Ayodhya And Ujjain Ram Mandir Mahakal Lok: अयोध्या के भव्य राम मंदिर में सामने आए कथित चंदा और चढ़ावा चोरी ने पूरे देश के धार्मिक और प्रशासनिक कॉरिडोर्स में खलबली मचा दी है. इस खुलासे के बाद अब देश के अन्य अति-प्रतिष्ठित धार्मिक स्थलों के खजाने को लेकर भी आवाजें मुखर होने लगी हैं. मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी उज्जैन में अयोध्या कांड से सबक लेते हुए महापौर मुकेश टटवाल ने जिला कलेक्टर और महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति को एक आधिकारिक पत्र भेजा है. इसमें दान-पेटियों में आने वाले नकद चढ़ावे और सोने-चांदी के आभूषणों के सख्त भौतिक सत्यापन और सूचीकरण की मांग की है.
इस पूरे घटनाक्रम ने भारत के दो सबसे बड़े आस्था केंद्रों उत्तर प्रदेश के अयोध्या स्थित ‘श्री राम जन्मभूमि मंदिर’ और मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित ‘श्री महाकालेश्वर मंदिर’ की प्रशासनिक, कानूनी और वित्तीय प्रणालियों को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ दी है. आइए विस्तार से पैराग्राफ दर पैराग्राफ दोनों मंदिरों की व्यवस्था का विश्लेषण करते हैं कि ये दोनों एक-दूसरे से कितनी अलग हैं.
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दोनों मंदिरों की प्रशासनिक और निर्णय लेने की प्रक्रिया एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न है. अयोध्या का राम मंदिर पूरी तरह से ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ द्वारा संचालित होता है, जिसका गठन सुप्रीम कोर्ट के 2019 के ऐतिहासिक फैसले के बाद एक स्वायत्त निजी धार्मिक ट्रस्ट के रूप में हुआ था. सरकार इसके दैनिक नीतिगत निर्णयों को सीधे नियंत्रित नहीं करती और इसके अपने खुद के उपनियम हैं.
इसके ठीक विपरीत, उज्जैन का महाकाल मंदिर ‘मध्य प्रदेश श्री महाकालेश्वर मंदिर अधिनियम, 1982’ के तहत संचालित होने वाला एक पूर्णतः वैधानिक सरकारी निकाय है. यहां व्यवस्था को और मजबूत करने के लिए हाल ही में सरकार द्वारा नए नियमों का मसौदा भी तैयार किया गया है.
अयोध्या राम मंदिर में निर्णय लेने का अधिकार 15 ट्रस्टियों (9 स्थायी और 6 मनोनीत) के पास होता है, जिसके अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास और महासचिव चंपत राय (जिन्होंने फिलहाल इस्तीफा दिया है मंजूरी बाकी है) हैं. इस ट्रस्ट में केंद्र सरकार, राज्य सरकार और अयोध्या के जिला मजिस्ट्रेट (DM) पदेन सदस्य तो हैं, लेकिन नियमों के अनुसार उन्हें वोटिंग का अधिकार नहीं होता. ट्रस्ट बहुमत के प्रस्ताव से फैसले स्वयं लेता है.
उज्जैन महाकाल मंदिर में निर्णय प्रक्रिया के सर्वोच्च शिखर पर उज्जैन के जिला कलेक्टर होते हैं, जो प्रबंध समिति के पदेन अध्यक्ष हैं. इसके अलावा दैनिक प्रशासनिक कार्यों के लिए राज्य सरकार द्वारा एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी (जैसे IAS या SAS अफसर) को ‘प्रशासक’ या CEO नियुक्त किया जाता है. पुलिस, नगर निगम के अफसर और पुजारियों से मिलकर बनी इस सरकारी समिति में सरकार की अंतिम मंजूरी के बिना कोई भी बड़ा नीतिगत फैसला नहीं लिया जा सकता.
दोनों वैश्विक मंदिरों की आय के स्रोत और उनकी ऑडिटिंग प्रणाली में भी जमीन-आसमान का अंतर है. राम मंदिर की आय का मुख्य जरिया देश-विदेश के करोड़ों श्रद्धालुओं से मिलने वाला स्वैच्छिक दान है, जिसके तहत अब तक 3,500 करोड़ से अधिक की राशि आ चुकी है. खातों का रखरखाव ट्रस्ट के अपने चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) करते हैं, हालांकि हाल ही में सरकार की SIT की ऑडिट सिफारिशों के बाद यहां भी कड़े डिजिटल और लाइव निगरानी नियम लागू किए जा रहे हैं.
महाकाल मंदिर की आय का बड़ा हिस्सा भस्म आरती पास, शीघ्र दर्शन टिकट, गर्भगृह जलाभिषेक पास और मंदिर काउंटरों के चढ़ावे से आता है. इस धन को एक आधिकारिक ‘मंदिर कोष’ में रखा जाता है. इसका वित्तीय ऑडिट चार्टर्ड अकाउंटेंट नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश सरकार के स्थानीय निधि लेखा परीक्षा और सरकारी ऑडिटरों द्वारा बेहद कड़ाई से किया जाता है.
संग्रहीत धन और परिसंपत्तियों के पुनर्निवेश को लेकर भी दोनों प्रणालियों की नीतियां अलग हैं. अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट को प्राप्त होने वाला दान केवल 70 एकड़ के राम मंदिर परिसर के विकास, भोजनालय (रसोई), गौशाला, संग्रहालय और विशिष्ट सामाजिक कार्यों के लिए ही उपयोग किया जा सकता है. ट्रस्ट को अपनी अचल संपत्ति बेचने का कोई अधिकार नहीं है.
महाकाल मंदिर की आय का उपयोग केवल मंदिर परिसर तक सीमित नहीं रहता. इस पूंजी से उज्जैन के अन्य संबद्ध मंदिरों का विकास किया जाता है, पुजारियों व कर्मचारियों को वेतन दिया जाता है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि उज्जैन शहर के व्यापक बुनियादी ढांचे (जैसे भव्य ‘महाकाल लोक’ कॉरिडोर) के विकास कार्यों में इस धन को राज्य व केंद्र सरकार के सहयोग से खर्च किया जाता है.
अयोध्या राम मंदिर मंदिर पारंपरिक नागर शैली में बना यह भव्य परिसर मुख्य रूप से प्रभु रामलला के ‘झांकी दर्शन’ (दूर से दर्शन) की व्यवस्था पर केंद्रित है. भीड़ प्रबंधन के लिए यहाँ एक आधुनिक और विशाल मार्ग विकसित किया गया है, और सुरक्षा कारणों से इसके परिक्रमा पथ के निर्माण में लोहे या स्टील का उपयोग नहीं किया गया है.
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देश का एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग होने के कारण उज्जैन की पूजा पद्धति पूरी तरह से पारंपरिक है. यहां भक्तों को शिवलिंग के अत्यंत समीप जाने और निर्धारित समय तक जलाभिषेक करने का सौभाग्य मिलता है. यहां की सबसे बड़ी विशेषता तड़के सुबह 4 बजे होने वाली ‘भस्म आरती’ है, जिसके लिए भक्तों को बेहद कड़े अग्रिम ऑनलाइन या ऑफलाइन स्लॉट लेने होते हैं. भीड़ को नियंत्रित करने के लिए हाल ही में भव्य ‘महाकाल लोक’ कॉरिडोर विकसित किया गया है, जहां शिव पुराण की कथाओं को जीवंत किया गया है.
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