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Galileo Telescope: 25 अगस्त 1609 को गैलीलियो ने पेश की दूरबीन, जिसने ब्रह्मांड को देखने का नजरिया बदल दिया

Galileo Telescope: 25 अगस्त 1609 को गैलीलियो गैलीली ने वेनिस की सीनेट के सदस्यों के सामने अपना टेलिस्कोप पेश किया. यह एक साधारण सा दिखने वाला उपकरण था, लेकिन इसने दुनिया को हमेशा के लिए बदल दिया. उस समय यह टेलिस्कोप किसी भी वस्तु को तीन गुना बड़ा दिखा सकता था. बाद में गैलीलियो ने लेंसों के कॉम्बिनेशन में सुधार करके इसकी क्षमता आठ गुना तक बढ़ा दी.

गैलीलियो से पहले भी बन चुकी थी दूरबीन

टेलिस्कोप का आविष्कार गैलीलियो से पहले नीदरलैंड में हो चुका था. हैंस लिपरशी नामक एक चश्मा बनाने वाले व्यक्ति ने इसे बनाया था. लेकिन गैलीलियो ने लिपरशी के टेलिस्कोप से कहीं अधिक शक्तिशाली और सटीक उपकरण तैयार किया. उन्होंने इसे केवल देखने के लिए नहीं, बल्कि वैज्ञानिक अध्ययन के लिए इस्तेमाल किया.

आसमान में छिपे रहस्यों की खोज

गैलीलियो ने अपने टेलिस्कोप से चंद्रमा, सूर्य, बृहस्पति और शुक्र ग्रह का बारीकी से अध्ययन किया. उन्होंने देखा कि चंद्रमा की सतह चिकनी नहीं, बल्कि पहाड़ों और गड्ढों से भरी हुई है. बृहस्पति के चार चंद्रमा खोजे, जो उसके चारों ओर घूमते थे. शुक्र के चरण (phases) देखे, जो साबित करते थे कि ग्रह सूर्य के चारों ओर घूमते हैं. इन खोजों के आधार पर उन्होंने 1610 में ‘सिडेरियस नुनसियस’ (तारों का संदेश) नामक पुस्तक लिखी.

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इस टेलिस्कोप ने ब्रह्मांड और ग्रहों के बारे में आम लोगों की धारणा को पूरी तरह बदल दिया. पहले लोग सोचते थे कि पृथ्वी ब्रह्मांड का केंद्र है और सब कुछ उसके चारों ओर घूमता है. गैलीलियो की खोजों ने कोपरनिकस के सूर्यकेंद्रित सिद्धांत को मजबूत किया. अब यह साफ हो गया था कि पृथ्वी भी अन्य ग्रहों की तरह सूर्य के चारों ओर घूमती है.

बदल गई दुनिया को देखने की सोच

आज इटली के फ्लोरेंस शहर के साइंस म्यूजियम में गैलीलियो के दो मूल टेलिस्कोप सुरक्षित रखे गए हैं. ये इतिहास के गवाह हैं कि कैसे एक छोटे से उपकरण ने मानव की सोच को आकाश तक पहुंचा दिया. गैलीलियो का टेलिस्कोप सिर्फ एक वैज्ञानिक यंत्र नहीं था. यह ज्ञान की नई राह का द्वार था, जिसने आम आदमी की आंखों से ब्रह्मांड का रहस्य खोल दिया.

भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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