बिहार की राजनीति में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर महागठबंधन के भीतर सीट बंटवारे की कवायद ज़ोर पकड़ रही है. लेकिन इस बार समीकरण पहले जैसे नहीं हैं. सूत्रों के अनुसार राजद ने कांग्रेस को एक साफ और दो-टूक संदेश दे दिया है—”जिताऊ-हराऊ सीटों की अदला-बदली स्वीकार नहीं होगी.”
जहां एक ओर गठबंधन में नए दलों की एंट्री—जैसे मुकेश सहनी की वीआईपी, पशुपति पारस का गुट और झारखंड से हेमंत सोरेन की जेएमएम—के चलते सीटों का समीकरण बदलना तय है, वहीं दूसरी ओर वाम दलों के बेहतर स्ट्राइक रेट के कारण उन्हें अधिक सीटें देने की मांग भी सामने आई है.
पिछले चुनाव में कांग्रेस ने 70 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन उसका प्रदर्शन अपेक्षित नहीं रहा. इसके उलट वाम दलों ने कम सीटों पर लड़ते हुए भी अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया. यही कारण है कि इस बार सीटों के नए बंटवारे में सभी को पिछली बार से कम सीटें मिल सकती हैं—चाहे वह राजद हो, कांग्रेस या अन्य सहयोगी दल.
राजद ने कांग्रेस को स्पष्ट कर दिया है कि 70 में से जो संख्या इस बार कांग्रेस के हिस्से में आएगी, कांग्रेस को उन्हीं सीटों में से अपने लिए बेहतर विकल्प चुनने होंगे. “जिताऊ” या “हराऊ” सीटों के नाम पर कोई अदला-बदली नहीं होगी, और यह फॉर्मूला न तो व्यवहारिक है, न ही राजद को स्वीकार है.
राजद के इस सख्त रुख के बाद कांग्रेस खेमे में हलचल तेज हो गई है. पार्टी के राज्य स्तर के नेताओं ने अब यह मामला अपने आलाकमान के पास पहुँचा दिया है. उन्हें उम्मीद है कि शायद शीर्ष नेतृत्व की दखल से कोई नया रास्ता निकले. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या कांग्रेस वाकई अब भी उस स्थिति में है कि वह अपनी शर्तें मनवा सके?
महागठबंधन के सामने अब असल चुनौती सिर्फ भाजपा और एनडीए से लड़ने की नहीं है, बल्कि अंदरूनी समन्वय और सामंजस्य बनाए रखने की भी है. यदि सीट बंटवारे पर समय रहते सहमति नहीं बनी, तो यह चुनावी तैयारियों को प्रभावित कर सकता है.
राजद का यह रुख बता रहा है कि वह इस बार राजनीतिक समझौतों से ज़्यादा ज़मीनी हकीकत पर फोकस कर रहा है और साथ ही साथ बड़े भाई की भूमिका को कम नहीं होने देना चाहता, कि जिससे अगर भविष्य में महागठबंधन की सरकार बने तो अन्य दल मंत्रिमंडल में ज्यादा प्रभावी न हो .
बिहार की राजनीति में सीटों का खेल पेचीदा रहा है, लेकिन इस बार का समीकरण थोड़ा गंभीर नजर आता है राजद की सख्ती बताती है कि वह अब गठबंधन की मजबूरी नहीं, बल्कि अपनी मजबूती के साथ चुनावी मैदान में उतरना चाहता है. कांग्रेस के सामने विकल्प सीमित हैं—या तो नए समीकरण को स्वीकार कर चुनाव की तैयारी करे, या फिर अंदरूनी मतभेदों के कारण खुद को हाशिए पर जाने दे. आगामी दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कांग्रेस और अन्य दल राजद के इस नए फार्मूले पर सहमत हो पाते हैं, या फिर महागठबंधन एक बार फिर सीटों की सियासत में उलझ कर रह जाएगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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