BRICS के भीतर भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका का लोकतांत्रिक आधार (इमेज-AI)
Importance Of IBSA: IBSA आज भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका को एक बड़े और अलग-अलग राजनीतिक सोच वाले BRICS समूह के भीतर एक छोटे लोकतांत्रिक मंच पर साथ आने का मौका देता है. BRICS जहां बड़े स्तर, वित्त और ग्लोबल साउथ की सौदेबाजी की ताकत के लिए उपयोगी है, वहीं IBSA इन तीनों देशों को लोकतंत्र, विकास, वैश्विक संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों के बीच व्यावहारिक सहयोग जैसे मुद्दों पर साथ काम करने का मौका देता है.
इसका नतीजा यह है कि IBSA, BRICS का कोई विकल्प नहीं है, बल्कि उसके भीतर एक लोकतांत्रिक आधार है. यह BRICS में विकास से जुड़े मुद्दों को ज्यादा संतुलित, भरोसेमंद और आम लोगों की जरूरतों से जुड़ा बनाने में मदद कर सकता है.
BRICS के भीतर IBSA अब भी क्यों महत्वपूर्ण है?
BRICS के भीतर IBSA इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके तीनों देशों की एक ऐसी राजनीतिक पहचान है, जो पूरे BRICS में नहीं है. भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका बड़े, बहुलतावादी, अलग-अलग समुदायों वाले लोकतांत्रिक देश हैं और तीन अलग-अलग महाद्वीपों का प्रतिनिधित्व करते हैं.
यह समानता उन्हें विकास, वैश्विक संस्थाओं में सुधार, व्यापार, जलवायु, कर्ज, खाद्य सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर एक अलग भूमिका देती है. BRICS में IBSA की भूमिका तब सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है, जब किसी मुद्दे पर लोकतांत्रिक समर्थन, अलग-अलग क्षेत्रों के बीच भरोसे और विकासशील देशों की जरूरतों को ध्यान में रखने वाली सोच की जरूरत होती है.
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि BRICS बदल चुका है. अब यह केवल ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का समूह नहीं है. इसका विस्तार हुआ है और 2024 के बाद इसमें नए सदस्य भी शामिल हुए हैं. इससे BRICS का प्रभाव बढ़ा है, लेकिन इसके भीतर राजनीतिक सोच और प्राथमिकताएं भी पहले से ज्यादा अलग हो गई हैं.
ऐसे में एक छोटे लोकतांत्रिक समूह की अहमियत बढ़ जाती है. बड़े मंच पर सहमति बन सकती है, लेकिन कई बार वह बहुत सामान्य होती है. IBSA भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका को BRICS की बड़ी बातचीत में जाने से पहले अपनी सोच और रणनीति तय करने का मौका देता है. खासकर तब, जब उन्हें बड़े देशों की रणनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल हुए बिना विकासशील देशों के हितों की बात करनी हो.
IBSA के तीनों देश तीन महाद्वीपों की साझा पहचान रखते हैं
IBSA को 6 जून 2003 को ब्रासीलिया में औपचारिक रूप दिया गया था. उस समय भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के विदेश मंत्रियों ने ब्रासीलिया घोषणा पर हस्ताक्षर किए थे.
दक्षिण अफ्रीका सरकार IBSA को दक्षिण-दक्षिण सहयोग और विकास को बढ़ावा देने वाली तीन देशों की पहल बताती है. इसके उद्देश्यों में अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर साझा रुख बनाना, व्यापार और निवेश के अवसर बढ़ाना, गरीबी कम करना, सामाजिक विकास को बढ़ावा देना और कृषि, जलवायु परिवर्तन, संस्कृति, शिक्षा, ऊर्जा, स्वास्थ्य, विज्ञान, तकनीक, पर्यटन और परिवहन जैसे क्षेत्रों में सहयोग शामिल हैं.
इस मंच की संरचना सोच-समझकर बनाई गई थी. भारत एशिया की एक बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति है और उसके पास गुटनिरपेक्षता और विकास से जुड़ी कूटनीति का लंबा अनुभव है. ब्राजील लैटिन अमेरिका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और व्यापार, जलवायु और सामाजिक नीतियों से जुड़े मुद्दों पर अलग-अलग देशों को साथ लाने की उसकी पुरानी भूमिका रही है. दक्षिण अफ्रीका रंगभेद के बाद बने लोकतांत्रिक देश के रूप में अपनी पहचान रखता है और अफ्रीका में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है. उसकी विदेश नीति में समानता, प्रतिनिधित्व और बातचीत के जरिए समाधान पर जोर रहा है.
इन तीनों देशों ने मिलकर ऐसा मंच बनाया, जो न तो पश्चिमी देशों के नेतृत्व वाला था और न ही किसी सत्तावादी व्यवस्था के नेतृत्व वाला. यह बीच की स्थिति आज भी महत्वपूर्ण है. IBSA संप्रभुता और विकास की भाषा में बात कर सकता है, लेकिन साथ ही लोकतांत्रिक व्यवस्था, चुनाव, संविधान, नागरिक समाज और अलग-अलग समुदायों के साथ शासन चलाने के अपने अनुभव को भी सामने रख सकता है.
समानता पर बना मंच, एक जैसी सोच पर नहीं
IBSA इसलिए ताकतवर नहीं है कि तीनों देश हर मामले में एक जैसे हैं. उनकी अर्थव्यवस्थाएं, सुरक्षा संबंधी चिंताएं, घरेलू राजनीति और क्षेत्रीय प्राथमिकताएं अलग हैं.
भारत की रणनीतिक सोच पर एशिया और हिंद महासागर का बड़ा असर है. ब्राजील की विदेश नीति में दक्षिण अमेरिका, अटलांटिक, कृषि, जलवायु और अंतरराष्ट्रीय व्यापार जैसे मुद्दे प्रमुख हैं. दक्षिण अफ्रीका पर एक देश के साथ-साथ पूरे अफ्रीकी महाद्वीप की उम्मीदों का भी दबाव रहता है.
इसके बावजूद इन देशों की एक साझा स्थिति है. तीनों बड़े विकासशील लोकतांत्रिक देश हैं और वैश्विक संस्थाओं में अपनी आवाज को मजबूत करना चाहते हैं. तीनों औद्योगिक विकास, आधुनिक बुनियादी ढांचे, सामाजिक विकास और वैश्विक नियम बनाने में ज्यादा भूमिका चाहते हैं.
IBSA इन समानताओं को कूटनीतिक सहयोग में बदलने का एक माध्यम देता है.
लोकतांत्रिक आधार एक रणनीतिक ताकत है
‘लोकतांत्रिक आधार’ का मतलब यह नहीं है कि IBSA केवल लोकतंत्र फैलाने वाला गठबंधन है. इसका मतलब यह है कि भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका ग्लोबल साउथ की कूटनीति में लोकतंत्र, जवाबदेही, अधिकार, सामाजिक भागीदारी, संस्थागत सुधार और बातचीत की भाषा लेकर आते हैं.
19 नवंबर 2024 को जारी IBSA नेताओं के बयान में तीनों देशों को बहुलतावादी, अलग-अलग संस्कृतियों और समुदायों वाले लोकतंत्र बताया गया. इसमें वैश्विक संस्थाओं में सुधार, लोकतंत्र, मानवाधिकार, समान संप्रभुता, अंतरराष्ट्रीय कानून, कूटनीति और सतत विकास जैसे मूल्यों पर जोर दिया गया.
BRICS के भीतर IBSA की उपयोगिता यहीं सामने आती है. BRICS में अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं, पश्चिमी देशों के साथ अलग-अलग संबंधों और अलग-अलग सुरक्षा प्राथमिकताओं वाले देश शामिल हैं. जब BRICS वैश्विक व्यवस्था में सुधार, विकास के लिए वित्त या बहुध्रुवीय दुनिया की बात करता है, तब IBSA इन मुद्दों को ऐसे तरीके से सामने रखने में मदद कर सकता है, जिसे केवल पश्चिम विरोधी सोच के रूप में नहीं देखा जाए.
यही IBSA की व्यावहारिक भूमिका है. वैश्विक व्यवस्था में बदलाव की मांग तभी ज्यादा प्रभावी होगी, जब वह केवल मौजूदा व्यवस्था की शिकायत न हो. उसके पास एक भरोसेमंद विकल्प भी होना चाहिए.
भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका यह तर्क दे सकते हैं कि वैश्विक संस्थाओं को ज्यादा प्रतिनिधित्व वाला बनाया जाना चाहिए, लेकिन नियम आधारित व्यवस्था को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए. संस्थाएं ज्यादा समावेशी होनी चाहिए, केवल लेन-देन पर आधारित नहीं. और विकासशील देशों की जरूरतों को ज्यादा महत्व मिलना चाहिए, न कि दुनिया को और ज्यादा खेमों में बांटा जाना चाहिए.
लोकतांत्रिक विश्वसनीयता विकास की कूटनीति को मजबूत करती है
विकास का मतलब केवल सड़क, बंदरगाह, ऊर्जा परियोजना, डिजिटल नेटवर्क या पानी की सुविधा बनाना नहीं है. यह भी महत्वपूर्ण है कि फैसला कौन लेता है, उसका फायदा किसे मिलता है, किससे सलाह ली जाती है और क्या सरकारी संस्थाएं उस पैसे को आम लोगों तक पहुंचा पाती हैं.
लोकतांत्रिक व्यवस्था पूरी तरह सही नहीं होती, लेकिन संसद, अदालत, मीडिया, चुनाव, स्थानीय सरकार और नागरिक समाज के जरिए नीतियों को ज्यादा जवाबदेह बनाने के रास्ते मौजूद रहते हैं.
BRICS के विकास से जुड़े मुद्दों पर भी यह महत्वपूर्ण है. न्यू डेवलपमेंट बैंक को BRICS देशों ने उभरते और विकासशील देशों में बुनियादी ढांचे और सतत विकास की परियोजनाओं के लिए वित्त जुटाने के उद्देश्य से बनाया है.
इसके प्रमुख क्षेत्रों में स्वच्छ ऊर्जा, परिवहन, पानी और स्वच्छता, डिजिटल बुनियादी ढांचा, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक बुनियादी ढांचा शामिल हैं.
IBSA ऐसे वित्तपोषण में सामाजिक हितों को ज्यादा महत्व देने की कोशिश कर सकता है. यह सवाल उठा सकता है कि क्या बुनियादी ढांचा गरीब और पिछड़े इलाकों तक पहुंच रहा है? क्या जलवायु परियोजनाओं में केवल प्रदूषण कम करने पर जोर है या आपदा से बचाव पर भी? क्या डिजिटल व्यवस्था नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है? और क्या विकास के लिए दिया गया पैसा देशों की अपनी जरूरतों के अनुसार इस्तेमाल हो रहा है?
लोकतांत्रिक आधार की अपनी सीमाएं भी हैं
IBSA की लोकतांत्रिक पहचान को जरूरत से ज्यादा आदर्श रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका तीनों देशों में असमानता, राजनीतिक ध्रुवीकरण, संस्थाओं पर दबाव, सामाजिक भरोसे, सरकारी सेवाओं और प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता को लेकर बहस होती रहती है.
उनके लोकतंत्र बड़े और महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे पूरी तरह समस्याओं से मुक्त नहीं हैं.
यही बात IBSA को विश्वसनीय भी बनाती है. ये देश किसी आदर्श दुनिया से बात नहीं करते. वे विकास के दबाव के बीच बड़े पैमाने पर लोकतंत्र चलाने के अपने अनुभव से बात करते हैं. वे जानते हैं कि लोकतांत्रिक विकास में समझौते, राजनीति, सीमित सरकारी क्षमता और विकास, सामाजिक हिस्सेदारी, पहचान और अधिकारों के बीच लगातार संतुलन बनाना पड़ता है.
IBSA BRICS का मुकाबला नहीं, उसका सहयोगी कैसे है?
IBSA BRICS का पूरक है, क्योंकि तीन देशों का छोटा और साझा मूल्यों वाला मंच कुछ ऐसे काम कर सकता है, जो बड़े रणनीतिक समूह के लिए मुश्किल होते हैं.
BRICS के पास ताकत है—बड़ी आबादी, बड़े बाजार, वित्त, कच्चे माल पर प्रभाव, वैश्विक पहचान और बातचीत की बड़ी क्षमता. IBSA के पास एकरूपता है—तीन देशों का ऐसा लोकतांत्रिक समूह, जो विचारों को परख सकता है, साझा संदेश तैयार कर सकता है और विकास के मुद्दों को समावेशी शासन से जोड़ सकता है.
दोनों मंच अलग-अलग जरूरतें पूरी करते हैं.
BRICS तब उपयोगी है, जब उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाएं वित्त, व्यापार और वैश्विक संस्थाओं में पुराने शक्ति संतुलन को चुनौती देना चाहती हैं.
वहीं IBSA तब उपयोगी है, जब भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका BRICS, G20, संयुक्त राष्ट्र, जलवायु वार्ता या विकास वित्त से जुड़े मंचों पर जाने से पहले आपस में अपनी स्थिति तय करना चाहते हैं.
BRICS देता है बड़ा मंच
BRICS कई देशों के लिए इसलिए आकर्षक है क्योंकि यह पारंपरिक पश्चिमी संस्थाओं के बाहर विकास और साझेदारी के ज्यादा विकल्प देता है.
न्यू डेवलपमेंट बैंक इसका सबसे ठोस उदाहरण है. इसका उद्देश्य उभरते और विकासशील देशों में बुनियादी ढांचे और सतत विकास के लिए वित्त उपलब्ध कराना है.
बड़े मंच की अपनी ताकत होती है. इससे ध्यान, पूंजी, शिखर सम्मेलन की कूटनीति और बातचीत की ताकत बढ़ती है. विकासशील देशों को कर्ज, मुद्रा, सप्लाई चेन, तकनीक, जलवायु वित्त और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर ज्यादा मजबूती से बात रखने का मौका मिलता है.
लेकिन बड़े समूह के साथ जटिलताएं भी बढ़ती हैं. जैसे-जैसे सदस्य बढ़ते हैं, साझा राजनीतिक पहचान बनाए रखना मुश्किल होता जाता है.
BRICS वैश्विक व्यवस्था में सुधार जैसे मुद्दों पर व्यापक सहमति बना सकता है, लेकिन सुरक्षा संघर्ष, प्रतिबंध, व्यापार पर निर्भरता, क्षेत्रीय विवाद और बहुध्रुवीय दुनिया की परिभाषा जैसे मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच मतभेद हो सकते हैं.
IBSA देता है एकरूपता
IBSA का छोटा आकार इस जटिलता को कम करता है. तीन देशों के लिए बड़े समूह की तुलना में आपस में तालमेल बनाना आसान है.
वे उन मुद्दों पर ध्यान दे सकते हैं, जहां उनके हित मिलते हैं. इसके लिए जरूरी नहीं कि BRICS के सभी देश भी उसी सोच से सहमत हों.
यही IBSA को एजेंडा तय करने के लिए उपयोगी बनाता है. भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका विकास, लोकतंत्र, गरीबी कम करने, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, डिजिटल समावेशन, जलवायु और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर अपनी सोच तैयार कर सकते हैं और फिर उसे बड़े मंचों पर ले जा सकते हैं.
इससे सफलता की गारंटी नहीं होती, लेकिन बड़े मंच पर जाने से पहले अपनी स्थिति स्पष्ट करने में मदद मिलती है.
IBSA BRICS को केवल एक दिशा में जाने से रोक सकता है
BRICS के सामने एक जोखिम यह है कि बाहर की दुनिया उसे केवल चीन-रूस संबंधों, पश्चिम विरोधी संकेतों, मुद्रा की राजनीति या भू-राजनीतिक टकराव के नजरिए से देखे.
यह तस्वीर पूरी नहीं है. BRICS के कई सदस्य और साझेदार व्यावहारिक विकास चाहते हैं, न कि किसी विचारधारा के साथ खड़े होना.
IBSA इस तस्वीर को व्यापक बनाने में मदद करता है. यह याद दिलाता है कि BRICS में ऐसे लोकतांत्रिक देश भी हैं, जो मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में सुधार चाहते हैं.
भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका ज्यादा प्रतिनिधित्व वाली वैश्विक व्यवस्था चाहते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि वे नियम आधारित व्यवस्था को खत्म करना चाहते हों. वे बहुध्रुवीय दुनिया का समर्थन कर सकते हैं और साथ ही बातचीत, अंतरराष्ट्रीय कानून, संस्थाओं और सतत विकास का समर्थन भी कर सकते हैं.
IBSA की तीन प्रमुख भूमिकाएं
IBSA की भूमिका को तीन मुख्य कामों के जरिए आसानी से समझा जा सकता है. यह केवल प्रतीकात्मक समूह नहीं है.
इसकी आधिकारिक व्यवस्था तीन क्षेत्रों पर आधारित है—वैश्विक और क्षेत्रीय राजनीतिक मुद्दों पर बातचीत और तालमेल, कार्य समूहों और लोगों के बीच संपर्क के जरिए तीनों देशों का सहयोग, और IBSA फंड के जरिए अन्य विकासशील देशों की मदद.
1. राजनीतिक तालमेल
राजनीतिक तालमेल IBSA की सबसे दिखाई देने वाली भूमिका है.
भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका वैश्विक संस्थाओं में सुधार, अंतरराष्ट्रीय आर्थिक नियमों, जलवायु, सतत विकास, शांति, सुरक्षा और विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर अपनी स्थिति पर चर्चा करते हैं.
यह तालमेल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तीनों देश कई अलग-अलग कूटनीतिक मंचों का हिस्सा हैं.
भारत एशिया, इंडो-पैसिफिक, BRICS, G20 और संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी चर्चाओं में सक्रिय है. ब्राजील लैटिन अमेरिका, अटलांटिक, जलवायु, कृषि, BRICS, G20 और संयुक्त राष्ट्र के मंचों पर सक्रिय है. दक्षिण अफ्रीका अफ्रीकी संघ, BRICS, G20, संयुक्त राष्ट्र और दक्षिण-दक्षिण सहयोग के मंचों पर काम करता है.
IBSA इन सभी मंचों को आपस में जोड़ने में मदद करता है.
इसका एक बड़ा फायदा यह है कि तीनों देशों के संदेश में तालमेल रहता है. जब तीन बड़े लोकतांत्रिक देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार, विकास के लिए बेहतर वित्त, जलवायु से प्रभावित देशों की मदद या खाद्य सुरक्षा जैसे मुद्दों पर समान भाषा बोलते हैं, तो उनकी मांग को नजरअंदाज करना मुश्किल होता है.
2. तीन देशों के बीच व्यावहारिक सहयोग
IBSA तीनों देशों के बीच अलग-अलग क्षेत्रों में सहयोग भी बढ़ाता है. इसमें कृषि, जलवायु परिवर्तन, संस्कृति, रक्षा, शिक्षा, ऊर्जा, स्वास्थ्य, विज्ञान और तकनीक, सामाजिक विकास, व्यापार और निवेश, पर्यटन और परिवहन जैसे क्षेत्र शामिल हैं.
यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विकास की समस्याएं केवल राजनीतिक बयान से हल नहीं होतीं. देशों को नीतियां, तकनीकी क्षमता, प्रशिक्षण, सरकारी अनुभव और अधिकारियों, विशेषज्ञों, कारोबारियों, विश्वविद्यालयों और नागरिक समाज के बीच नेटवर्क की जरूरत होती है.
IBSA के कार्य समूह और लोगों के बीच संपर्क से ऐसे अनुभव साझा किए जा सकते हैं.
उदाहरण के लिए, तीनों देश डिजिटल सार्वजनिक व्यवस्था, नवीकरणीय ऊर्जा, स्कूलों में भोजन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, छोटे कारोबार, कृषि से जुड़ी चुनौतियों और शहरी परिवहन के अपने अनुभव साझा कर सकते हैं.
इसका मतलब यह नहीं कि एक देश दूसरे की व्यवस्था को ज्यों का त्यों अपनाए. असली फायदा यह है कि किसी दूसरे देश के अनुभव से सीखकर उसे अपनी जरूरत के अनुसार बदला जाए.
3. IBSA फंड के जरिए विकास सहयोग
IBSA फंड इस मंच की सबसे ठोस विकास पहल है. इसे मार्च 2004 में भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका ने मिलकर गरीबी और भूख कम करने के लिए बनाया था.
IBSA की आधिकारिक व्यवस्था में विकासशील देशों की मदद करना इस मंच के तीन प्रमुख स्तंभों में से एक है. 2024 के IBSA नेताओं के बयान में भी इस फंड को मजबूत करने, इसका विस्तार करने और इसे बढ़ावा देने की बात कही गई थी.
यह फंड इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दक्षिण-दक्षिण सहयोग को जमीन पर दिखाता है. सिर्फ पुराने दानदाता देशों और संस्थाओं से बदलाव की मांग करने के बजाय IBSA देश खुद संसाधन और अनुभव साझा करके दूसरे विकासशील देशों की मदद करते हैं.
इससे उनकी कूटनीति को व्यावहारिक विश्वसनीयता मिलती है. यह IBSA को केवल बयान देने वाले मंचों से अलग भी बनाता है. घोषणाएं जरूरी हैं, लेकिन संस्थाएं और जमीन पर चलने वाली परियोजनाएं ज्यादा महत्वपूर्ण होती हैं. विकास पर केंद्रित फंड IBSA को अपने विचारों और नीतियों को वास्तविक काम से जोड़ने का मौका देता है.
BRICS के विकास के लिए IBSA क्यों महत्वपूर्ण है?
IBSA इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बड़े स्तर के वित्त और वैश्विक व्यवस्था में सुधार को मानव विकास से जोड़ सकता है.
BRICS का विकास एजेंडा अक्सर बुनियादी ढांचे, सतत विकास, वैकल्पिक वित्त और विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करने पर केंद्रित रहता है. IBSA इसमें गरीबी कम करने, लोकतांत्रिक जवाबदेही, सामाजिक समावेशन और अलग-अलग विकासशील देशों के अनुभव साझा करने पर ज्यादा जोर जोड़ सकता है. यह अंतर छोटा नहीं है.
कोई विकास बैंक बुनियादी ढांचे के लिए पैसा दे सकता है, लेकिन विकास की रणनीति में कई फैसले लेने पड़ते हैं. क्या पैसा बड़े एक्सपोर्ट कॉरिडोर पर खर्च होना चाहिए या स्थानीय सुविधाओं पर? क्या ऊर्जा निवेश का ध्यान केवल बिजली उत्पादन पर होना चाहिए या बिजली की कीमत और आपदा से बचाव पर भी? क्या डिजिटल बुनियादी ढांचा केवल देश की आर्थिक ताकत बढ़ाए या आम नागरिकों को भी इसका फायदा मिले? IBSA इन सवालों को चर्चा में बनाए रख सकता है.
विकास के एजेंडे के लिए सिर्फ पैसा काफी नहीं
पैसा जरूरी है, लेकिन केवल पैसा काफी नहीं है. देशों को ऐसी संस्थाओं की भी जरूरत होती है, जो योजना बना सकें, खरीद प्रक्रिया संभाल सकें, परियोजनाओं का रखरखाव कर सकें, लोगों से सलाह ले सकें, पर्यावरण का ध्यान रख सकें और लंबे समय तक काम को आगे बढ़ा सकें.
भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका ने लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर बड़े स्तर पर सामाजिक और विकास कार्यक्रम चलाए हैं.
इनका अनुभव उन्हें यह समझने में मदद करता है कि बड़े पैमाने पर योजनाएं कैसे लागू की जाती हैं, अलग-अलग समुदायों की जरूरतों को कैसे संतुलित किया जाता है, राष्ट्रीय नीतियों को स्थानीय जरूरतों से कैसे जोड़ा जाता है और जब किसी नीति से कुछ लोगों को फायदा और कुछ को नुकसान हो तो उसकी राजनीतिक स्वीकार्यता कैसे बनाए रखी जाती है.
यही वजह है कि IBSA BRICS के विकास एजेंडे को ज्यादा गहराई दे सकता है. यह बुनियादी ढांचे की चर्चा में सामाजिक सवाल और वित्तीय चर्चा में लोकतांत्रिक शासन से जुड़े सवाल जोड़ सकता है.
खाद्य सुरक्षा, जलवायु और सार्वजनिक सुविधाएं IBSA के स्वाभाविक मुद्दे हैं
खाद्य सुरक्षा, जलवायु से निपटने की क्षमता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और डिजिटल समावेशन IBSA के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण मुद्दे हैं.
इनका असर बड़ी आबादी पर पड़ता है. इनके लिए मजबूत सरकारी व्यवस्था की जरूरत होती है और इनमें घरेलू नीति के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी जरूरी होता है.
ब्राजील की कृषि और पर्यावरण से जुड़ी भूमिका, भारत का डिजिटल क्षेत्र और बड़े पैमाने पर विकास योजनाओं को लागू करने का अनुभव और दक्षिण अफ्रीका की अफ्रीकी नीतियों से जुड़ी भूमिका मिलकर सहयोग के कई अवसर पैदा करती है.
इसका मतलब यह नहीं कि किसी एक देश के पास हर समस्या का समाधान है. असली फायदा यह है कि तीनों देशों ने सीमित संसाधनों के बीच विकास की चुनौतियों का सामना किया है.
BRICS के भीतर यह अनुभव जलवायु के लिए वित्त, गरीबी कम करने, कृषि को मजबूत करने, स्वास्थ्य व्यवस्था और समावेशी तकनीक जैसे मुद्दों को ज्यादा महत्व दिला सकता है.
इन मुद्दों से BRICS की बात विकासशील देशों के आम लोगों की जरूरतों से जुड़ती है, केवल सरकारों की महत्वाकांक्षाओं से नहीं.
वैश्विक संस्थाओं में सुधार में IBSA की भूमिका
वैश्विक संस्थाओं में सुधार IBSA के सबसे मजबूत साझा मुद्दों में से एक है.
भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका लंबे समय से कहते रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को आज की राजनीतिक और आर्थिक वास्तविकताओं के हिसाब से बदलना चाहिए.
2024 के IBSA नेताओं के बयान में वैश्विक संस्थाओं में तत्काल और व्यापक सुधार की जरूरत बताई गई थी. इसमें ज्यादा प्रतिनिधित्व वाली और ज्यादा जवाबदेह बहुपक्षीय व्यवस्था पर जोर दिया गया था. यह BRICS की सोच से काफी हद तक मेल खाता है.
BRICS भी खुद को ऐसे मंच के रूप में पेश करता रहा है, जहां उभरते और विकासशील देश उन संस्थाओं में ज्यादा प्रभाव चाहते हैं, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद और बाद के दशकों में पश्चिमी आर्थिक ताकत के दौर में बनी थीं. लेकिन IBSA इस मांग को एक अलग विश्वसनीयता देता है, क्योंकि इसके तीनों सदस्य तीन महाद्वीपों के लोकतांत्रिक देशों का प्रतिनिधित्व करते हैं.
व्यवस्था में सुधार, उसे खत्म करना नहीं
IBSA का एक बड़ा योगदान यह विचार हो सकता है कि वैश्विक व्यवस्था में सुधार किया जाए, लेकिन उसे पूरी तरह खारिज न किया जाए.
भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका वैश्विक संस्थाओं में कम प्रतिनिधित्व की आलोचना कर सकते हैं, लेकिन साथ ही बहुपक्षीय व्यवस्था, कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय कानून और बातचीत के जरिए समाधान को भी महत्व दे सकते हैं. यह अंतर महत्वपूर्ण है. कई विकासशील देश अधिक न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था चाहते हैं, न कि ऐसी दुनिया जहां केवल ताकतवर देश अपने नियम चलाएं. वे संयुक्त राष्ट्र, वित्तीय संस्थाओं, जलवायु वार्ता, तकनीक और व्यापार के नियमों में ज्यादा आवाज चाहते हैं. IBSA इस मांग को मजबूत लेकिन संतुलित तरीके से सामने रखने में मदद कर सकता है.
विकासशील और विकसित देशों के बीच एक पुल
2024 के IBSA नेताओं के बयान में कहा गया था कि इसके सिद्धांत और मूल्य विकासशील और विकसित देशों के बीच पुल का काम कर सकते हैं. यही IBSA की खास भूमिका है.
भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका विकासशील देशों से इसलिए जुड़ाव रखते हैं क्योंकि उनकी कई समस्याएं समान हैं. वहीं विकसित लोकतांत्रिक देशों के साथ बातचीत में वे लोकतंत्र और संस्थाओं की साझा भाषा का इस्तेमाल कर सकते हैं.
इसका मतलब यह नहीं है कि तीनों देश हर मुद्दे पर तटस्थ हैं. उनके अपने हित हैं और कई मामलों में मौजूदा वैश्विक शक्ति व्यवस्था को लेकर उनकी तीखी आलोचना भी है.
लेकिन पुल का काम करने के लिए हर मुद्दे पर तटस्थ होना जरूरी नहीं है. जरूरी यह है कि अलग-अलग पक्षों का इतना भरोसा हो कि बातचीत जारी रह सके.
G20 में लगातार तीन साल की भूमिका से IBSA को मजबूती मिली
G20 की हालिया अध्यक्षता की लगातार कड़ी ने IBSA की भूमिका को और महत्वपूर्ण बनाया. भारत ने 2023 में G20 की अध्यक्षता की. इसके बाद 2024 में ब्राजील और 2025 में दक्षिण अफ्रीका ने इसकी अध्यक्षता की.
IBSA नेताओं ने इस क्रम को ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने और उसकी प्राथमिकताओं को G20 के एजेंडे में शामिल करने के अवसर से जोड़ा. यह क्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि G20 में विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाएं और प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं वित्त, विकास, कर्ज, जलवायु, स्वास्थ्य और वैश्विक आर्थिक मामलों पर बातचीत करती हैं.
जब IBSA के तीनों देश लगातार तीन साल तक G20 की अध्यक्षता करते हैं, तो उन्हें कई वर्षों तक समान मुद्दों को आगे बढ़ाने का असामान्य अवसर मिलता है.
2025 में दक्षिण अफ्रीका की G20 अध्यक्षता ने IBSA के अफ्रीकी पक्ष को भी मजबूत किया. 23 नवंबर 2025 को भारत के प्रधानमंत्री ने जोहान्सबर्ग में IBSA नेताओं की बैठक में हिस्सा लिया. यह बैठक अफ्रीकी धरती पर पहली बार आयोजित हुए G20 शिखर सम्मेलन के दौरान ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं पर केंद्रित थी.
G20 से जुड़ाव BRICS के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
G20 और BRICS अलग-अलग तरीके से काम करते हैं.
BRICS ग्लोबल साउथ पर केंद्रित राजनीतिक और विकास मंच है. वहीं G20 में विकसित अर्थव्यवस्थाएं, उभरती अर्थव्यवस्थाएं, यूरोपीय संघ और अफ्रीकी संघ भी शामिल हैं.
IBSA इन दोनों मंचों के बीच विचारों को ले जाने का काम कर सकता है.
उदाहरण के लिए, IBSA देशों के बीच तैयार किया गया कोई प्रस्ताव BRICS में उठाया जा सकता है और फिर उसे G20 में ज्यादा व्यापक समर्थन वाली भाषा में रखा जा सकता है.
इसी तरह G20 में आने वाली चुनौतियां IBSA को यह समझने में मदद कर सकती हैं कि BRICS के भीतर विकास और वैश्विक व्यवस्था में सुधार से जुड़े कौन से प्रस्ताव वास्तव में लागू किए जा सकते हैं.
इस तरह IBSA एक तरह का कूटनीतिक पुल बन जाता है. यह इतना छोटा है कि केंद्रित बातचीत कर सके, इतना बड़ा है कि तीन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कर सके और इतना जुड़ा हुआ है कि बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रभाव डाल सके.
IBSA अब भी क्यों महत्वपूर्ण है?
IBSA की अहमियत को समझना आसान है. इसकी ताकत सुर्खियों में नहीं, बल्कि तालमेल, विश्वसनीयता और निरंतरता में है.
इसके प्रमुख कारण हैं:
BRICS को भीतर से एक लोकतांत्रिक आवाज देता है: भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका यह दिखाते हैं कि बहुध्रुवीय दुनिया की मांग केवल सत्तावादी या पश्चिम विरोधी सोच रखने वाले देशों तक सीमित नहीं है.
तीन बड़े क्षेत्रों को जोड़ता है: IBSA एशिया, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका को बड़े क्षेत्रीय प्रभाव वाले देशों के जरिए जोड़ता है.
विकास को आम लोगों से जोड़ता है: गरीबी, भूख, सामाजिक विकास और व्यावहारिक सहयोग पर इसका ध्यान BRICS के विकास एजेंडे को मजबूत कर सकता है.
सुधार वाली बहुपक्षीय व्यवस्था का समर्थन करता है: IBSA वैश्विक संस्थाओं को बदलने की बात करते हुए भी कूटनीति, नियमों और बातचीत के जरिए समाधान का समर्थन कर सकता है.
छोटे स्तर पर तालमेल का मंच देता है: बड़े और विस्तारित BRICS में भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका को एक ऐसा मंच मिलता है, जहां वे बड़ी बातचीत से पहले अपनी स्थिति तय कर सकते हैं.
दक्षिण-दक्षिण सहयोग को मजबूत करता है: IBSA फंड और अलग-अलग क्षेत्रों में सहयोग के जरिए यह मंच केवल मांग करने के बजाय खुद सहयोग का उदाहरण पेश करता है.
अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय मंचों के बीच तालमेल बढ़ाता है: तीनों देश BRICS, G20, संयुक्त राष्ट्र, क्षेत्रीय संगठनों, जलवायु वार्ता और विकास वित्त संस्थाओं में सक्रिय हैं.
IBSA के सामने चुनौतियां
IBSA आज भी महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका भविष्य अपने आप तय नहीं है. अगर इसे प्रभावशाली बने रहना है तो उसे कई चुनौतियों का सामना करना होगा.
राजनीतिक ध्यान में असमानता
BRICS की तुलना में IBSA को कई बार कम राजनीतिक ध्यान मिलता है. इसकी वजह समझी जा सकती है. BRICS के पास बड़ी अर्थव्यवस्थाएं, ज्यादा भू-राजनीतिक महत्व और ज्यादा मीडिया ध्यान है.
इसलिए IBSA को यह साबित करना होगा कि वह केवल पुराने दौर का एक मंच नहीं है.
इसका सबसे अच्छा तरीका सुर्खियों की होड़ नहीं है. उसे केंद्रित नतीजे देने होंगे—साझा रुख, व्यावहारिक परियोजनाएं, विकास सहयोग, शोध नेटवर्क और बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिखाई देने वाला योगदान.
अलग-अलग रणनीतिक प्राथमिकताएं
भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका हर मुद्दे पर एक जैसी प्राथमिकता नहीं रखते. भारत की सुरक्षा चिंताएं ब्राजील से अलग हैं. ब्राजील की जलवायु और कृषि से जुड़ी राजनीति दक्षिण अफ्रीका से अलग है. दक्षिण अफ्रीका की अफ्रीकी जिम्मेदारियां भारत की क्षेत्रीय स्थिति से अलग हैं.
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ये अंतर तालमेल को धीमा कर सकते हैं. लेकिन यही IBSA को ज्यादा उपयोगी भी बना सकते हैं. अगर तीनों देश अलग-अलग परिस्थितियों के बावजूद किसी मुद्दे पर सहमत होते हैं, तो उनका साझा रुख अक्सर ज्यादा व्यापक महत्व रखता है.
जमीन पर काम करने की जरूरत
IBSA केवल साझा मूल्यों के भरोसे नहीं चल सकता. उसे काम भी करके दिखाना होगा. इस मंच की लंबे समय तक विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह IBSA फंड को कितना मजबूत करता है, अलग-अलग क्षेत्रों में सहयोग को कितना आगे बढ़ाता है, नागरिक समाज और कारोबार से जुड़े लोगों को कितना जोड़ता है और यह दिखाता है कि उसका लोकतांत्रिक विकास मॉडल वास्तव में उपयोगी विचार दे सकता है.
BRICS के भीतर यह और भी महत्वपूर्ण है. बड़े मंच उन देशों को ज्यादा महत्व देते हैं जो स्पष्ट और तैयार प्रस्ताव लेकर आते हैं. IBSA को ऐसे प्रस्ताव तैयार करने की जगह बनना चाहिए.
IBSA BRICS के भीतर अपनी भूमिका कैसे मजबूत कर सकता है?
IBSA को हर मुद्दे पर बोलने की जरूरत नहीं है. उसे उन क्षेत्रों पर ध्यान देना चाहिए, जहां उसकी लोकतांत्रिक और विकास से जुड़ी पहचान उसे दूसरों से अलग बनाती है. BRICS के भीतर IBSA का एक व्यावहारिक एजेंडा ऐसा हो सकता है:
समावेशी बुनियादी ढांचे के मानक: IBSA विकास के लिए दिए जाने वाले वित्त में पहुंच, कीमत, जलवायु से सुरक्षा, स्थानीय रोजगार और सामाजिक असर को महत्व देने वाले नियमों को बढ़ावा दे सकता है.
खाद्य और पोषण सुरक्षा: तीनों देश टिकाऊ कृषि, स्कूलों में भोजन, सप्लाई चेन की स्थिरता और कमजोर देशों की मदद जैसे मुद्दों पर साथ काम कर सकते हैं.
जलवायु से निपटना और रोजगार: IBSA यह मांग कर सकता है कि जलवायु के लिए मिलने वाला वित्त विकासशील देशों की वास्तविक जरूरतों के अनुसार हो. इसमें जलवायु से बचाव, ऊर्जा तक पहुंच और रोजगार को शामिल किया जाना चाहिए.
डिजिटल सार्वजनिक ढांचा और शासन: भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका डिजिटल पहचान, डिजिटल भुगतान, समावेशन, डेटा सुरक्षा और सरकारी सेवाओं में डिजिटल तकनीक के इस्तेमाल पर अपने अनुभव साझा कर सकते हैं.
अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार: IBSA संयुक्त राष्ट्र, विकास बैंकों और वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में प्रतिनिधित्व, विश्वसनीयता और प्रभावशीलता को जोड़ते हुए सुधार की भाषा तैयार कर सकता है.
लोगों और ज्ञान के बीच नेटवर्क: विश्वविद्यालयों, कारोबार, स्थानीय सरकारों, महिलाओं के संगठनों और नागरिक समाज के बीच संपर्क बढ़ाकर IBSA को केवल सरकारी अधिकारियों का मंच बनने से रोका जा सकता है.
विस्तारित BRICS में IBSA और ज्यादा महत्वपूर्ण है जितना बड़ा BRICS होगा, उतना ही IBSA का आपसी तालमेल महत्वपूर्ण होगा. BRICS का विस्तार उसे ज्यादा देशों तक पहुंच देता है, लेकिन इससे एक ही कमरे में अलग-अलग हितों की संख्या भी बढ़ जाती है. ऐसे माहौल में छोटे समूह जरूरी हो जाते हैं.
IBSA ऐसा ही एक समूह है. यह BRICS को बांटता नहीं है, बल्कि उसे व्यवस्थित करने में मदद करता है. यह तीन बड़े लोकतांत्रिक देशों को साझा मूल्यों के आधार पर तालमेल बनाने, विकास के मुद्दों को ज्यादा स्पष्ट तरीके से उठाने और BRICS के संदेश को केवल भू-राजनीतिक टकराव तक सीमित होने से रोकने का मौका देता है.
भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के लिए IBSA अपनी स्वतंत्र भूमिका बनाए रखने का एक तरीका भी है. तीनों देशों को BRICS से फायदा होता है, लेकिन कोई भी देश यह नहीं चाहता कि उसे किसी दूसरे देश की रणनीतिक परियोजना में छोटा साझेदार माना जाए.
IBSA उन्हें उन मुद्दों पर साथ काम करने का मौका देता है, जहां उनके हित मिलते हैं और तीन महाद्वीपों की लोकतांत्रिक आवाज के रूप में अपनी बात रखने की ताकत देता है.
निष्कर्ष
IBSA आज भी महत्वपूर्ण है क्योंकि BRICS को केवल बड़ा आकार ही नहीं चाहिए. उसे विश्वसनीयता, सामाजिक उद्देश्य, नई संस्थागत सोच और ऐसी आवाजों की जरूरत है, जो बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को लोकतांत्रिक विकास से जोड़ सकें. भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका मिलकर यह भूमिका अलग-अलग देशों की तुलना में ज्यादा प्रभावी तरीके से निभा सकते हैं. IBSA का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह जमीन पर कितना काम करता है.
अगर यह केवल पुराने दौर की एक कूटनीतिक याद बनकर रह गया, तो इसका प्रभाव कम होता जाएगा. लेकिन अगर यह IBSA फंड को मजबूत करता है, गंभीर और साझा रुख तैयार करता है और BRICS, G20 और संयुक्त राष्ट्र में विकास से जुड़े व्यावहारिक विचार लेकर जाता है, तो यह ग्लोबल साउथ में सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक मंचों में से एक बना रह सकता है.
यही इस सवाल का असली जवाब है कि क्या IBSA आज भी मायने रखता है? हां. क्योंकि BRICS जितना बड़ा होता जा रहा है, उसके भीतर एक लोकतांत्रिक आधार की जरूरत उतनी ही बढ़ती जा रही है.
-भारत एक्सप्रेस
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