आवारा कुत्तों के मामले में दायर याचिकाओं पर 9 जनवरी को भी सुनवाई जारी रहेगी. जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन वी अंजारिया की पीठ सुनवाई कर रही हैं. जस्टिस विक्रमनाथ ने कहा कि कुत्ते इंसानों का डर पहचान लेते हैं, इसलिए काटते है. जिसका समर्थन करने वाले वकील ने इनकार किया.
इसपर जस्टिस विक्रमनाथ ने कहा कि यह बातें वह अपने निजी अनुभव से कह रहे है. सुनवाई के दौरान अन्य वकील ने कोर्ट को बताया कि कुत्तों को जहां से पकड़ा गया है, वही छोड़ा जाना चाहिए. उन्होंने कोर्ट को यह भी बताया कि बेंगलुरू में कुत्तों की माइक्रो चीपिंग शुरू हो गई है और यह महंगा भी नही है. सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया है पालतू कुत्ते का मालिक होता है, जबकि सड़को पर रहने वाले कुत्तों का मालिक नही होता और ना ही राज्य सरकार की जिम्मेदारी है. लेकिन राज्य की जिम्मेदारी वैक्सिनेशन देना है. अभी तक सिर्फ 66 AB सेंटर को ही मान्यता मिली है. पूरे देश में 5.2करोड़ कुत्ते है.
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पूछा कि प्रशासन द्वारा एबीसी नियमों का पालन न करने की कीमत आम लोगों को क्यों चुकानी पड़े. नियुक्त एमिकस क्यूरी गौरव अग्रवाल ने हलफनामा दाखिल कर कोर्ट को बताया कि अब तक 16 राज्यों ने हकफनामा दाखिल किया है. जबकि 7 राज्यों ने शपथ पत्र दाखिल नही किया है. उन्होंने कोर्ट को बताया कि वो एक रिपोर्ट तैयार कर कोर्ट को देंगे. सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील सी. यू. सिंह ने कोर्ट को बताया कि पशु कल्याण बोर्ड की एसओपी के संबंध में 4 बड़े राज्यों ने औपचारिक आपत्तियां दाखिल की हैं, जो प्रासंगिक हो सकती है. उन्होंने कोर्ट को बताया कि दिल्ली में चूहों और बंदरों की समस्या भी है. यदि कुत्तों को अचानक हटाया जाता है, तो चूहों की संख्या तेजी से बढ़ जाती है. चूहे रोग फैलाने वाले होते हैं. कुत्ते परिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं.
इसपर टिप्पणी करते हुए जस्टिस मेहता ने कहा कि इसका कोई.संबंध नही है, बल्कि कुत्ते और बिल्लियां दुश्मन होती है. उन्होंने कहा कि हमें अधिक बिल्लियों को बढ़ावा.देना चाहिए, क्योंकि वे चूहों की दुश्मन होती है. कोर्ट ने कहा कि हमने सड़कों से हर कुत्ते को हटाने का निर्देश नही दिया है. उनके साथ नियमों के अनुसार ही व्यवहार किया जाना चाहिए.
वरिष्ठ वकील सीयू सिंह ने कहा कि नियम रेगुलर करने की जरूरत है, जैसे कि उसकी नसबंदी करके, उसी इलाके में छोड़ना. इसपर जस्टिस मेहता ने पूछा कि हर अस्पताल में कितने कुत्ते होने चाहिए? क्या हर विस्तर पर एक? वही वरिष्ठ वकील ध्रुव मेहता ने कहा कि नियमों में यह परिकल्पना की गई है कि जब तक शेल्टर होम की पर्याप्त संख्या उपलब्ध नही होगी, तब तक कुत्तों को पकड़ा नहीं जा सकता. क्योंकि यदि क्षमता ही नहीं है, तो उन्हें रखा कहा जाएगा? जब तक हमें उनकी संख्या की स्पष्ट जानकारी नहीं होगी, मुझे नहीं लगता कि यह जानने के लिए आवश्यक आंकड़े उपलब्ध हैं कि वास्तव में कितनी क्षमता मौजूद है.
वरिष्ठ वकील सीयू सिंह ने कहा कि जेएनयू 1000 एकड़ में हैं. डीयू लगभग 70-80 एकड़ में है. रेलवे क्षेत्रों की सीमाएं खुली हैं. जबकि याचिकाकर्ता की ओर से पेश अन्य वरिष्ठ वकील के. के वेणुगोपाल ने कहा कि मैं सहमत हूं कि अस्पताल के वार्ड में कुत्ते नही हो सकते. मैं कह रहा हूं कि अब तक वैधानिक नियमों को लागू करने की कोई इच्छाशक्ति नहीं रही है.
AWBI का एसओपी उनके अपने नियमों का उल्लंघन है. प्रस्तावित तरीके का अनुमानित खर्च 26800 करोड़ रुपए तक जा सकता है. 91800 नए शेल्टर बनाने होंगे. वेणुगोपाल ने सुझाव दिया है कि नियमों को लागू करने के लिए कोई बजटीय आवंटन नही है. अगर हर जिले में एक AB सेंटर हो, इसकी लागत 1600 करोड़ रुपये आएगी. केंद्र सरकार के पांच मंत्रालयों को इसमें शामिल किया जाना चाहिए. उन्होंने नोडल एजेंसी बनाने का सुझाव भी दिया है.
-भारत एक्सप्रेस
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