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जस्टिस बीवी नागरत्ना ने प्रेस की आजादी को लेकर जताई चिंता, बोली- ‘असहमति का अधिकार ही न्यायिक स्वतंत्रता’

केरल हाई कोर्ट में आयोजित दूसरा जस्टिस टी.एस. कृष्णमूर्ति अय्यर मेमोरियल लेक्चर के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि जजों को सही फैसला लेने में हिचकिचाना नहीं चाहिए. भले ही इससे उन्हें प्रमोशन मिलना बंद हो जाए या सता में बैठे लोग नाराज हो जाए.

फैसलों को करना पड़ता रद्द

जस्टिस बीवी नागरत्ना (Justice BV Nagarathna) ने कहा कि ज्यूडिशियल रिव्यू के लिए अक्सर कोर्ट को कानून को अमान्य करना पड़ता है. उन्होंने कहा कि कार्यपालिका के काम पर रोक लगानी पड़ती है और कभी-कभी तो राजनीतिक बहुमत से किए गए संवैधानिक बदलाओं को भी रद्द करना पड़ता है.

जस्टिस नागरत्ना ने यह भी कहा कि ये आसान काम नहीं हैं. इनके अक्सर राजनीतिक नतीजे होते है. उन्होंने कहा कि जजों को शायद पता हो कि कोई नापसंद फैसला उनके प्रमोशन, एक्सटेंशन की संभावनाओं पर असर डाल सकता है या उन्हें सत्ता में बैठे लोगों की बुरी नजर में डाल सकता है.

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि संविधान जो मांग करता है, उसे करने में जागरूकता कभी भी रुकावट नहीं बननी चाहिए. जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि पद की शपथ एक जज का न्यायिक धर्म है. इसका सम्मान किया जाना चाहिए, चाहे इसके निजी या पेशेवर नतीजे कुछ भी हों.

प्रेस की आजादी को किससे खतरा?

हालही में एक मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा था किमीडिया प्रतिष्ठान कानूनी रूप से सरकार की आलोचना करने के लिए स्वतंत्र हो सकता है, फिर भी आर्थिक रूप से इस तरह से मजबूर हो सकता है कि ऐसी आलोचना महंगी पड़ जाए.

उन्होंने ये भी कहा था कि मीडिया अपना काम ठीक से तभी कर सकता है, जब वह किसी भी तरह के डर या दबाव से मुक्त हो. उन्होंने कहा था कि आज के दौर में प्रेस की आजादी को सबसे बड़ा खतरा सीधे तौर पर लगने वाली पाबंदियों से नहीं है, बल्कि असली खतरा आर्थिक नीतियों, लाइसेंस देने के कड़े नियमों और मीडिया कंपनियों के मालिकाना हक से जुड़ा है.

असहमति जताने का अधिकार शामिल

जस्टिस नागरत्ना ने यह भी कहा कि उस सुधार के पल ने दिखाया कि संवैधानिक ईमानदारी आखिरकार कुछ समय के राजनीतिक फायदे से ज्यादा समय तक चलती थी. न्यायिक स्वतंत्रता में जज के असहमति जताने का अधिकार भी शामिल है. जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता का मतलब सिर्फ संवैधानिक सुरक्षा उपायों या इंस्टिट्यूशनल डिजाइन से नहीं, बल्कि इस बात से निकलता है कि जज अपने पद का काम कैसे करते हैं.

ये भी पढ़ें: विदेशी अदालत का फैसला आने के बाद भारत में दोबारा कानूनी प्रक्रिया नहीं: दिल्ली हाई कोर्ट

-भारत एक्सप्रेस

गोपाल कृष्ण

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