दिल्ली हाई कोर्ट से आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को बड़ी राहत मिल गई है. अदालत ने सिसोदिया के 2020 के विधानसभा चुनाव जीतने के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया है. साथ ही कोर्ट ने कहा कि सिर्फ एफआईआर दर्ज होने की जानकारी देने की जरूरत नहीं है.
जस्टिस मनमीत सिंह ने कहा कि यह तभी होता है, जब आरोप तय हो जाते हैं, या कोर्ट द्वारा अपराध का संज्ञान लिया जाता है, तभी खुलासा करने की कानूनी जिम्मेदारी आती है. यह याचिका का प्रतिद्वंद्वी राष्ट्रीय राष्ट्रवादी पार्टी के उम्मीदवार प्रताप चंद्र ने आरोप लगाया था कि सिसोदिया ने चुनावी नियमों का उल्लंघन किया और अपने नामांकन पत्र में एक पुरानी एफआईआर की जानकारी छुपाई.
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता आरोपों के समर्थन में कोई पुख्ता सबूत पेश नहीं कर पाया. मनीष सिसोदिया ने पडपडगंज सीट पर 70163 पाकर जीत हासिल की थी, जबकि प्रताप चंद्र को मात्र 95 वोट मिले थे. प्रताप चंद्र ने आरोप लगाया कि मनीष सिसोदिया ने चुनाव प्रचार और चुनावी सामग्री का प्रदर्शन मतदान खत्म होने से पहले 48 घंटे की प्रतिबंधित अवधि के दौरान जारी रखा.
चंद्र ने यह भी आरोप लगाया कि मनीष सिसोदिया ने 2013 में राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम 1971 के तहत अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर की जानकारी नहीं दी, जो जरूरी तथ्यों को दबाने के बराबर है. कोर्ट ने आने फैसले में कहा कि चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार की आपराधिक पृष्ठभूमि बताने का मकसद यह पक्का करना है कि वोटर को ऐसी पृष्ठभूमि के बारे में पता हो. ताकि वोटर अपने मताधिकार का इस्तेमाल करते समय सोच-समझकर चुनाव कर सकें.
कोर्ट ने कहा कि रेस्पोडेंट की तरफ से जानकारी दिखाने के लिए ऐसी कोई दलील या मटीरियल न होने पर, एफआईआर का खुलासा न करने को जानबूझकर छिपाना नहीं माना जा सकता, ताकि सजा या चुनावी नतीजे भुगतने पड़े.
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-भारत एक्सप्रेस
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