कर्नाटक कांग्रेस इन दिनों अपने सबसे कठिन राजनीतिक दौर से गुजर रही है. मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के बीच सत्ता हस्तांतरण को लेकर तनाव खुलकर सामने आ चुका है. ढाई साल के फॉर्मूले का समय नजदीक आते ही दोनों नेताओं के खेमों में हलचल बढ़ी है, जबकि दिल्ली में आलाकमान अभी भी किसी ठोस निर्णय पर नहीं पहुंच पाया है.
राजनीतिक समीकरण इतने उलझ चुके हैं कि अब कांग्रेस नेतृत्व एक ऐसे रास्ते की तलाश में है जो न तो सिद्धारमैया को नाराज़ करे और न ही डीके शिवकुमार को हाशिए पर धकेले. इसी बीच एक नया प्रस्ताव भी चर्चा में है कि सिद्धारमैया के परिवार को राजनीतिक रूप से ‘सम्मानजनक भूमिका’ देकर स्थिति को संतुलित करने का प्रयास हो.
कर्नाटक में सिद्धारमैया अभी भी कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली जनाधार वाले नेता हैं. 100 से अधिक विधायक उनके पक्ष में माने जाते हैं. वे कुरुबा समुदाय के सबसे बड़े नेता हैं, जिसका राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण असर है. उम्र भले 80 पार हो चुकी है, लेकिन उनका राजनीतिक अनुभव कांग्रेस के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.
डीके की स्थिति: मजबूत मैनेजर, पर सीमित समर्थन आधार
डीके शिवकुमार कांग्रेस के ‘संगठन मैनेजर’ के तौर पर प्रसिद्ध हैं. मेहनती, प्रभावी और वफादार नेता की उनकी छवि अभी भी बरकरार है. प्रदेश अध्यक्ष होने के चलते संगठन पर उनकी पकड़ मजबूत है.
लेकिन उनकी कुछ कमजोरियां भी स्पष्ट हैं.
सबसे पहले विधायकों की संख्या सिद्धारमैया की तुलना में काफी कम हैं. वहीं, 2024 में उनके भाई डीके सुरेश लोकसभा चुनाव हार गए, जिससे उनकी राजनीतिक प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगा. वोक्कालिगा समाज में देवगौड़ा परिवार का वर्चस्व अभी भी अधिक है. साथ ही ईडी के मामले उनकी राजनीति पर छाया की तरह बने हुए हैं, जिसके कारण वे ढाई साल पूरे होते ही सीएम पद के लिए दबाव बढ़ाने पर मजबूर हुए.
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक सियासी गलियारों में चर्चा है कि आलाकमान एक ऐसा विकल्प खोज रहा है जिससे सिद्धारमैया को सम्मानजनक रास्ता मिले और नेतृत्व परिवर्तन आरामदायक हो सके.
सूत्रों के अनुसार, हाल ही में 25 वर्ष के हुए सिद्धारमैया के पोते को विधायक बनाकर कैबिनेट में शामिल करने का प्रस्ताव चर्चा में है. इसके बदले सिद्धारमैया से आग्रह किया जा सकता है कि वे अगले 3 या 4 साल बाद मुख्यमंत्री पद का हस्तांतरण डीके शिवकुमार को होने दें. इससे सिद्धारमैया अगली कांग्रेस सरकार बनाने में अपना पूरा दम लगाएंगे, और डीके को 5 साल का पूरा कार्यकाल मिल सकता है.
आपको बता दें कि सिद्धारमैया के बड़े बेटे का असामयिक निधन हो गया था और उनका पोते से विशेष लगाव है, जबकि दूसरे बेटे को राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है. ऐसे में यह प्रस्ताव सिद्धारमैया के लिए स्वीकार्य बनाया जा सकता है.
समय बीतने के साथ डीके शिवकुमार के समर्थक विधायक दिल्ली पहुंचने लगे. कुछ ने डीके को सीएम बनाने की मांग की, तो कुछ ने कैबिनेट में जगह बढ़ाने के लिए सिद्धारमैया का समर्थन किया. जब स्थिति बिगड़ने लगी, तो प्रभारी महासचिव ने सार्वजनिक बयानबाज़ी बंद करने की चेतावनी जारी की. वेणुगोपाल ने भी किसी विधायक से मुलाकात नहीं की, जिससे संदेश गया कि आलाकमान अनावश्यक दबाव को स्वीकार नहीं करेगा.
इसी दौरान सिद्धारमैया की कैबिनेट विस्तार की मांग को भी यह कहकर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया कि पहले नेतृत्व परिवर्तन पर फैसला होने दिया जाए.
कांग्रेस के लिए यह फैसला आसान नहीं है, क्योंकि बीजेपी की बढ़ती ताकत के मुकाबले सिद्धारमैया जैसा बड़ा मास लीडर जरूरी है. डीके शिवकुमार को नाराज़ करना संगठनात्मक रूप से बड़ा जोखिम होगा. गलत समय पर नेतृत्व परिवर्तन प्रदेश में पार्टी के लिए नुकसानदेह हो सकता है. दो बड़े नेताओं के बीच संतुलन साधने की जिम्मेदारी आलाकमान पर है.
वहीं, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे पहले ही कह चुके हैं कि निर्णय सोनिया गांधी, राहुल गांधी और वे खुद मिलकर लेंगे. सोनिया के विदेश में होने से मामला और लंबित हो गया है.
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-भारत एक्सप्रेस
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