विश्लेषण

जन्मदिन विशेष: बिहार के एक ऐसे मुख्यमंत्री, जिन्होंने अपने लिए कभी नहीं मांगा वोट; निधन के बाद तिजोरी खुली तो निकले सिर्फ ₹24500, पर वो भी उनके नहीं

भारतीय राजनीति में आज हर तरफ वोट बैंक और परिवारवाद का बोलबाला है. हर कोई किसी भी कीमत पर वोटर्स को लुभाने और अपनी ओर खींचने की कोशिश में रहता है. इसको लेकर बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं. अभी यही काम बिहार में हो रहा है और सभी राजनीतिक दल और नेता लोगो के बीच पहुंचकर वोट मांग रहे हैं. लेकिन, इन सबके बीच हम आपको एक ऐसे नेता की कहानी बता रहे हैं, जिन्होंने अपने लिए कभी वोट नहीं मांगा और इसके बावजूद जनता ने हर बार उनको प्रचंड बहुमत से जिताया. हम चर्चा कर रहे हैं बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह (Dr Shri Krishna Singh) यानी श्री बाबू की, जिनका जीवन एक ऐसे स्वर्णिम युग की याद दिलाता है और उनके लिए जनसेवा ही सबसे बड़ा चुनावी प्रचार था.

बिहार केसरी का अटूट विश्वास

बात 1957 के विधानसभा चुनाव की है. बिहार केसरी के नाम से प्रसिद्ध डॉ. श्रीकृष्ण सिंह शेखपुरा जिले की बरबीघा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे थे. उन्होंने अपने सहयोगियों को साफ निर्देश दे दिया था कि वह जनता से वोट मांगने नहीं जाएंगे. उनका अटूट विश्वास था कि अगर जनता के लिए काम किया होगा या जनता लायक समझेगी तो जरूर वोट देगी. उनका मानना था कि जनता मुझे लायक नहीं समझेगी तो वोट नहीं देगी. लेकिन, जनता ने हर बार अपने इस सेवक को प्रचंड बहुमत से जिताया. यह उनकी लोकप्रियता और ईमानदारी का सबसे बड़ा प्रमाण था.

आधुनिक बिहार के निर्माता

21 अक्टूबर 1887 को बिहार के नवादा जनपद के खनवां गांव में जन्मे डॉ. श्रीकृष्ण सिंह 2 अप्रैल 1946 को बिहार के मुख्यमंत्री बने थे और अपनी मृत्यु तक यानी लगभग 15 साल अखंड बिहार के मुख्यमंत्री रहे. 74 वर्ष की अवस्था में बिहार का मुख्यमंत्री रहते हुए 31 जनवरी 1961 को पटना में श्रीबाबू का निधन हो गया.  उनके शासनकाल को बिहार के विकास का स्वर्ण युग माना जाता है. फोर्ड फाउंडेशन के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एपेल्लवी ने अपनी रिपोर्ट में बिहार को देश का ‘सबसे बेहतर शासित राज्य’ और ‘दूसरी सबसे बेहतर अर्थव्यवस्था’ बताया था.

उनके कार्यकाल में ही भारत की पहली रिफाइनरी – बरौनी ऑयल रिफाइनरी, पहला खाद कारखाना – सिंदरी और बरौनी रासायनिक खाद कारखाना, एशिया का सबसे बड़ा इंजीनियरिंग कारखाना – भारी उद्योग निगम (एचईसी) हटिया, देश का सबसे बड़ा स्टील प्लांट – सेल बोकारो, और आजादी के बाद गंगा नदी पर पहला रेल-सह-सड़क पुल – राजेंद्र पुल जैसी अनगिनत परियोजनाओं की नींव पड़ी. वह खेती के साथ-साथ औद्योगीकरण को बढ़ावा देना चाहते थे, जिसके लिए उन्होंने बेगूसराय-बख्तियारपुर-फतुहा के बीच औद्योगिक कॉरिडोर बनाने का सपना देखा था. शिक्षा के क्षेत्र में भी उन्होंने खूब काम किया. पुसा और सबौर का एग्रीकल्चर कॉलेज, बिहार, भागलपुर, रांची यूनिवर्सिटी इत्यादि जैसे अनगिनत उदाहरण हैं.

जाति का नहीं, बल्कि जमात के नेता

श्री बाबू के नाम से मशहूर डॉ. श्रीकृष्ण सिंह सिर्फ विकास पुरुष नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के ध्वजवाहक भी थे. भूमिहार समाज से आने के बावजूद उन्होंने अपने कार्यकाल में जमींदारी प्रथा का खात्मा किया. बिहार जमींदारी उन्मूलन कानून लागू करने वाला देश का पहला राज्य बना. सामाजिक समरसता के लिए उनका संघर्ष केवल राजनीति तक सीमित नहीं था. उन्होंने देवघर स्थित बैद्यनाथ धाम मंदिर में दलितों के प्रवेश के लिए मुहिम चलाई. इस दौरान उन्हें विरोधियों की लाठियां भी खानी पड़ीं, लेकिन वह अपने मिशन में सफल रहे. उनकी इसी सोच के कारण उन्हें जाति का नहीं, बल्कि जमात का नेता कहा जाता था.

राजनीति में परिवारवाद के खिलाफ थे श्री बाबू

श्री बाबू ने आजीवन सत्ता को निजी लाभ से दूर रखा. साल 1957 में जब कुछ कांग्रेसी नेताओं ने उनसे मुलाकात कर उनके बेटे शिवशंकर सिंह के चुनाव लड़ने की अनुमति मांगी तो उन्होंने साफ मना कर दिया. उन्होंने कहा कि अगर उनका बेटा चुनाव लड़ेगा तो वह खुद चुनाव नहीं लड़ेंगे, क्योंकि एक परिवार से एक ही व्यक्ति को चुनाव लड़ना चाहिए.

उनकी ईमानदारी का सबसे मार्मिक किस्सा उनके निधन के बाद सामने आया. 1961 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के निधन के 12वें दिन राज्यपाल की उपस्थिति में जब उनकी निजी तिजोरी खोली गई तो तिजोरी में 4 लिफाफों में कुल 24 हजार 500 रुपये निकले थे और वो भी उनके खुद के नहीं थे. एक लिफाफे में रखे 20 हजार रुपये प्रदेश कांग्रेस कमेटी के लिए थे, दूसरे लिफाफे में तीन हजार रुपये मुनीम साहब की बेटी की शादी के लिए थे. तीसरे लिफाफे में एक हजार रुपये महेश बाबू की छोटी बेटी के लिए थे और चौथे लिफाफे में 500 रुपए उनके विश्वस्त नौकर के लिए थे.

5 साल की उम्र में मां को खो दिया

डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने बचपन में ही मां को खो दिया था और 5 वर्ष के बाद उनका जीवन मां के स्नेह से वंचित रहा. उस समय फैले प्लेग रोग के चपेट में आने की वजह से उनकी मां का निधन हो गया था. उनकी पढ़ाई गांव और मुंगेर जिला स्कूल में हुई. 1906 में उन्होंने पटना कॉलेज में दाखिला लिया, पटना में उन्होंने एमए और कानून की उपाधि ली. 1916 में कॉलेज की शिक्षा समाप्त करने के बाद उन्होंने मुंगेर में वकालत शुरू कर दी, ओजस्वी प्रतिभा के धनी श्री बाबू की चर्चा मुंगेर के अलावा आसपास के क्षेत्रों में भी जल्द ही होने लगी.

बापू से मुलाकात के बाद स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े

युवा अवस्था से ही श्रीकृष्ण सिंह स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए थे. 1916 में ही बनारस के सेंट्रल हिंदू कॉलेज में श्रीकृष्ण सिंह की मुलाकात गांधीजी से हुई. 1921 में बापू ने देश की आजादी के लिए जब असहयोग आंदोलन शुरू किया तो इन्होंने वकालत के पेशे को छोड़ दिया और स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में कूद पड़े. 1917 में जब गांधीजी ने चंपारण सत्याग्रह की शुरुआत की थी, तब श्रीकृष्ण सिंह ने किसानों के जत्थे का नेतृत्व किया था. उन्होंने पूरे क्षेत्र का दौरा किया और कई बार पैदल चले तो कभी बैलगाड़ी से यात्राएं की.

ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचार के आगे भी नहीं टूटे

बिहार में श्री बाबू की लोकप्रियता बढ़ी तो उन्हें बिहार केसरी कहा जाने लगा. साल 1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान वे काफी सक्रिय रहे. गांधी जी के आह्वान पर श्रीकृष्ण सिंह ने मुंगेर से गंगा नदी पार कर लगभग 100 किलोमीटर लंबी पदयात्रा की और गढ़पुरा पहुंचे. यहां दुर्गा गाछी में अपने सहयोगियों के साथ अंग्रेजों के नमक कानून को तोड़ा था. इस दरम्यान ब्रिटिश पुलिस ने उनपर जुल्म की नई इबारत लिखी, श्री बाबू का शरीर नमक के खौलते पानी से जला दिया गया था, पर वह हार नहीं माने. इसके बाद श्री बाबू को ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया करके जेल भेज दिया. 1933 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें हजारीबाग जेल भेज दिया गया.

1937 में पहली बार बने बिहार प्रांत के मुख्यमंत्री

डॉ. श्रीकृष्ण सिंह साल 1937 में बिहार असेम्बली के सदस्य चुने गए और 1937 में ही केंद्रीय असेम्बली के सदस्य चुने गए. 20 जुलाई 1937 को वह बिहार प्रांत के मुख्यमंत्री बने. मुख्यमंत्री बनने के बाद तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उनका कई मुद्दों पर तकरार हुआ जैसे राजनैतिक बंदियों की रिहाई के प्रश्न पर तत्कालीन राज्यपाल से उनका टकराव हो गया, इसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ होने पर श्रीकृष्ण सिंह के मंत्रिमंडल ने त्याग पत्र दे दिया, क्योंकि इस युद्ध में भारत को भारतीय नेताओं की सहमति के बिना झोंक दिया गया था.

आपत्तिजनक बातें भी करते थे सहन

डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के शासन काल में चर्चित अंग्रेजी दैनिक ‘सर्चलाइट’ के संपादक एम.एस.एम. शर्मा छद्म नाम से पहले पेज पर एक बहुत ही तीखा कॉलम लिखा करते थे. उसमें मुख्यमंत्री के खिलाफ कभी-कभी आपत्तिजनक बातें रहती थीं. मुख्यमंत्री डॉ.श्रीकृष्ण सिंह के एक खास समर्थक नंद किशोर सिंह ने श्रीबाबू से कहा कि आप उस अखबार के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं करते? आपके खिलाफ अखबार इतनी गंदी-गंदी बातें लिखता है. फिर भी आप उसे सहन करते हैं. इस पर मुख्यमंत्री ने कहा कि मैंने उस अखबार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर दी है. यह पूछने पर कि आपने क्या कार्रवाई की है? श्रीबाबू ने कहा कि मैंने सर्चलाइट पढ़ना बंद कर दिया है. समर्थक उदास होकर उनके पास से चले गए. डॉ. श्रीकृष्ण सिंह का जीवन और उनकी राजनीति आज के नेताओं के लिए एक आईना है. उन्होंने दिखा दिया कि जनहित के लिए किया गया कार्य ही सबसे बड़ा वोट है.


ये भी पढ़ें: इटावा लायन सफारी: वन्यजीव संरक्षण का प्रतीक


-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

Recent Posts

दिल्ली में मंचन हुआ ‘अमर बलिदान’, गुरु तेग बहादुर जी की शहादत को किया याद

दिल्ली के श्रीराम सेंटर में ‘अमर बलिदान’ नाटक का मंचन हुआ. गुरु तेग बहादुर जी…

3 minutes ago

CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग की तैयारी, INDIA ब्लॉक दोनों सदनों में लाएगा प्रस्ताव

Gyanesh Kumar removal impeachment: CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए INDIA ब्लॉक फिर नया…

5 minutes ago

‘सिर्फ समय काट रहे कुछ देश!’ UNGA में जयशंकर का करारा हमला, खोली विरोधियों की पोल

S Jaishankar UN Speech: संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने यूएन…

27 minutes ago

पीएम मोदी ने सेवा यात्रा में शामिल युवाओं से किया संवाद, बोले- अनुभव जीवनभर आएंगे काम

पीएम मोदी ने वाराणसी से वडनगर जा रही सेवा यात्रा के युवाओं से बातचीत की.…

34 minutes ago

नूर खान से लेकर इस्लामाबाद सब होगा खाक! IAF को मिला ब्रह्मोस से भी बड़ा ‘ब्रह्मास्त्र’, PAK के क्यों छूटे पसीने?

रक्षा मंत्रालय ने भारतीय वायुसेना के लिए 160 SAT-SAAW ग्लाइड बम खरीदने के लिए ₹811…

44 minutes ago

कहीं 3 रुपये तो कहीं 400 रुपये लीटर, आखिर दुनिया में क्यों है पेट्रोल के दाम में इतना बड़ा फर्क?

Cheapest Petrol In World: दुनिया में पेट्रोल की कीमतें अलग-अलग हैं. वेनेजुएला और ईरान जैसे…

53 minutes ago