यह परंपरा बिहार की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा है. देवी को शक्ति, सुरक्षा और ऊर्जा के रूप में देखने वाली शाक्त परंपरा का प्रभाव इन पूजा पद्धतियों में साफ दिखाई देता है. राज दरभंगा की पूजा की खासियत यह है कि यहां देवी की आराधना परिवार की पहचान से भी जुड़ती है. पीढ़ियों से चली आ रही पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं रह जाती, बल्कि परिवार के इतिहास का हिस्सा बन जाती है.

पुराने समय में जिन घरानों का स्थानीय समाज और उनके आसपास के गांवों से गहरा रिश्ता था, उनके धार्मिक आयोजन भी केवल परिवार की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहते थे. पूजा के मौके पर आसपास के लोग भी मंदिर और आयोजन से जुड़ते थे.

यही कारण है कि बिहार के इन पुराने घरानों की दुर्गा पूजा में निजी भक्ति और सामुदायिक भागीदारी दोनों साथ दिखाई देती हैं.

पुरनदाहा मंदिर में अष्टमी और नवमी का अलग माहौल

पुरनदाहा के दुर्गा मंदिर में महाअष्टमी और महानवमी के मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं. इन दिनों यहां पारंपरिक पशु बलि की रस्म भी होती है, जिसके बाद श्रद्धालु महाप्रसाद ग्रहण करते हैं.

इस परंपरा को मानने वाले लोगों के लिए यह पूजा पद्धति पीढ़ियों से चली आ रही आस्था का हिस्सा है. महाअष्टमी और महानवमी वैसे भी दुर्गा पूजा के सबसे महत्वपूर्ण दिनों में गिने जाते हैं. इन दिनों मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है और पूरा परिसर धार्मिक गतिविधियों से भर जाता है.

यहां आने वाले लोगों के लिए सिर्फ पूजा देखना ही मकसद नहीं होता. वे दर्शन करते हैं, देवी के सामने अपनी मनोकामना रखते हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं.

महाप्रसाद की अपनी धार्मिक अहमियत है. देवी को अर्पित भोजन भक्तों के लिए साधारण भोजन नहीं रहता. उसे आशीर्वाद का रूप माना जाता है.

यही वह जगह है जहां किसी बड़े पारिवारिक आयोजन की सीमा टूटती है. परिवार के लोग अपनी जगह हैं, लेकिन मंदिर में आने वाला आम श्रद्धालु भी उसी धार्मिक अनुभव का हिस्सा बन जाता है.

हथुआ में थावे मइया की पूजा और परिवार का लंबा ठहराव

बिहार के पुराने जमींदार घरानों में हथुआ परिवार की दुर्गा पूजा की अपनी अलग पहचान है. परिवार की कुलदेवी थावे मइया की पूजा के लिए परिवार के सदस्य हथुआ में जुटते हैं.

इस परंपरा की एक खास बात यह है कि परिवार के लोग पूजा के सिलसिले में लंबे समय तक वहां रहते हैं और परंपरागत रूप से दीपावली तक ठहरने का उल्लेख मिलता है.

इसका मतलब यह हुआ कि त्योहार उनके लिए कुछ दिनों की भागदौड़ भर नहीं है. यह लंबे समय तक परिवार के एक साथ रहने, पूजा करने और आपसी रिश्तों को फिर से मजबूत करने का समय बन जाता है.

आज जब परिवार के सदस्य अलग-अलग शहरों और देशों में रहते हैं, ऐसे मौके पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण लग सकते हैं. साल भर फोन और संदेशों के जरिए जुड़े रहने वाले लोग जब एक ही आंगन में बैठते हैं, तो रिश्तों का अनुभव भी बदल जाता है.

हथुआ की पूजा में संधि पूजा के दौरान भैंस और बकरे की बलि की परंपरा भी जुड़ी रही है. संधि पूजा अष्टमी और नवमी के बीच के उस समय में होती है, जिसे दुर्गा पूजा में विशेष महत्व दिया जाता है.

बलि की परंपरा को लेकर आज समाज में अलग-अलग राय हो सकती है. लेकिन जिस परिवार या समुदाय में यह रस्म परंपरा का हिस्सा रही है, वहां इसे धार्मिक विरासत और पूर्वजों से मिले अनुष्ठान के रूप में देखा जाता है.

हर पुराने घराने की पूजा एक जैसी नहीं

बिहार की दुर्गा पूजा की सबसे दिलचस्प बात यही है कि यहां एक ही परंपरा हर जगह एक जैसी नहीं मिलती.

कहीं पशु बलि होती है, तो कहीं नहीं. कहीं परिवार की पूजा आम लोगों के लिए खुली होती है, तो कहीं पूजा का स्वरूप अपेक्षाकृत निजी रहता है. कहीं देवी की पूजा के साथ बड़े सामुदायिक आयोजन जुड़े हैं, तो कहीं मंदिर और परिवार के बीच का रिश्ता ज्यादा प्रमुख है.

बेतिया के मंदिर इसका एक अलग उदाहरण पेश करते हैं. यहां पिछले करीब 20 वर्षों से पशु बलि नहीं की जा रही है.

इस बदलाव को सिर्फ परंपरा के खत्म होने के रूप में देखना सही नहीं होगा. पूजा का मूल भाव अब भी कायम है. देवी की आराधना, मंदिर में आयोजन और भक्तों की मौजूदगी बनी हुई है.

समय के साथ धार्मिक परंपराएं भी समाज की तरह बदलती हैं. नई पीढ़ी की सोच, परिवार के फैसले, स्थानीय परिस्थितियां और सामाजिक दृष्टिकोण—इन सबका असर पूजा के तरीके पर पड़ सकता है.

इसलिए परंपरा को जिंदा रखने का मतलब हमेशा हर पुरानी रस्म को बिल्कुल उसी तरह दोहराना नहीं होता. कई बार परंपरा अपनी मूल भावना को बचाकर नया रूप भी लेती है.

टेकरी और अमावां राज के परिवारों को भी बुलाता है पुश्तैनी घर

टेकरी और अमावां राज से जुड़े परिवारों के कई वंशज आज पटना और नई दिल्ली जैसे शहरों में रहते हैं. उनकी जिंदगी का बड़ा हिस्सा शहरों में गुजरता है, लेकिन दुर्गा पूजा के समय पुश्तैनी जगह की ओर लौटने की परंपरा आज भी बनी हुई है. यह वापसी केवल पुरानी यादों के कारण नहीं होती है. इसके पीछे मंदिर, देवी, परिवार, पुजारी और स्थानीय लोगों के साथ जुड़ा एक पुराना संबंध भी होता है. किसी घराने की पूजा सिर्फ उस परिवार की निजी संपत्ति नहीं रहती. लंबे समय में उसके साथ आसपास रहने वाले लोगों की भी यादें जुड़ जाती हैं.

गांव के लोग जानते हैं कि किस दिन कौन-सी पूजा होती है. उन्हें पता होता है कि किस मंदिर में किस तरह की परंपरा है और किस अवसर पर ज्यादा भीड़ जुटती है.

जब परिवार के वंशज वापस आते हैं, तो पुराने सामाजिक रिश्ते भी फिर से सक्रिय हो जाते हैं.

यही वजह है कि पुश्तैनी घर सिर्फ ईंट-पत्थर की इमारत नहीं रह जाता. वह परिवार की स्मृतियों और स्थानीय समाज की साझा यादों का हिस्सा बन जाता है.

धरहरा में आम लोगों के लिए खुला दुर्गा मंदिर

मुजफ्फरपुर के धरहरा एस्टेट की दुर्गा पूजा इस कहानी में एक और महत्वपूर्ण पहलू जोड़ती है. यहां दिग्विजय नारायण सिंह ने पूजा के दौरान दुर्गा मंदिर को आम लोगों के लिए खोल दिया था. इससे यह साफ होता है कि पुराने जमींदार परिवारों की पूजा व्यवस्था कई जगह सिर्फ परिवार तक सीमित नहीं रही.

मंदिर से आम लोगों का जुड़ाव इस तरह और मजबूत हुआ. स्थानीय लोग दर्शन के लिए आए, देवी का आशीर्वाद लिया और पूजा के सामुदायिक वातावरण में शामिल हुए.

धरहरा की एक और खास बात यह है कि यहां पशु बलि नहीं होती.

इससे बिहार में शक्ति पूजा की विविधता फिर सामने आती है. एक तरफ कुछ स्थानों पर बलि की परंपरा जारी है, तो दूसरी तरफ ऐसे मंदिर भी हैं जहां पूजा बिना बलि के होती है.

दोनों के बीच अंतर जरूर है, लेकिन दोनों के पीछे देवी के प्रति श्रद्धा का भाव मौजूद है.

दरभंगा, हथुआ, बेतिया, टेकरी, अमावां, धरहरा और दूसरे पुराने इलाकों की पूजा परंपराएं इसी विविधता को दिखाती हैं.

डुमरांव में पूजा के साथ सम्मान की परंपरा

डुमरांव की दुर्गा पूजा भी अपनी अलग पहचान रखती है. यहां महाराजा बहादुर कमल सिंह के बिहारिजी मंदिर जाकर पूजा-अर्चना करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है. बिहारिजी मंदिर को राज्य के पुराने मंदिरों में गिना जाता है. ऐसे में दुर्गा पूजा के दौरान वहां जाकर माथा टेकना केवल धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि एक लंबे समय से चली आ रही परंपरा को निभाने जैसा भी है.

लेकिन डुमरांव की पूजा में धार्मिक आयोजन के साथ सामाजिक सम्मान का पहलू भी जुड़ा हुआ है. दुर्गा पूजा के दौरान डुमरांव रत्न पुरस्कार दिया जाता है. इस सम्मान के साथ 10 हजार रुपये और शॉल दिए जाने की परंपरा बताई गई है. ऐसे आयोजन त्योहार को मंदिर की सीमा से बाहर लेकर जाते हैं. पूजा के साथ समाज में योगदान देने वाले लोगों को सम्मानित करना स्थानीय संस्कृति और सामुदायिक पहचान को मजबूत करने का माध्यम बन जाता है.

पुराने समय में भी जमींदार परिवारों के धार्मिक आयोजन अक्सर स्थानीय सामाजिक जीवन का केंद्र होते थे. त्योहार के दौरान लोग एक-दूसरे से मिलते थे, सामाजिक संबंध मजबूत होते थे और इलाके की सामूहिक पहचान को एक मंच मिलता था.

डुमरांव की परंपरा उसी व्यापक भूमिका की एक झलक देती है.

जब देवी की पूजा परिवार और समाज के बीच पुल बनती है

इन सभी उदाहरणों को एक साथ देखें तो एक बात साफ दिखाई देती है कि दुर्गा पूजा यहां सिर्फ परिवार के भीतर की पूजा नहीं रह जाती हैै. परिवार की कुलदेवी जरूर केंद्र में होती हैं, लेकिन आसपास के लोग भी इससे जुड़ते हैं. कोई दर्शन के लिए आता है, कोई प्रसाद लेने, कोई पुराने परिचितों से मिलने और कोई सिर्फ उस परंपरा को देखने जिसे उसने बचपन से देखा है.

यही सामाजिक जुड़ाव इन पुराने पूजा स्थलों को जीवित रखता है.

अगर किसी मंदिर में सिर्फ परिवार के कुछ सदस्य ही आएं और बाकी समाज उससे पूरी तरह कट जाए, तो समय के साथ उसका सार्वजनिक महत्व कम हो सकता है. लेकिन जब स्थानीय लोग भी उसे अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा मानते हैं, तो परंपरा को आगे बढ़ने की नई ताकत मिलती है.

इसलिए पुराने जमींदार घरानों की पूजा को सिर्फ जमींदारी के इतिहास के संदर्भ में देखना पर्याप्त नहीं है. आज उनकी अहमियत इस बात में भी है कि वे पुराने मंदिरों और स्थानीय परंपराओं को एक सामाजिक संदर्भ में जिंदा रखे हुए हैं.

आज की पीढ़ी के लिए इन परंपराओं का मतलब क्या है?

एक सवाल स्वाभाविक है कि जब जमींदारी व्यवस्था खत्म हो चुकी है और परिवारों की जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी है, तब इन पुरानी पूजा परंपराओं का महत्व आज भी क्यों बना हुआ है? इसका जवाब शायद परिवार की याद और पहचान में छिपा है. किसी परिवार के लिए उसका पुराना घर सिर्फ वह जगह नहीं है जहां उसके पूर्वज रहते थे. वह उसकी कहानी का हिस्सा है. वहां परिवार के बुजुर्गों की यादें हैं, मंदिर है, देवी हैं और कई पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक जिम्मेदारियां हैं.

आज का युवा शायद महानगर में पला-बढ़ा हो. उसकी पढ़ाई, नौकरी और जीवनशैली पूरी तरह आधुनिक हो सकती है. लेकिन जब वह दुर्गा पूजा के दौरान अपने पुश्तैनी गांव जाता है, तो उसे अपने परिवार का एक दूसरा चेहरा दिखाई देता है.

वह देखता है कि उसके परिवार में पूजा कैसे होती थी. उसे पता चलता है कि कुलदेवी की परंपरा कहां से आई. वह मंदिर के पुजारी और स्थानीय लोगों से परिवार के बारे में सुन सकता है.

इस तरह त्योहार इतिहास की किताब से बाहर निकलकर उसके सामने एक जीवित अनुभव बन जाता है.

आधुनिक सुविधाएं, लेकिन पुरानी आस्था

इन परिवारों की जिंदगी में बदलाव आया है, इसमें कोई संदेह नहीं. अब यात्रा पहले से आसान है. परिवार के लोग मोबाइल फोन के जरिए लगातार संपर्क में रहते हैं. पूजा की तैयारी के लिए संदेश भेजे जाते हैं. आने-जाने का कार्यक्रम पहले से बनाया जाता है.

लेकिन इन आधुनिक साधनों ने परंपरा को खत्म नहीं किया है. कई मामलों में उन्होंने उसे निभाना आसान जरूर बना दिया है.

पहले जिस परिवार को एक साथ जुटने के लिए लंबी तैयारी करनी पड़ती होगी, आज उसके सदस्य अलग-अलग शहरों से यात्रा की योजना बना सकते हैं. बच्चों की छुट्टियां तय की जा सकती हैं. रिश्तेदार पहले से संपर्क में रह सकते हैं.

नतीजा यह है कि आधुनिक जीवन और पुरानी परंपरा एक-दूसरे के विरोधी नजर नहीं आते. दोनों साथ चलते दिखाई देते हैं.

एक तरफ शहर की तेज जिंदगी है, दूसरी तरफ साल में एक बार पुश्तैनी घर की ओर लौटने की चाह.

बलि हो या न हो, केंद्र में देवी ही रहती हैं

बिहार की इन पूजा परंपराओं को समझने के लिए एक और बात ध्यान देने योग्य है. अलग-अलग घरानों में अनुष्ठानों का तरीका अलग हो सकता है, लेकिन देवी की आराधना केंद्र में बनी रहती है.

पुरनदाहा और हथुआ जैसे स्थानों पर बलि की परंपरा का उल्लेख मिलता है. वहीं बेतिया और धरहरा में बलि नहीं होती.

यह अंतर बिहार की धार्मिक विविधता को दिखाता है.

समय के साथ किसी परंपरा में बदलाव आ जाना अपने आप में असामान्य बात नहीं है. समाज बदलता है, परिवार बदलते हैं और पूजा के तरीकों को लेकर विचार भी बदलते हैं. इसके बावजूद अगर मंदिर में देवी की पूजा जारी है, लोग दर्शन के लिए आ रहे हैं और परिवार अपनी धार्मिक जिम्मेदारी निभा रहा है, तो परंपरा का एक मूल सूत्र अब भी कायम है. यानी बदलाव के बीच भी निरंतरता.

दुर्गा पूजा सिर्फ त्योहार नहीं, घर लौटने का मौसम

बिहार के इन पुराने घरानों की कहानी को शायद एक वाक्य में समझाना हो तो कहा जा सकता है—दुर्गा पूजा उनके लिए घर लौटने का मौसम है.

वह घर जो साल के बाकी महीनों में अपेक्षाकृत शांत रहता है, त्योहार के समय फिर से जीवंत हो जाता है. रिश्तेदार आते हैं. बच्चों की आवाज सुनाई देती है. मंदिर में पूजा होती है. आसपास के लोग जुटते हैं. पुराने परिचित मिलते हैं.

किसी के लिए यह देवी के दर्शन का अवसर है, किसी के लिए परिवार से मिलने का. किसी के लिए बचपन की यादों में लौटने का और किसी के लिए अगली पीढ़ी को अपनी जड़ों से परिचित कराने का.

इसीलिए इन घरानों की दुर्गा पूजा को सिर्फ धार्मिक आयोजन कहना इसके पूरे अर्थ को छोटा कर देना होगा.

बिहार की पूजा परंपरा की असली खूबसूरती उसकी विविधता में है

अगर कोलकाता की दुर्गा पूजा अपनी कलात्मक भव्यता और विशाल पंडालों के लिए पहचानी जाती है, तो बिहार के पुराने घरानों की पूजा अपनी पारिवारिक और ऐतिहासिक गहराई के लिए अलग पहचान बनाती है.

यहां मंदिर का पुराना स्वरूप भी महत्वपूर्ण है. परिवार की कुलदेवी भी महत्वपूर्ण हैं. स्थानीय लोगों की भागीदारी भी मायने रखती है और पीढ़ियों से चली आ रही छोटी-बड़ी रस्में भी.

कहीं ढोल की आवाज है, कहीं शंख की. कहीं मंदिर में लंबी पूजा चलती है, कहीं महाप्रसाद लोगों को जोड़ता है. कहीं पुरानी रस्में आज भी निभाई जा रही हैं और कहीं समय के साथ उनमें बदलाव आ चुका है.

यही विविधता बिहार की दुर्गा पूजा को खास बनाती है.

यहां देवी की पूजा का एक ही चेहरा नहीं है. अलग-अलग इलाके, परिवार और मंदिर अपनी-अपनी परंपरा के साथ उसी आस्था को आगे बढ़ाते हैं.

आखिर क्या बचा रह जाता है?

समय के साथ जमींदारी व्यवस्था चली गई. पुराने एस्टेट का सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा. परिवार बिखरकर अलग-अलग शहरों में जा बसे तथा हवेलियां भी पहले जैसी आबाद नहीं है. लेकिन कुछ चीजें अब भी बनी हुई हैं.

मंदिर हैं. कुलदेवी की पूजा है. परिवार के लौटने की परंपरा है. स्थानीय लोगों की यादें हैं. पुजारी और पूजा की व्यवस्था है. और सबसे ऊपर है वह विश्वास, जो पीढ़ी दर पीढ़ी परिवार के साथ चला आया है. दुर्गा पूजा हर साल इन रिश्तों को फिर से जोड़ देती है. राज दरभंगा में दुर्गा और काली की आराधना, हथुआ में थावे मइया के प्रति श्रद्धा, पुरनदाहा में अष्टमी-नवमी की परंपराएं, बेतिया में समय के साथ बदला पूजा स्वरूप, धरहरा में आम लोगों के लिए खुला मंदिर और डुमरांव में पूजा के साथ सम्मान की परंपरा ये सभी मिलकर बिहार की एक बड़ी सांस्कृतिक तस्वीर बनाते हैं.

यह तस्वीर बताती है कि परंपरा सिर्फ पुरानी चीजों को जस का तस बचाकर रखने का नाम नहीं है. परंपरा तब जिंदा रहती है, जब अगली पीढ़ी उसे अपने जीवन का हिस्सा मानती है.

शायद इसी वजह से दुर्गा पूजा का मौसम आते ही इन परिवारों के लिए पुश्तैनी घर की याद फिर जाग उठती है.

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-भारत एक्सप्रेस

Prashant Kumar

CEO – Bharat Express Digital Chief Advisor to the Chairman & Managing Director and Editor-in-Chief Mr. Prashant Kumar is a digital, media and growth transformation leader with 18+ years of experience across strategy, technology, AI, marketing and business transformation, having worked with leading organisations including Amazon, IBM, Adidas and Tata Consumer Products. At Bharat Express, he leads digital transformation, audience growth, technology, partnerships, monetisation and new business initiatives to build a scalable, future-ready media ecosystem.

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