देश

वोटर लिस्ट में ‘सफाई’ या अधिकारों पर संकट? जानिए क्या है SIR विवाद और क्यों खड़े हो रहे हैं सवाल

भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव की शुरुआत मतदान केंद्र से नहीं, बल्कि मतदाता सूची से होती है. सूची में नाम है तो वोट देने का अधिकार है, नाम नहीं है तो बाकी सारी तैयारियां बेकार हो जाती हैं. इसी वजह से मतदाता सूची को समय-समय पर अपडेट करना और मृत, डुप्लीकेट या अपात्र नामों को हटाना चुनाव प्रक्रिया का जरूरी हिस्सा है.

लेकिन सवाल तब उठता है, जब इस पूरी कवायद में बड़ी संख्या में ऐसे लोगों के नाम भी जांच के घेरे में आ जाएं जो खुद को वैध मतदाता बताते हैं. चुनाव आयोग की ओर से चलाए जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर फिलहाल यही बहस तेज है.

SIR का मकसद क्या है?

SIR की शुरुआत बिहार से हुई थी और बाद में इसे दूसरे राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक बढ़ाया गया. चुनाव आयोग का कहना है कि इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना है.

मगर जमीन पर प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं. घर-घर जाकर सत्यापन, पुराने मतदाता रिकॉर्ड से नाम का मिलान, दस्तावेजों की मांग और कुछ मामलों में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ जैसी श्रेणियों ने कई मतदाताओं के लिए प्रक्रिया को मुश्किल बना दिया है.

इसी बीच, SIR के तहत विभिन्न राज्यों की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए जाने की बात सामने आई है. ये सभी नाम अंतिम रूप से हमेशा के लिए हटाए गए हैं, ऐसा मान लेना सही नहीं होगा, क्योंकि इनमें से कई मामलों में दावे और आपत्तियां दाखिल की जा सकती हैं. फिर भी इतनी बड़ी संख्या अपने आप में प्रक्रिया के पैमाने को दिखाती है.

दिल्ली में नोटिस ने बढ़ाई चिंता

दिल्ली का मामला इस बहस को और ज्यादा सामने ले आया है. हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, राजधानी में करीब 31.63 लाख मतदाताओं को SIR के तहत नोटिस जारी किए गए. इन नोटिसों में अलग-अलग तरह की विसंगतियों का जिक्र है, जिनमें पुराने रिकॉर्ड से नाम का मेल न होना और ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ शामिल है.

दिल्ली में नोटिस पाने वालों में आम नागरिकों के साथ-साथ वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और चुनाव आयुक्त तक शामिल हैं. चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू का नाम भी ऐसे मतदाताओं की सूची में आया था, हालांकि बाद में संबंधित अधिकारी ने उनके रिकॉर्ड को सत्यापित कर दिया.

चुनाव अधिकारियों की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि नोटिस मिलने का मतलब यह नहीं है कि मतदाता का नाम काट दिया गया है. संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाना है. लेकिन आम मतदाता के लिए समस्या यही है कि नोटिस मिलने के बाद उसे यह साबित करने की चिंता सताने लगती है कि वह वोट देने का हकदार क्यों है.

पुराने रिकॉर्ड से मिलान कितना आसान है?

SIR में पुराने मतदाता रिकॉर्ड का इस्तेमाल एक अहम हिस्सा है. लेकिन यहां व्यावहारिक दिक्कतें भी हैं.

मान लीजिए किसी व्यक्ति की उम्र आज 30 या 40 साल है. जरूरी नहीं कि उसका नाम उस पुराने पुनरीक्षण के समय मतदाता सूची में रहा हो. इसी तरह किराए के मकान में रहने वाले लोग, नौकरी के कारण शहर बदलने वाले परिवार, प्रवासी मजदूर और पहली बार वोट देने वाले युवा पुराने रिकॉर्ड से अपना संबंध आसानी से साबित नहीं कर पाते.

यही वजह है कि दस्तावेज और पुराने रिकॉर्ड की मैपिंग को लेकर सवाल उठ रहे हैं. किसी रिकॉर्ड में नाम की स्पेलिंग अलग होना या जन्मतिथि में मामूली अंतर होना भी कई बार परेशानी पैदा कर सकता है.

पश्चिम बंगाल और दूसरे राज्यों में भी विवाद

SIR को लेकर पश्चिम बंगाल में भी बड़े पैमाने पर नामों की जांच और हटाने की प्रक्रिया हुई. वहां कुछ मतदाताओं को संदिग्ध श्रेणियों में रखा गया और बाद में दावों-आपत्तियों तथा न्यायिक प्रक्रिया के जरिए कई नाम बहाल भी हुए.

SIR से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट की दखल भी रही है. 2026 में अदालत ने ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ वाले लाखों मतदाताओं से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए न्यायिक अधिकारियों और बाद में रिटायर्ड हाई कोर्ट जजों की अध्यक्षता वाले ट्रिब्यूनल की व्यवस्था की.चुनाव आयोग ने अदालत को बताया कि बड़ी संख्या में अपीलें अभी लंबित हैं.

इसका मतलब है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ना या हटाना सिर्फ कंप्यूटर पर एक क्लिक का मामला नहीं है. इसके पीछे किसी नागरिक का संवैधानिक अधिकार जुड़ा हुआ है.

चुनाव आयोग के भीतर भी उठे सवाल

SIR को लेकर सबसे अहम घटनाक्रम चुनाव आयोग के भीतर से आया है. द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं. इन आपत्तियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम जोड़ने और हटाने, Form 6 में बदलाव, मतदाता डेटा के केंद्रीकरण और पश्चिम बंगाल में बहाल किए गए नामों के खिलाफ अपील जैसे मुद्दे शामिल थे.

रिपोर्ट के मुताबिक दोनों आयुक्तों ने कुछ फैसलों पर यह सवाल भी उठाया कि वे उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना लिए गए.

दूसरी तरफ, चुनाव आयोग की ओर से यह तर्क दिया गया है कि आयोग के भीतर मतभेद और विचार-विमर्श किसी भी संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा हो सकते हैं और अंतिम निर्णय निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लिए जाते हैं. इसलिए इन आपत्तियों को लेकर सामने आए आरोपों और आयोग के आधिकारिक जवाब दोनों को अलग-अलग समझना जरूरी है.

SIR की प्रक्रिया काफी हद तक डिजिटल सिस्टम पर निर्भर है. इसी को लेकर भी आयोग के भीतर सवाल उठाए गए हैं. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता डेटा और चुनावी सॉफ्टवेयर के केंद्रीकरण को लेकर चिंता जताई थी.

गोवा से जुड़ी एक रिपोर्ट में 97 ऐसे मतदाताओं का मामला सामने आया जिन्हें स्थानीय स्तर पर सुनवाई के बाद पात्र माना गया था, लेकिन अंतिम सूची में उनका नाम शामिल नहीं हुआ. राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने इस मामले में आयोग को कई बार पत्र लिखा था.

ऐसे मामले यह सवाल जरूर खड़ा करते हैं कि अंतिम निर्णय में स्थानीय स्तर के निर्वाचन अधिकारियों और केंद्रीय डिजिटल सिस्टम के बीच जिम्मेदारी की स्पष्ट सीमा क्या है.

सुधार जरूरी है, लेकिन प्रक्रिया भी भरोसेमंद हो

मतदाता सूची की सफाई की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता. फर्जी, मृत या डुप्लीकेट प्रविष्टियों को हटाना चुनाव की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है. लेकिन उतना ही जरूरी यह भी है कि किसी वास्तविक मतदाता का नाम सिर्फ इसलिए ना हटे क्योंकि उसके दस्तावेज पुराने हैं, वह कई बार शहर बदल चुका है या किसी पुराने रिकॉर्ड में उसका नाम ठीक उसी तरह दर्ज नहीं है.

एक व्यावहारिक रास्ता यह हो सकता है कि हर संभावित कटौती का कारण साफ-साफ बताया जाए. ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ जैसी श्रेणियों की परिभाषा आम भाषा में उपलब्ध हो और छोटी-मोटी वर्तनी या उम्र की गलती को सुधारने का आसान विकल्प दिया जाए.

साथ ही, जिन इलाकों में बड़ी संख्या में प्रवासी या किराएदार रहते हैं, वहां विशेष शिविर लगाए जाएं ताकि लोगों को दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें.

आखिरकार SIR का मकसद मतदाता सूची को बेहतर बनाना है. इस प्रक्रिया की सफलता सिर्फ इस बात से नहीं मापी जाएगी कि कितने नाम हटाए गए, बल्कि इससे भी कि कितने पात्र मतदाताओं के नाम सुरक्षित रहे और जिनके नाम पर सवाल उठा, उन्हें अपना पक्ष रखने का वास्तविक मौका मिला या नहीं.

यह भी पढ़ें- NDA के भीतर फूटा असंतोष! BJP के 3 बड़े सहयोगियों ने चुनाव आयोग के खिलाफ खोला मोर्चा, मांगी सफाई

-भारत एक्सप्रेस

रजनीश कपूर, वरिष्ठ पत्रकार

Recent Posts

अटकलों पर लगा विराम! चुनाव आयोग की बड़ी बैठक में CEC और दोनों आयुक्त हुए शामिल, वोटर्स के लिए बढ़ाई डेडलाइन

विवादों के बीच चुनाव आयोग की अहम बैठक में CEC ज्ञानेश कुमार और दोनों आयुक्त…

3 minutes ago

‘टूटे घर को कोई क्या तोड़ेगा..’, गोविंदा की पत्नी पर कोमल रानी ने किया तीखा पलटवार, जानें क्या-कुछ कहा

Komal Rani reply to Sunita Ahuja: अभिनेता गोविंदा की पत्नी सुनीता आहूजा के आरोपों पर…

4 minutes ago

बार काउंसिल ऑफ इंडिया में दो नए चेहरों की एंट्री, पी.एस. अमलराज और संतोष कुमार पी. को मिली बड़ी जिम्मेदारी

बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने तमिलनाडु एवं पुडुचेरी से पी. एस. अमलराज और केरल से…

6 minutes ago

8th Pay Commission Arrears: 17 लाख तक मिल सकता है एरियर? जानिए Level 6 और 7 का पूरा गणित

8th Pay Commission: 8वें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने में देरी पर केंद्रीय कर्मचारियों…

22 minutes ago

बेकाबू हो रहा AI? OpenAI एजेंट्स ने अमेरिकी सरकारी वेबसाइट्स में लगाई सेंध, कई यूजर्स की तस्वीरें की लीक

AI Agents Security Breach: OpenAI एजेंट्स ने बिना किसी कमांड के अमेरिकी सरकार की एक…

25 minutes ago