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क्या राज्यपाल केंद्रीय कानून के खिलाफ विधेयक को सुरक्षित रख सकते हैं?- सीजेआई बी आर गवई

राष्ट्रपति और राज्यपालों पर विधेयकों को लेकर समयसीमा तय करने से संबंधित मामले में चल रही 7 वें दिन की सुनवाई पूरी हो गई है. सीजेआई बी आर गवई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ मामले में सुनवाई कर रही है. कोर्ट 9 सितंबर को इस मामले में अगली सुनवाई करेगा. मामले की सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश सरकार ने अपना पक्ष रखा है. पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि आजादी के बाद से क्या आपने राष्ट्रपति को विधेयक रोके रखते सुना है? इसका क्या कारण है? इसपर सीजेआई गवई ने कहा कि यह जनता की इच्छा है. सिब्बल ने कहा कि हां, क्योंकिं यह जनता की इच्छा है. इसमें तात्कालिकता का तत्व है, इसे तुरंत लागू किया जाना चाहिए.

राज्यपाल विधेयक की संवैधानिकता की जांच नहीं कर सकते- सिब्बल

उन्होंने कहा कि विधायिका का विधेयक की संवैधानिकता से कोई लेना देना नहीं होता है, यह आपके अधिकार क्षेत्र का मामला है. इसपर सीजेआई गवई ने कहा कि तो आपके मुताबिक किसी विधेयक की विधायी क्षमता की जांच राज्यपाल द्वारा नहीं कि जा सकती? इसपर सिब्बल ने कहा कि बिल्कुल, विधेयक पेश करने और पारित करने के चरण में हम विधेयक की संवैधानिकता की जांच नहीं करते.

सिब्बल ने कहा कि किसी कानून को नागरिक या कोई अदालत में चुनौती दे सकते है. सिब्बल ने कहा कि यह बहुत ही दुर्लभ और दुर्लभ मामला है. जब कोई राज्यपाल कहे कि मैं इसे पारित नहीं कर सकता. सीजेआई गवई ने कहा कि सवाल यह है कि क्या राज्यपाल अपने अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकते? याचिकाकर्ता के दलील पर सीजेआई ने कहा कि अगर राज्यपाल को लगता है कि यह कानून केंद्रीय कानून के प्रतिकूल है, तो क्या वे इसे सुरक्षित नहीं रख सकते?

सिब्बल ने कहा कि क्या राज्यपाल को इसमें देरी करने की अनुमति दी जानी चाहिए? उन्होंने कहा कि वैवाहिक समझौते के बिना सदन नही चल सकता और यह संस्थाओं पर भी लागू होता है. सिब्बल ने कहा कि संविधान की ऐसी व्याख्या न करें कि यह अव्यवहारिक हो जाए. सिब्बल ने कहा कि राज्यपाल की विवेकाधिकर शक्ति विधेयक पर निर्णय लेते समय लागू नही होती है. यह अवधारण अनुच्छेद 200 के लिए अजनबी है. उन्होंने कहा कि इस मामले में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा दी गई दलीलों को पहले तीन जजों ने खारिज कर दिया था. सिब्बल ने कहा कि विवेकाधिकार अनुच्छेद 200 के दायरे से बाहर है. वही गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा कि 1954 से कानून में यह स्थायी स्थिति रही है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल नाममात्र के प्रमुख है.

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-भारत एक्सप्रेस

गोपाल कृष्ण

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