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सुप्रीम कोर्ट ने एक युवक उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपने जैविक पिता का पता लगाने के लिए डीएनए की कर रहा था मांग

सुप्रीम कोर्ट ने एक युवक उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने अपने जैविक पिता का पता लगाने के लिए डीएनए का मांग कर रहा था. जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने यह आदेश दिया है. कोर्ट याचिका को खारिज करते हुए कहा कि युवक द्वारा अपने जैविक पिता के साथ अपने कथित रिश्ते के बारे में किया गया कोई भी दावा खारिज किया जाता है और युवक को अपने कानूनी पिता जा वैध पुत्र माना जाता है. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि दोनों अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित होना चाहिए. कोर्ट को आदेश देने से पहले देखना चाहिए कि डीएनए टेस्ट की जरूरत है या नही.

डीएनए की कर रहा था मांग

23 वर्षीय युवक का कहना है कि उसका जन्म उसकी मां के विवाहेत्तर प्रेम संबंध का नतीजा है. वह कई बीमारियों से ग्रसित है और ऑपरेशन भी करवा चुका है. युवक के मुताबिक उसकी मां उसके बीमारी में होने वाले खर्च नही उठा सकती है. इसलिए वह चाहता है कि उसके जैविक पिता का पता चल सके ताकि वह उससे भरण पोषण का खर्च ले सके. सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देते हुए कहा कि अदालतों को पक्षों के निजता और सम्मान के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए और यह मूल्यांकन करना चाहिए कि किसी एक को गलत घोषित करने से उसे सामाजिक नुकसान पहुचे गा या नहीं. कोर्ट ने कहा यह भी देखा जाना चाहिए कि जैविक पिता की वैधता साबित करने के लिए डीएनए की आवश्यकता है या नहीं.

कोर्ट ने कही ये बात

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में बच्चे की मां सक्रिय रूप से जुड़ी है, लेकिन यह भी देखना होगा कि बच्चा अपनी मां की भावनाओं की अनदेखी करपितृत्व की घोषणा चाहता है. इससे कमजोर महिलाओं के खिलाफ इसका दुरुपयोग हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोर्ट डीएनए टेस्ट का आदेश दे देता है तो युवक की मां पर कानून की अदालत के बाद जनता की राय की अदालत में भी मुकदमा चलाया जाएगा, इससे काफी मानसिक परेशानी होगी. युवक की मां 1989 में शादी की और 1991 में उसे एक बेटी हुई. बेटे का जन्म 2001 में हुआ. 2003 में पति को छोड़कर अलग रहने लगी.

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दोनों के बीच हुआ तलाक

बाद में 2006 में दोनों के बीच तलाक हो गया. तलाक के बाद महिला जन्म प्रमाणपत्र में बेटे के पिता का नाम बदलवाने कोच्चि नगर निगम गई. लेकिन अधिकारियों ने महिला को कोर्ट जाने की सलाह दिया था, क्योंकि महिला का दावा है कि बेटे का जन्म विवाहेत्तर प्रेम संबंध से हुआ है. जिसके बाद मामला निचली अदालत पहुचा, निचली अदालत ने डीएनए टेस्ट का आदेश दिया.

जैविक पिता ने हाई कोर्ट को दी चुनौती

इस बीच जैविक पिता ने निचली अदालत के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दे दी. हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले पर रोक लगा दिया. जिसके बाद युवक ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कि जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया. हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले पर रोक लगाते हुए कहा था कि विवाह के दौरान या तलाक के 280 दिनों के भीतर जन्मा बच्चा पति की वैध संतान होता है.

-भारत एक्सप्रेस
गोपाल कृष्ण

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