PM Modi on Women Reservation Bill: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिला आरक्षण विधेयक को लेकर एक विशेष लेख साझा करते हुए इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए एक ऐतिहासिक क्षण करार दिया है. पीएम मोदी के अनुसार, विधायी संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण न केवल समय की मांग है बल्कि हमारे लोकतंत्र को अधिक जीवंत, सहभागी और प्रतिनिधिक बनाने के लिए अनिवार्य है.
उन्होंने स्पष्ट किया कि इस महत्वपूर्ण निर्णय को लागू करने में किसी भी तरह की देरी देश की आधी आबादी के साथ अन्याय होगा. पीएम का मानना है कि जब महिलाएं नीति-निर्माण और प्रशासनिक निर्णयों में सक्रिय भूमिका निभाती हैं, तो शासन की गुणवत्ता (Quality of Governance) में सुधार होता है और समाज अधिक संवेदनशील बनता है.
प्रधानमंत्री ने अपने लेख में आगामी विशेष सत्र और महत्वपूर्ण तिथियों का उल्लेख करते हुए इसे सामाजिक न्याय से जोड़ा. उन्होंने बताया कि 11 अप्रैल से महात्मा फुले की 200वीं जयंती और 14 अप्रैल को डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की जयंती मनाई जाएगी, जो सामाजिक समानता के प्रतीक हैं.
इन्हीं प्रेरणादायी अवसरों के बीच 16 अप्रैल को संसद की ऐतिहासिक बैठक होगी, जहां महिला आरक्षण विधेयक (Nari Shakti Vandan Adhiniyam) पर चर्चा के लिए विशेष सत्र बुलाया गया है. पीएम मोदी ने इसे महज एक विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि करोड़ों महिलाओं की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब बताया है, जो आधुनिक भारत की दिशा तय करेगा.
नारी शक्ति का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि साइंस, टेक्नोलॉजी, खेल, सेना और कला जैसे हर क्षेत्र में आज महिलाएं अपनी सशक्त पहचान बना रही हैं. उन्होंने पिछले 11 वर्षों में महिला सशक्तिकरण के लिए किए गए प्रयासों का विवरण दिया.
हालांकि उन्होंने इस कड़वी सच्चाई को भी स्वीकार किया कि समाज में उनकी व्यापक भूमिका के बावजूद राजनीति और विधायी संस्थाओं में उनका प्रतिनिधित्व अभी भी कम है. पीएम ने जोर दिया कि 2029 के लोकसभा चुनाव और आगामी विधानसभा चुनाव नए प्रावधानों के साथ कराए जाने चाहिए ताकि यह असंतुलन खत्म हो सके.
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प्रधानमंत्री मोदी ने सभी राजनीतिक दलों के सांसदों से इस विधेयक (Nari Shakti Vandan Adhiniyam) का समर्थन करने का आग्रह करते हुए इसे ‘राष्ट्रहित’ का विषय बताया. उन्होंने कहा कि यह किसी एक दल या व्यक्ति का मुद्दा नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की दिशा तय करने वाला फैसला है.
पीएम के अनुसार, संविधान निर्माताओं ने जिस समान समाज की कल्पना की थी, उसे साकार करने के लिए अब इस निर्णय को और टाला नहीं जा सकता. उन्होंने उम्मीद जताई कि संसद अपनी सर्वोच्च परंपराओं के अनुरूप इस दायित्व को पूरा करेगी और भारत को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाएगी.
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-भारत एक्सप्रेस
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