PK ने डुबोई महागठबंधन की नैया
Bihar Results Analysis: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस (NDA) के लिए 202 सीटों की बंपर जीत लेकर आए, जिसने सभी को चौंका दिया. इस जीत के विश्लेषण में एक प्रमुख कारक प्रशांत किशोर यानी PK (Prashant Kishor) और उनकी नई नवेली पार्टी जनसुराज (JSP) को माना जा रहा है. भले ही JSP को एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं हुई, लेकिन आंकड़ों से स्पष्ट है कि PK ने न चाहते हुए भी NDA को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा पहुंचाया और महागठबंधन की संभावनाओं को बड़ा झटका दिया. विपक्ष द्वारा उन पर लगाए जा रहे ‘बीजेपी की बी-टीम’ होने के आरोपों को चुनावी गणित ने मजबूत कर दिया है.
प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) ने अपने पूरे अभियान का मुख्य फोकस प्रधानमंत्री मोदी या नीतीश कुमार पर रखने के बजाय, तेजस्वी यादव पर रखा. तेजस्वी को ‘नौवीं फेल’ कहकर तंज कसा, जिससे आरजेडी की युवा अपील ध्वस्त हो गई. उनका तर्क था कि नौवीं फेल नेता बिहार को नौकरी नहीं दे सकते.
उन्होंने 1990 के दशक के ‘लालू के जंगल राज’ की यादें ताजा करके और तेजस्वी को उनका वारिस ठहराकर मतदाताओं में डर का माहौल बनाया. यह नैरेटिव आरजेडी की ‘नौकरी देंगे’ अपील को फीका कर गया, जिससे युवा असंतोष के वोट महागठबंधन को जाने के बजाय JSP की ओर मुड़ गए.
पूरे चुनाव प्रचार के दौरान, PK ने प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ कोई तीखा या सीधा बयान नहीं दिया. एक इंटरव्यू में नीतीश और तेजस्वी में से किसी एक को चुनने के सवाल पर किशोर ने नीतीश कुमार पर अपनी मुहर लगाई थी. लोगों के बीच यह संदेश गया कि PK का सॉफ्ट कॉर्नर नीतीश के लिए है, जिसका फायदा सीधा NDA को मिला. किशोर ने बीजेपी का विरोध ‘सीमित स्तर’ पर रखा. उन्होंने डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी पर आरोप लगाए, पर मोदी और शाह के खिलाफ खुलकर सामने नहीं आ सके.
जनसुराज पार्टी भले ही 238 सीटों पर चुनाव लड़ी और 236 पर जमानत जब्त करा बैठी, लेकिन उसका 3.5% वोट शेयर गेमचेंजर साबित हुआ. SP ने 35 विधानसभा क्षेत्रों में ‘वोटकटवा’ की भूमिका निभाई, जहां उसका वोट शेयर विजेता के मार्जिन से अधिक रहा. इन 35 सीटों में से NDA ने 19 सीटें जीतीं, जबकि महागठबंधन को केवल 14 सीटें मिलीं. इससे स्पष्ट है कि PK की स्ट्रैटेजी से NDA को अधिक फायदा पहुंचा. विशेषज्ञों के मुताबिक, JSP का 3.5% वोट शेयर महागठबंधन को 10-15 सीटें खर्च करा गया.
चुनाव से पहले 75 मुस्लिमों को टिकट देने का वादा करने के बाद PK ने आबादी के अनुसार 42 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारे. माना जा रहा है कि इससे मुस्लिम वोट में सेंधमारी हुई, जिसका अप्रत्यक्ष फायदा बीजेपी को मिला.
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खुद उच्च जाति से आने के कारण, PK अपनी सवर्ण जातिगत पहचान को लेकर बीजेपी के कुछ वोट काट सकते थे, लेकिन पलायन और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर उनकी बातें सुनकर जो वोटर बीजेपी से नाराज थे, वे महागठबंधन को जाने के बजाय दो भागों में बंट गए, जिससे नुकसान महागठबंधन का हुआ.
प्रशांत किशोर के सोशल मीडिया प्रबंधन और रैलियों ने खासकर प्रवासी वोटरों को वोट देने के लिए प्रेरित किया. उनसे प्रभावित होकर बड़ी संख्या में प्रवासी वोट देने पहुंचे. हालांकि, PK भीड़ तो जुटा पाए, पर वोटों का फायदा NDA को मिल गया, क्योंकि इन वोटों का मोबिलाइजेशन एक नए विकल्प के लिए तो हुआ, लेकिन जब वह विकल्प नहीं चला तो ये वोट बीजेपी को जाने वाले असंतुष्ट वोटर्स को अपनी ओर खींचकर महागठबंधन के वोटों को कम करने में सहायक बने.
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