अंतरराष्ट्रीय ADR सम्मेलन में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने विवादों के समाधान में मध्यस्थता की बढ़ती भूमिका पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि मुकदमेबाजी और मध्यस्थता का उद्देश्य एक जैसा नहीं है. जहां अदालत और मध्यस्थता प्रक्रिया यह तय करने पर केंद्रित होती है कि कानून के मुताबिक कौन सही है, वहीं मध्यस्थता पक्षकारों को ऐसा समाधान खोजने का अवसर देती है, जिसे वे खुद स्वीकार कर सकें और जिस पर आगे काम कर सकें.
सीजेआई ने अपने शुरुआती करियर का एक अनुभव साझा करते हुए बताया कि दो पुराने दोस्त, जो बिजनेस पार्टनर भी थे, करीब एक दशक पुराने विवाद को लेकर अदालत पहुंचे थे. सुनवाई से पहले एक वरिष्ठ वकील ने दोनों को अलग कमरे में बैठकर आपस में बातचीत करने की सलाह दी. बातचीत के बाद दोनों ने खुद अपनी शर्तों पर समझौता तैयार किया और फिर से साझेदार बन गए. सीजेआई ने कहा कि यह अनुभव उनके लिए मध्यस्थता की वास्तविक ताकत को समझने वाला रहा.
सीजेआई ने कहा कि मध्यस्थता की सफलता के पीछे मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं. जब विवाद के पक्षकार खुद समाधान की शर्तें तय करते हैं तो उनके उस समझौते का पालन करने की संभावना ज्यादा रहती है. इसके विपरीत अदालत से मिला फैसला कानूनी रूप से मजबूत होने के बावजूद आगे चुनौती, अपील या उसके क्रियान्वयन को लेकर विवाद की गुंजाइश छोड़ सकता है. उन्होंने कहा कि शोध में यह सामने आया है कि मध्यस्थता से हुए समझौतों में स्वैच्छिक अनुपालन करीब 90 फीसदी तक हो सकता है.
सीजेआई ने कहा कि पिछले एक-दो दशकों में मध्यस्थता की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव आया है. पहले मध्यस्थता को सीमित संसाधनों वाले कमरों और समझौते के लिए पक्षकारों पर दबाव बनाने वाली प्रक्रिया के तौर पर देखा जाता था. अब प्रशिक्षित पेशेवर, संस्थागत मध्यस्थता केंद्र, केस मैनेजर, डिजिटल फाइल और ऑनलाइन डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन जैसी आधुनिक व्यवस्थाएं इसका हिस्सा बन चुकी हैं.
उन्होंने Med-Arb-Med जैसे हाइब्रिड मॉडल का भी उल्लेख किया. इसमें शुरुआत मध्यस्थता से होती है. यदि किसी मुद्दे पर सहमति नहीं बनती तो मध्यस्थ या आर्बिट्रेटर उस सीमित मुद्दे पर फैसला करता है और इसके बाद पक्षकार फिर मध्यस्थता की प्रक्रिया में लौटते हैं. सीजेआई के मुताबिक इससे आर्बिट्रेशन की मजबूती और मध्यस्थता में पक्षकारों की भागीदारी, दोनों को साथ लाने की कोशिश होती है.
भारत को वैश्विक मध्यस्थता केंद्र बनाने पर जोर सीजेआई ने कहा कि भारत में मध्यस्थता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव हो रहे हैं. मध्यस्थता अधिनियम, 2023 ने देश में पहली बार मध्यस्थता के लिए स्वतंत्र कानूनी ढांचा उपलब्ध कराया है. कानून में पक्षकारों को मध्यस्थ और प्रक्रिया चुनने में स्वायत्तता देने के साथ मध्यस्थता से हुए समझौतों को डिक्री के समान प्रभाव देने और समयसीमा तय करने की व्यवस्था की गई है. उन्होंने कहा कि भारत के पास वैश्विक स्तर पर मध्यस्थता का प्रमुख केंद्र बनने की क्षमता है. तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को देखते हुए देश में अत्याधुनिक विवाद समाधान व्यवस्था विकसित करना जरूरी है, ताकि अंतरराष्ट्रीय और जटिल कारोबारी विवादों को भी भारत में प्रभावी तरीके से सुलझाया जा सके.
सीजेआई ने कहा कि भारत में मध्यस्थता को संस्थागत मजबूती देने में न्यायपालिका का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. कोर्ट से जुड़े मध्यस्थता केंद्र, न्यायिक अकादमियों में जजों का प्रशिक्षण, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की मध्यस्थता एवं सुलह समितियां और ऐसे न्यायिक फैसले, जिनमें पक्षकारों को अदालत में जाने से पहले मध्यस्थता की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, इस व्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं.
उन्होंने कहा कि अब जरूरत इस बात की है कि न्यायपालिका, बार और संस्थागत मध्यस्थता से जुड़े लोग मिलकर इस व्यवस्था को और मजबूत करें. भारत को ADR यानी वैकल्पिक विवाद समाधान के क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल करने की दिशा में सामूहिक प्रयास किया जाना चाहिए.
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भारत एक्सप्रेस
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