विश्लेषण

पेटेंट के एकाधिकार को तोड़ना: BRICS की जेनेरिक दवा गठजोड़ से कैसे घट सकती है स्वास्थ्य सेवा की लागत

BRICS Generic Medicine Alliance: महंगी दवाएं सिर्फ बजट की समस्या नहीं हैं. इनकी कीमत यह भी तय कर सकती है कि अस्पतालों और क्लीनिकों में जरूरी दवाएं उपलब्ध रहेंगी या नहीं और क्या परिवार इलाज का पूरा कोर्स करा पाएंगे. BRICS के जेनेरिक दवा गठबंधन उत्पादन क्षमता, सार्वजनिक स्वास्थ्य कूटनीति, नियामक सहयोग और एक साथ बड़ी मात्रा में दवाएं खरीदने की ताकत को जोड़ते हैं, ताकि विकासशील देशों में सस्ती दवाओं की पहुंच बढ़ाई जा सके. इसका उद्देश्य दवा कंपनियों में नए शोध और नई दवाओं के विकास को खत्म करना नहीं है, बल्कि व्यवस्था में ऐसा संतुलन बनाना है कि पेटेंट इलाज तक पहुंच में हमेशा के लिए रुकावट न बन जाएं.

BRICS के जेनेरिक दवा गठबंधन स्वास्थ्य खर्च कैसे कम करते हैं?

BRICS के जेनेरिक दवा गठबंधन प्रतिस्पर्धा बढ़ाकर, दवाओं की भरोसेमंद सप्लाई बढ़ाकर और विकासशील देशों को दवाओं की खरीद और बौद्धिक संपदा से जुड़ी बातचीत में ज्यादा ताकत देकर स्वास्थ्य खर्च कम कर सकते हैं.

जेनेरिक दवाएं आम तौर पर ब्रांड वाली दवाओं से सस्ती होती हैं, क्योंकि इनके निर्माताओं को मूल दवा की खोज और क्लिनिकल विकास की पूरी प्रक्रिया दोबारा नहीं करनी पड़ती. योग्य कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा होने से कीमतें और नीचे आ सकती हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO भी गुणवत्ता मानकों पर खरी उतरने वाली जेनेरिक दवाओं और बायोसिमिलर को ब्रांड वाली दवाओं के मुकाबले कम कीमत वाले विकल्पों के रूप में देखता है. यही वजह है कि दवाओं तक पहुंच बढ़ाने वाली नीतियों में केवल कीमत नियंत्रित करने के बजाय सुरक्षित और अच्छी गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाओं के बाजार में आने पर भी जोर दिया जाता है.

व्यवहार में BRICS का यह तरीका इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके कई सदस्यों के पास बड़े दवा बाजार, दवा बनाने की मजबूत क्षमता या सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्थाएं हैं, जो मांग को प्रभावित कर सकती हैं.

BRICS का विस्तार अपने शुरुआती पांच देशों से आगे हो चुका है और अब इसमें 11 देश शामिल हैं. इनमें विकासशील दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भी हैं, जिनकी उत्पादन, नियमन, शोध और दवाओं की खरीद के क्षेत्र में अलग-अलग ताकत है.

जब इन क्षमताओं को एक साथ जोड़ा जाता है, तो जो देश अकेले बेहतर सौदा नहीं कर पाते, उन्हें ज्यादा कंपनियों से दवाएं लेने, तकनीकी जानकारी साझा करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी नीतियों में जरूरी छूट के लिए मजबूत राजनीतिक समर्थन मिल सकता है.

पेटेंट का एकाधिकार और दवाओं तक पहुंच का अंतर

पेटेंट का उद्देश्य नई खोज और नए आविष्कार को बढ़ावा देना है. इसके तहत आविष्कारक को एक निश्चित समय के लिए उस आविष्कार पर विशेष अधिकार मिलता है.

दवाओं के मामले में यह विशेष अधिकार नई दवाओं के शोध का खर्च निकालने में मदद कर सकता है. लेकिन जब किसी बीमारी के लिए दूसरा इलाज उपलब्ध न हो, कोई समझौता लाइसेंस न हो या सस्ती जेनेरिक दवा बाजार में न हो, तो यही पेटेंट कीमतों को लंबे समय तक ऊंचा रख सकता है.

कम और मध्यम आय वाले देशों के लिए यह समस्या ज्यादा गंभीर होती है, क्योंकि सरकारी बजट सीमित होते हैं और मरीजों को अक्सर अपनी जेब से इलाज का बड़ा खर्च उठाना पड़ता है.

मुख्य समस्या केवल यह नहीं है कि पेटेंट मौजूद हैं. समस्या यह भी है कि जब किसी देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य की जरूरत बहुत ज्यादा हो, घरेलू दवा उत्पादन कमजोर हो या सरकार के पास बातचीत की पर्याप्त ताकत न हो, तब पेटेंट व्यवस्था को समझना और उसका इस्तेमाल करना मुश्किल हो सकता है.

किसी देश को पता हो सकता है कि उसे कम कीमत वाली दवा चाहिए, लेकिन फिर भी उसे कानूनी अनिश्चितता, दवा की कमी, तकनीकी बाधाओं या व्यापारिक दबाव की आशंका का सामना करना पड़ सकता है. यहीं दवा क्षेत्र में सहयोग व्यावहारिक बन जाता है.

एक गठबंधन मिलकर यह पता लगा सकता है कि किन दवाओं की जरूरत है, किन दवाओं पर पेटेंट से जुड़ी रुकावटें हैं, अलग-अलग देशों में नियामक नियम क्या हैं और बड़ी तथा स्पष्ट मांग के साथ दवा कंपनियों से बातचीत की जा सकती है. इससे हर देश को छोटे और अलग खरीदार की तरह काम नहीं करना पड़ता. साथ आने वाले देश एक ज्यादा भरोसेमंद मांग पैदा कर सकते हैं.

सस्ती दवाओं के पीछे काम करने वाले नीतिगत साधन

अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था पहले से ही यह मानती है कि बौद्धिक संपदा के नियमों को सार्वजनिक स्वास्थ्य की जरूरतों के साथ समझा जाना चाहिए.

विश्व व्यापार संगठन यानी WTO की दोहा घोषणा में यह स्पष्ट किया गया था कि TRIPS समझौता सदस्य देशों को सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने से नहीं रोकना चाहिए. इसमें अनिवार्य लाइसेंस जैसे विकल्प भी शामिल हैं.

बाद में TRIPS में किए गए बदलाव से ऐसा कानूनी रास्ता बनाया गया, जिसके तहत जिन देशों में दवा बनाने की पर्याप्त क्षमता नहीं है, उनके लिए अनिवार्य लाइसेंस के तहत कम कीमत वाली जेनेरिक दवाएं बनाई और निर्यात की जा सकती हैं.

ये साधन काफी ताकतवर हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल अपने आप नहीं हो जाता. सरकारों को पता होना चाहिए कि इनका इस्तेमाल कब करना है. इसके लिए घरेलू कानून तैयार होने चाहिए, योग्य दवा निर्माता की पहचान करनी होती है और खरीद की पूरी प्रक्रिया संभालनी होती है.

WTO ने यह भी बताया है कि दवाओं की मांग को एक साथ जोड़ना, नियामक नियमों में तालमेल बढ़ाना और स्थानीय उत्पादन की व्यापक रणनीति के हिस्से के रूप में निर्यात संबंधी अनिवार्य लाइसेंस व्यवस्था का इस्तेमाल करना इन व्यवस्थाओं को ज्यादा व्यावहारिक और लंबे समय तक चलने लायक बना सकता है.

मुख्य नीतिगत साधनों में शामिल हैं:

अनिवार्य लाइसेंस: सरकार पेटेंट धारक की अनुमति के बिना किसी पेटेंट वाली दवा के उत्पादन या आयात की अनुमति देती है. आमतौर पर इसके लिए कुछ शर्तें और पेटेंट धारक को भुगतान की व्यवस्था होती है.

स्वैच्छिक लाइसेंस: पेटेंट धारक कुछ चुनी हुई कंपनियों को जेनेरिक दवाएं बनाने की अनुमति देता है. यह अनुमति अक्सर कुछ खास देशों या बाजारों के लिए होती है.

एक साथ दवाओं की खरीद: कई खरीदार अपनी मांग को एक साथ जोड़ते हैं, ताकि बेहतर कीमत और शर्तों पर बातचीत की जा सके और कंपनियों के लिए मांग को लेकर अनिश्चितता कम हो.

नियामक सहयोग और एकरूपता: नियामक संस्थाएं भरोसेमंद जांच को स्वीकार करके या तकनीकी मानकों में तालमेल बनाकर एक ही काम को बार-बार करने की जरूरत कम कर सकती हैं.

स्थानीय और क्षेत्रीय उत्पादन: देश दवा बनाने की अपनी क्षमता बढ़ाते हैं, ताकि पूरी सप्लाई दूर के दूसरे देशों पर निर्भर न रहे.

गुणवत्ता सुनिश्चित करना: सरकारें ऐसी दवाओं को प्राथमिकता देती हैं जो सुरक्षा, प्रभाव और उत्पादन के मानकों पर खरी उतरती हों. इससे सस्ती कीमत का मतलब खराब गुणवत्ता नहीं बनता.

इन सभी उपायों से पता चलता है कि सस्ती दवाओं के लिए केवल दवा बनाने वाली फैक्ट्री काफी नहीं है. इसके लिए तैयार कानूनी व्यवस्था, पारदर्शी खरीद प्रक्रिया, भरोसेमंद गुणवत्ता प्रणाली और एक साथ बनाई गई मांग भी जरूरी है.

BRICS जेनेरिक दवाओं की पहुंच को प्रभावित करने की स्थिति में क्यों है?

BRICS दवाओं की पहुंच को प्रभावित करने की स्थिति में इसलिए है क्योंकि इसमें बड़ी आबादी, उभरते बाजारों की दवा उत्पादन क्षमता और ग्लोबल साउथ के सहयोग पर केंद्रित एक राजनीतिक मंच मौजूद है.

BRICS के स्वास्थ्य से जुड़े घोषणापत्रों में सुरक्षित, प्रभावी, अच्छी गुणवत्ता वाली और सस्ती दवाओं तक पहुंच पर बार-बार जोर दिया गया है. इसमें जेनेरिक दवाएं भी शामिल हैं. साथ ही दवा नियमन, शोध, टीके, जांच और व्यापक स्वास्थ्य व्यवस्था में सहयोग का समर्थन भी किया गया है.

भारत को अक्सर जेनेरिक दवाओं के बड़े उत्पादक देश के रूप में देखा जाता है. चीन के पास सक्रिय दवा सामग्री यानी API और दवा उत्पादन का बड़ा आधार है. वहीं ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका का सार्वजनिक स्वास्थ्य और दवाओं तक पहुंच से जुड़ी बहस में लंबा अनुभव रहा है.

BRICS के नए सदस्य भी अपने-अपने क्षेत्रों में बाजार और मांग का दायरा बढ़ाते हैं. यह जरूरी नहीं है कि BRICS का हर देश एक ही भूमिका निभाए. असली अवसर उनकी अलग-अलग ताकतों को एक साथ जोड़ने में है.

एक व्यावहारिक गठबंधन कुछ इस तरह काम कर सकता है:

स्वास्थ्य मंत्रालय ऐसी दवा की पहचान करें जो इलाज के लिए जरूरी है लेकिन बहुत महंगी है. पेटेंट विशेषज्ञ कानूनी विकल्पों की जांच करें. नियामक संस्थाएं गुणवत्ता के मानक तय करें और दवा खरीदने वाली एजेंसियां अलग-अलग देशों की मांग को एक साथ जोड़ें.

इसके बाद दवा कंपनियों के सामने उत्पादन का ज्यादा स्पष्ट व्यावसायिक अवसर होगा और सरकारें भी ज्यादा मजबूत स्थिति में रहकर बातचीत कर सकेंगी. यह उन बीमारियों के मामले में खास तौर पर महत्वपूर्ण है, जिनमें इलाज को बीच में रोकना नुकसानदेह हो सकता है.

HIV, टीबी, कैंसर, डायबिटीज, दिल की बीमारियां और एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस जैसी समस्याओं में लंबे समय तक दवाओं की जरूरत पड़ती है. अगर कोई देश स्थिर कीमत और भरोसेमंद सप्लाई सुनिश्चित नहीं कर पाता, तो डॉक्टरों के इलाज संबंधी दिशा-निर्देश केवल कागज पर रह जाते हैं.

दवा क्षेत्र में सहयोग बड़े पैमाने की ताकत को बचत में बदल सकता है

बड़े पैमाने पर खरीद दवाओं की कीमत कम करने वाली महत्वपूर्ण ताकतों में से एक है. जब किसी कंपनी को यह भरोसा होता है कि बाजार में दवाओं की मांग लगातार बनी रहेगी, तो वह उत्पादन, रजिस्ट्रेशन, पैकेजिंग और सप्लाई में निवेश करने के लिए ज्यादा तैयार होती है.

इसी तरह, जब किसी स्वास्थ्य व्यवस्था के पास कई कंपनियों से दवा लेने का विकल्प होता है और वह आखिरी समय में महंगी खरीद करने से बच सकती है, तो वह ज्यादा भरोसे के साथ कीमत पर बातचीत कर सकती है.

BRICS के जेनेरिक दवा गठबंधन कई तरीकों से बचत करा सकते हैं:

1. ज्यादा कंपनियां बाजार में आएंगी: जब योग्य जेनेरिक दवा निर्माता एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करेंगे, तो खरीदारों के पास ज्यादा विकल्प होंगे और ब्रांडेड दवाओं के एकाधिकार से जुड़ी ऊंची कीमतें कमजोर होंगी.

2. दवाओं की खरीद कम बिखरी होगी: साझा मांग से बार-बार अलग-अलग टेंडर निकालने की जरूरत कम हो सकती है और बातचीत की ताकत बढ़ सकती है.

3. नियामक संस्थाएं जानकारी साझा करेंगी: तकनीकी सहयोग से सुरक्षा और गुणवत्ता बनाए रखते हुए अनावश्यक देरी कम की जा सकती है.

4. सप्लाई चेन ज्यादा मजबूत होगी: क्षेत्रीय उत्पादन और अलग-अलग स्रोतों से दवा खरीदने पर किसी एक कंपनी या एक रास्ते पर निर्भरता कम होगी.

5. सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी कानूनी छूट का बेहतर इस्तेमाल होगा: जब कानूनी, तकनीकी और कूटनीतिक मदद उपलब्ध होगी, तब देश इन विकल्पों का इस्तेमाल करने के लिए ज्यादा तैयार होंगे.

इनका फायदा केवल पैसे की बचत तक सीमित नहीं है. कम कीमत वाली दवाएं सरकारों को ज्यादा लोगों को इलाज की सूची में शामिल करने, क्लीनिकों में दवाओं का स्टॉक बनाए रखने और मरीजों के पैसे की वजह से इलाज छोड़ने का खतरा कम करने में मदद कर सकती हैं.

सार्वजनिक स्वास्थ्य के नजरिए से सस्ती दवा भी इलाज की प्रभावशीलता का हिस्सा है. जिस दवा तक मरीज पहुंच ही नहीं सकता, वह उसके स्वास्थ्य में सुधार नहीं कर सकती.

गुणवत्ता, भरोसा और नियमन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

सस्ती दवाएं तभी मदद करती हैं, जब मरीज और डॉक्टर उन पर भरोसा करें. इसलिए BRICS के किसी भी दवा सहयोग में गुणवत्ता सुनिश्चित करना सबसे जरूरी चीजों में से एक होना चाहिए. अगर गठबंधन केवल कीमत पर ध्यान देगा, तो नकली दवाओं, कमजोर निगरानी, खराब उत्पादन व्यवस्था और लोगों के भरोसे की कमी जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं.

WHO की प्री-क्वालिफिकेशन व्यवस्था और मजबूत राष्ट्रीय नियामक संस्थाएं अच्छी गुणवत्ता वाली दवाओं पर भरोसा बढ़ाने में महत्वपूर्ण हैं. WHO के अनुसार, दवाओं की प्री-क्वालिफिकेशन व्यवस्था ने कीमतों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ाई है और HIV/AIDS, टीबी और मलेरिया जैसे क्षेत्रों में उपलब्ध पैसे से ज्यादा मरीजों का इलाज करने में मदद की है.

विकासशील देशों के लिए सस्ती और अच्छी गुणवत्ता वाली दवाओं का यह मेल ही असली लक्ष्य है. इसलिए एक मजबूत गठबंधन में ये चीजें होनी चाहिए:

  • दवाओं की स्पष्ट गुणवत्ता और बायोइक्विवेलेंस यानी समान प्रभाव से जुड़े मानक.
  • दवा आपूर्तिकर्ताओं की पारदर्शी जांच और चयन.
  • जहां जरूरी हो, वहां साझा निरीक्षण या एक-दूसरे की नियामक जांच पर भरोसे की व्यवस्था.
  • बाजार में आने के बाद दवाओं की सुरक्षा और गुणवत्ता की निगरानी.
  • दवाओं की कमी और उनके खराब प्रभावों की जानकारी साझा करने वाली क्षेत्रीय व्यवस्था.

ऐसी खरीद व्यवस्था जिसमें केवल सबसे कम कीमत नहीं, बल्कि भरोसेमंद सप्लाई को भी महत्व मिले. यहां लोगों तक सही जानकारी पहुंचाना भी जरूरी है.

मरीज जब ‘जेनेरिक’ शब्द सुनते हैं तो कई बार उन्हें लगता है कि यह कम गुणवत्ता वाली दवा है. सरकारों, डॉक्टरों, फार्मासिस्टों और सामाजिक संगठनों को समझाना होगा कि गुणवत्ता मानकों पर खरी उतरने वाली जेनेरिक दवाओं की तय मानकों के अनुसार जांच होती है और वे कम कीमत में उसी चिकित्सकीय उद्देश्य को पूरा कर सकती हैं.

गठबंधन के जरिए दवाओं तक पहुंच की सीमाएं और जोखिम

BRICS का सहयोग उम्मीद जगाता है, लेकिन यह दवाओं की ऊंची कीमत का कोई आसान समाधान नहीं है. पेटेंट से जुड़ी व्यवस्थाएं जटिल हो सकती हैं. कुछ नई दवाओं में बायोलॉजिक्स, डेटा एक्सक्लूसिविटी, व्यापारिक रहस्य, जटिल उत्पादन प्रक्रिया या दवा और मेडिकल डिवाइस का संयुक्त इस्तेमाल शामिल हो सकता है.

कानूनी तौर पर दवा तक पहुंच संभव होने के बावजूद उसके उत्पादन के लिए तकनीक का हस्तांतरण, विशेष मशीनें, प्रशिक्षित कर्मचारी और भरोसेमंद कच्चे माल की जरूरत पड़ सकती है.

भू-राजनीति भी इस सहयोग को प्रभावित कर सकती है. BRICS के सभी देशों के हित हमेशा एक जैसे नहीं होते. दवा कंपनियों और आपूर्तिकर्ताओं को प्रतिबंधों, मुद्रा के जोखिम, शिपिंग की दिक्कतों या अलग-अलग नियामक नियमों का सामना करना पड़ सकता है.

राजनीतिक रूप से मजबूत दिखने वाला गठबंधन भी जमीन पर मुश्किल में पड़ सकता है, अगर दवा खरीदने वाली एजेंसियां समयसीमा या भुगतान व्यवस्था पर सहमत न हो पाएं.

नई दवाओं के विकास के लिए मिलने वाले प्रोत्साहन को लेकर भी एक सही चिंता है. दवाओं तक पहुंच की बेहतर रणनीति को गलत तरीके से इस्तेमाल किए जा रहे एकाधिकार और नई दवाओं के शोध को कमजोर करने के बीच अंतर करना होगा.

एक संतुलित व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जो नई दवाओं के शोध को बढ़ावा दे, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य की आपात स्थिति, जरूरी दवाओं और उन बीमारियों के इलाज को महंगी कीमतों के कारण लोगों की पहुंच से बाहर न होने दे, जिन पर पर्याप्त शोध नहीं होता.

विकासशील देशों के लिए व्यावहारिक रास्ता

सरकारों और स्वास्थ्य से जुड़े संगठनों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं होना चाहिए कि पेटेंट या जेनेरिक दवाएं ‘अच्छी’ हैं या ‘बुरी’. बेहतर सवाल यह है कि ऐसी व्यवस्था कैसे बनाई जाए, जो वास्तविक नई खोजों को बढ़ावा दे और साथ ही जरूरी दवाओं को लोगों तक पहुंचाना सुनिश्चित करे.

दवाओं तक पहुंच बढ़ाने की एक व्यावहारिक योजना में ये कदम शामिल हो सकते हैं:

  • उन जरूरी दवाओं की पहचान करना, जिनकी कीमत, पेटेंट या कमी के कारण इलाज प्रभावित हो रहा है.
  • राष्ट्रीय कानूनों को इस तरह अपडेट करना कि TRIPS में दी गई छूट का संकट आने से पहले ही इस्तेमाल किया जा सके.
  • जहां जरूरत और मांग समान हो, वहां क्षेत्रीय या BRICS से जुड़ी दवा खरीद योजनाओं में शामिल होना.
  • नियामक संस्थाओं की क्षमता, गुणवत्ता जांच और दवाओं की सुरक्षा निगरानी में निवेश करना.
  • जहां आर्थिक और तकनीकी रूप से संभव हो, वहां स्थानीय दवा उत्पादन को बढ़ावा देना.
  • जब इससे बड़े स्तर पर दवाओं की पहुंच बढ़े, तब स्वैच्छिक लाइसेंस और तकनीक हस्तांतरण को प्रोत्साहित करना.
  • जब सार्वजनिक स्वास्थ्य की जरूरत इसकी मांग करे और दूसरे रास्ते काम न करें, तब अनिवार्य लाइसेंस का इस्तेमाल करना.
  • खरीद से जुड़े आंकड़ों को सार्वजनिक करना, ताकि पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़े.
  • सबसे मजबूत गठबंधन वे होंगे, जो केवल प्रतीकात्मक न हों बल्कि व्यावहारिक काम करें.
  • इनमें मंत्री, नियामक संस्थाएं, दवा निर्माता, डॉक्टर, मरीजों के संगठन और वित्तीय संस्थाएं मिलकर किसी खास दवा और उससे जुड़ी पहुंच की समस्या पर काम करें.

निष्कर्ष

पेटेंट के एकाधिकार को तोड़ने का मतलब दवा क्षेत्र में नई खोज और नए इलाज के खिलाफ होना नहीं है. इसका मतलब यह है कि जब कानूनी रास्ते और दवा बनाने की क्षमता मौजूद हो और सुरक्षित व सस्ती दवाएं उपलब्ध कराई जा सकती हों, तब दवा पर विशेष अधिकार को इंसानी जिंदगी से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं माना जाना चाहिए.

ये भी पढ़ें- क्या IBSA अब भी मायने रखता है? BRICS के भीतर भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका का लोकतांत्रिक आधार

BRICS के जेनेरिक दवा गठबंधन विकासशील देशों को अलग-अलग दवाओं की कीमत पर बातचीत करने की स्थिति से निकालकर मिलकर दवा क्षेत्र में सहयोग करने की दिशा में ले जा सकते हैं. जब ये देश गुणवत्ता सुनिश्चित करने, एक साथ बड़ी मात्रा में दवाएं खरीदने, नियामक सहयोग और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए उपलब्ध कानूनी विकल्पों का समझदारी से इस्तेमाल करते हैं, तो वे स्वास्थ्य खर्च कम कर सकते हैं.

साथ ही, वे दवाओं की उपलब्धता को ज्यादा स्थिर, न्यायपूर्ण और संकट के समय भी मजबूत बना सकते हैं.

-भारत एक्सप्रेस

Prashant Kumar

CEO – Bharat Express Digital Chief Advisor to the Chairman & Managing Director and Editor-in-Chief Mr. Prashant Kumar is a digital, media and growth transformation leader with 18+ years of experience across strategy, technology, AI, marketing and business transformation, having worked with leading organisations including Amazon, IBM, Adidas and Tata Consumer Products. At Bharat Express, he leads digital transformation, audience growth, technology, partnerships, monetisation and new business initiatives to build a scalable, future-ready media ecosystem.

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