Music Therapy for Stress Relief: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव एक आम समस्या बन गया है. काम का प्रेशर, पारिवारिक जिम्मेदारियां, आर्थिक चिंताएं और सोशल मीडिया का लगातार मचने वाला शोर, ये सब मिलकर मानसिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ रहे हैं. ऐसे में लोग राहत की तलाश में पारंपरिक तरीकों की ओर लौट रहे हैं और इनमें सबसे प्रमुख है संगीत. संगीत न सिर्फ मनोरंजन का साधन है, बल्कि एक शक्तिशाली तनाव निवारक भी. हाल के वर्षों में यह ट्रेंड तेजी से बढ़ा है, खासकर युवाओं और महिलाओं में. भारत में एक ओर ‘भजन क्लबिंग’ और वहीं पाकिस्तान के कराची में भी महिलाओं की ‘सिंग-अलॉन्ग’ जैसी पहलें इस बदलाव की मिसाल हैं.
सवाल है कि संगीत तनाव का दुश्मन कैसे है? वैज्ञानिक अध्ययनों से साबित होता है कि संगीत सुनना या गाना कोर्टिसोल हॉर्मोन (स्ट्रेस हार्मोन) को कम करता है, ऑक्सीटोसिन (लव हार्मोन) बढ़ाता है, और मूड सुधारता है. संयुक्त या एक साथ गायन में सामूहिकता का एहसास तनाव को और भी प्रभावी ढंग से कम करता है. एक अध्ययन के अनुसार, ग्रुप में गाने से मूड बेहतर होता है, जबकि अकेले गाने में यह प्रभाव कम पड़ता है और कुछ मामलों में तो यह नकारात्मकता भी बढ़ाता है.
अध्ययन बताते हैं कि संगीत सांस लेने को नियंत्रित करता है, दिमाग को वर्तमान में लाता है, और एंडोर्फिन्स हॉर्मोन रिलीज करता है, जो प्राकृतिक दर्द निवारक और खुशी (फील गुड) हार्मोन हैं. योग, ध्यान या व्यायाम की तरह, नियमित संगीत गतिविधियां अवसाद और चिंता को कम करती हैं. खासकर समूह गायन सामाजिक जुड़ाव बढ़ाता है, अकेलेपन को दूर करता है और भावनात्मक निष्कासन प्रदान करता है. मनोवैज्ञानिक इसे तनाव मुक्ति का सबसे आसान और उपयोगी साधन मानते हैं.
पिछले कुछ वर्षों से भारत में युवाओं के बीच एक नए चलन की शुरुआत हुई है जिसे ‘भजन क्लबिंग’ कहा जाता है. युवाओं का यह नया ‘सोबर हाई’ सबसे चर्चित ट्रेंड बन गया है. पारंपरिक भजनों को क्लब-स्टाइल एनर्जी, आधुनिक संगीत, लाइटिंग और परफॉर्मेंस के साथ पेश किया जा रहा है. उल्लेखनीय है कि युवाओं को शराब या नशीले पदार्थों से दूर कर सकरतात्मक ऊर्जा की बढ़ाने की इस पहल को काफ़ी सराहा जा रहा है.
गौरतलब है कि मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई जैसे शहरों में ये आयोजन हाउसफुल हो रहे हैं. इन कार्यक्रमों से प्रेरणा लेकर कई युवा अपना ग्रुप बनाने लगे हैं और ऐसे कार्यक्रम आयोजित करने लगे हैं. देख गया है कि इन कार्यक्रमों में युवा कॉलेज विद्यार्थी, प्रोफेशनल्स और मध्यम आयु वर्ग के लोग इनमें भाग लेते हैं जिनकी औसत आयु 29-35 के आसपास होती है. वे कहते हैं कि ऐसे आयोजन तनाव और एंग्जायटी से राहत देते हैं. सामूहिक चैंटिंग, डांसिंग और क्लैपिंग से ‘ब्लिस’ और ‘बिलॉन्गिंग’ का एहसास होता है. एक आयोजक के अनुसार, “लोग तनाव लेकर आते हैं और शांत होकर जाते हैं, हैंगओवर की बजाय शांति के साथ.
युवाओं के बीच यह नया ट्रेंड ‘सोबर क्यूरियस’ मूवमेंट का हिस्सा है. आजकल का युवा नशीले पदार्थों से दूर हटकर अर्थपूर्ण अनुभवों की तलाश कर रहा है. सोशल मीडिया रील्स ने इसे वायरल बनाया है. प्रधानमंत्री मोदी ने भी ‘मन्न की बात’ में इसकी सराहना की. यह न सिर्फ मनोरंजन है, बल्कि आत्म-देखभाल और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव है. वहीं ऐसे आयोजन पर टिकट और स्पॉन्सरशिप्स इसे मुख्यधारा का इवेंट बना रहे हैं.
भारत की तरह ही पड़ोसी देश पाकिस्तान के कराची में भी महिलाओं द्वारा की ‘सिंग-अलॉन्ग’ की पहल की गई है. जिसमें हर उम्र की महिलाओं को ‘अपना समय’ (मी टाइम) मिलता है. एह एक अनोखी पहल है, जहां अलग-अलग उम्र की महिलाएं तनाव मुक्ति के लिए समूह में गाती हैं. हाल ही में एक टीवी रिपोर्ट में यह दिखाया गया है कि, किस तरह यह महफ़िल तनाव से छुटकारा पाने का माध्यम बन गई है. महिलाएं घरेलू जिम्मेदारियों, काम के बोझ और सामाजिक दबाव से उबरने के लिए समय निकालती हैं. गाने के दौरान वे हंसती-बोलती हैं, भावनाओं को शेयर करती हैं और एक-दूसरे का साथ देती हैं. यह नया ट्रेंड महिलाओं को सुरक्षित, सशक्त और जुड़ा महसूस कराता है.
वही कराची जैसे शहर में, जहां दैनिक जीवन चुनौतीपूर्ण है, ऐसी गतिविधियां मानसिक स्वास्थ्य के लिए वरदान साबित हो रही हैं. समान रूप से, दुनिया भर में महिलाओं के ग्रुप सिंगिंग कार्यक्रम ‘पोस्टनेटल डिप्रेशन’ (प्रसवोत्तर अवसाद) और एंग्जायटी में राहत देते पाए गए हैं.
संगीत के अलावा, ड्रम सर्कल, डांस, क्वायर और ग्रुप योग भी तनाव मुक्ति के अन्य साधन हैं. दुनिया भर के विभिन्न शहरों में ड्रम सर्कल युवाओं को ताल के जरिए तनाव रिलीज करने का मौका देता है. ऐसे सभी आयोजन डिप्रेशन और एंग्जायटी कम करने में ‘एंटीडिप्रेसेंट्स’ जितने प्रभावी पाए गए हैं. ये गतिविधियां सामाजिक बंधन मजबूत करती हैं, जो आधुनिक अलगाव के दौर में बहुत जरूरी है. परिवार, दोस्तों या कम्युनिटी के साथ गाना न सिर्फ व्यक्तिगत राहत देता है, बल्कि सामूहिक ऊर्जा पैदा करता है.
यह ट्रेंड सकारात्मक है, लेकिन ऐसे में इनका व्यावसायिकरण और सतहीकरण होने की आशंका भी है. असली फायदा तब मिलेगा जब इसे नियमित आदत बनाया जाए. स्कूलों, कॉर्पोरेट कंपनियों और कम्युनिटी सेंटर्स में ऐसे कार्यक्रम को शामिल करने की जरूरत है.
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-भारत एक्सप्रेस
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