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दिल्ली कोर्ट ने मेधा पाटकर की अपील खारिज की, मानहानि मामले में सजा बरकरार

दिल्ली के साकेत कोर्ट से नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर को झटका लगा है. कोर्ट ने उप राज्यपाल वीके सक्सेना की ओर से दाखिल आपराधिक मानहानि मामले में दोषी करार दी गई नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर द्वारा सजा को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विशाल सिंह ने मेधा पाटकर को 18 अप्रैल को पेश होने का निर्देश दिया है. कोर्ट उसी दिन सजा कम करने की मांग वाली अर्जी पर फैसला सुना सकता है.

कोर्ट ने दोनों पक्षों की जिरह के बाद 5 मार्च को फैसला सुरक्षित रख लिया था. साकेत कोर्ट ने पांच महीने की साधारण कारावास की सजा और 10 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया है. जिसके खिलाफ मेधा पाटकर ने सेंशन कोर्ट में अपील दाखिल की थी. मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली के उप राज्यपाल की ओर से पेश वकील ने मेधा पाटकर को आत्मसमर्पण करने का निर्देश देने का आग्रह करते हुए कहा था कि मेधा पाटकर की याचिका सुनवाई योग्य नही है, उसे खारिज कर देना चाहिए. क्योंकि मेधा पाटकर ने अपनी याचिका में हस्ताक्षर नही किया है.

सक्सेना कायर है- मेधा पाटकर

जिसपर कोर्ट ने मेधा पाटकर से अपील की कॉपी पर हस्ताक्षर के साथ जज की आधिकारिक ईमेल पर मेल भेजने को कहा था. बता दें कि मेधा पाटकर के खिलाफ दिल्ली के उप राज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने पाटकर के खिलाफ 25 नवंबर 2000 को अहमदाबाद की एक अदालत में मानहानि का शिकायत किया था और उसमें पाटकर की एक प्रेस नोट का हवाला दिया था. प्रेस नोट देशभक्त का असली चेहरा शीर्षक से था और उसमें कहा गया था कि हवाला लेन देन से दुखी वीके सक्सेना खुद मालेगांव आये. एनबीए की तारीफ की और 40 हजार रुपए का चेक दिया.

लेकिन चेक भुनाया नहीं जा सका और बाउंस हो गया. जांच करने पर बैंक ने बताया कि खाता मौजूद ही नही है. मेधा पाटकर ने यह भी कहा था कि सक्सेना कायर है, देशभक्त नहीं. अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि मेधा पाटकर की हरकतें जानबूझकर और दुर्भाग्यपूर्ण थी, जिसका उद्देश्य सक्सेना की छबि को धूमिल करना था. इससे उनकी छवि और साख को काफी नुकसान पहुचा है. उनके लगाए गए आरोपी भी न केवल मानहानिकारक है, बल्कि नकारात्मक धारणाओं को भड़काने के लिए भी गढ़े हुए है. इसके अलावा यब आरोप है कि शिकायतकर्ता गुजरात के लोगों और उनके संसाधनों को विदेशी हितों के लिए गिरवी रखा रहा है. यह उनकी ईमानदारी और सार्वजनिक सेवा पर सीधा हमला है.

ये भी पढ़ें: बिहार में गिरते पुलों की जांच याचिका सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट भेजी

-भारत एक्सप्रेस

गोपाल कृष्ण

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