अभिजीत दीपके का नया ड्रामा
सोशल मीडिया की लहर पर सवार होकर चर्चा बटोरने वाले तथाकथित नेताओं की सबसे बड़ी मजबूरी यह होती है कि जब आंदोलन ठंडा पड़ता है, तो लाइमलाइट में बने रहने के लिए नए-नए ड्रामे गढ़ने पड़ते हैं. कुछ ऐसा ही हाल इन दिनों कॉकरोच जनता पार्टी मतलब CJP और उसके कर्ता-धर्ता अभिजीत दीपके का नजर आ रहा है. नीट (NEET) आंदोलन की तपिश कम होने और अपनी घटती लोकप्रियता को दोबारा जिंदा करने के लिए अब वे फिर से बेवजह के विवादों और बयानों का सहारा ले रहे हैं.
हाल ही में राजस्थान के एक स्कूल दौरे के दौरान खड़े हुए विवाद के बाद से अभिजीत दीपके की फजीहत पहले ही हो चुकी है. अब अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए उन्होंने इंडिया गेट से पुलिस मुख्यालय तक एक तथाकथित ‘शांतिपूर्ण युवा मार्च’ का ऐलान कर दिया है. वहीं CJI की टिप्पणी को खुद पर थोप लिया है.
दीपके को चाहिए ‘विक्टिम कार्ड’
अभिजीत दीपके और उनकी पार्टी के प्रवक्ता सौरभ दास अब भी मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की पुरानी मौखिक टिप्पणी को खुद पर थोपने की हास्यास्पद कोशिश कर रहे हैं. दीपके ने एक इंटरव्यू में दावा किया कि सीजेआई की ‘कॉकरोच’ वाली टिप्पणी असल में सौरभ दास के लिए ही थी. जबकि हकीकत यह है कि सीजेआई सूर्यकांत ने अदालत में साफ और स्पष्ट शब्दों में इस विवाद का पटाक्षेप कर दिया था. सीजेआई ने आधिकारिक रूप से स्पष्ट किया था कि-
‘अदालत की मौखिक टिप्पणी को मीडिया के एक हिस्से ने जानबूझकर तोड़-मरोड़कर पेश किया. यह टिप्पणी देश के किसी युवा के खिलाफ नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए थी जो फर्जी और जाली डिग्रियों के सहारे वकालत और मीडिया में घुसपैठ कर परजीवियों की तरह काम कर रहे हैं.’
इसके बावजूद, खुद को चर्चा में रखने के लिए सीजेआई की टिप्पणी को जबरन युवाओं का अपमान बताकर भुनाना और खुद को “ओजी कॉकरोच” साबित करने की होड़ लगाना, राजनीतिक अपरिपक्वता और मीडिया अटेंशन की हताशा को ही दर्शाता है.
अब सिर्फ बचा ‘एक्स’ का सहारा
अमेरिका से लौटकर सोशल मीडिया फॉलोअर्स के दम पर नेता बने अभिजीत दीपके का असली इम्तिहान अब शुरू हुआ है. सोशल मीडिया पर 25 मिलियन फॉलोअर्स जुटा लेना एक बात है, लेकिन धरातल पर सार्थक राजनीति करना दूसरी बात. जब से राजस्थान के स्कूल दौरे पर विवाद हुआ और स्थानीय स्तर पर विरोध झेलना पड़ा, तब से दीपके की साख लगातार गिर रही है. अब 5 सितंबर के मार्च के नाम पर छात्रों और पीड़ितों के परिवारों को आगे कर वे अपनी सियासी प्रासंगिकता बचाने की आखिरी कोशिश में जुटे हैं.
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