दिल्ली हाई कोर्ट ने वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत निर्धारित न्यूनतम सजा से कम की सजा देने को अस्वीकार्य करार दिया है. जस्टिस चंद्र धारी सिंह ने कहा कि कानून में न्यूनतम सजा तय करने के पीछे विधायी मंशा का सम्मान किया जाना चाहिए और दंड प्रावधानों का सख्ती से पालन होना चाहिए.
कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए मामले को विशेष न्यायाधीश के पास वापस भेज दिया, ताकि वे कानून के अनुरूप सजा निर्धारित कर सकें. न्यायाधीश को तीन महीने के भीतर नए सिरे से सजा पर आदेश जारी करने का निर्देश दिया गया है और यह आदेश CBI की अपील पर दिया गया, जिसमें विशेष अदालत द्वारा न्यूनतम सजा से कम दिए गए दंड को चुनौती दी गई थी.
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम का मुख्य उद्देश्य वन्यजीव अपराधों पर नियंत्रण रखना है, क्योंकि ऐसे अपराध पारिस्थितिक संतुलन और जैव विविधता के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं. यह अधिनियम लुप्तप्राय प्रजातियों के अवैध व्यापार और शोषण को रोकने के लिए सख्त प्रावधानों और दृढ़ संकल्प को दर्शाता है.
कोर्ट ने कहा कि न्यूनतम निर्धारित अवधि से कम सजा देने से कानून का मूल उद्देश्य कमजोर हो जाएगा और भविष्य के मामलों के लिए गलत उदाहरण बन सकता है. सीबीआई ने विशेष अदालत के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें दोषियों को जेल में बिताई गई.
अवधि की सजा और 20 हजार रुपए जुर्माने तक ही सीमित दंड दिया गया था, जबकि इस अपराध के लिए कम से कम तीन साल और अधिकतम सात साल की सजा का प्रावधान है.
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-भारत एक्सप्रेस
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