केरल में कैदियों के लिए लागू फर्लो (अस्थाई रिहाई) और अवकाश नियमों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जल्द सुनवाई से इनकार कर दिया है. कोर्ट अक्टूबर में सुनवाई करेगा. सीजेआई बी आर गवई, जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस एन वी अंजारिया की कोर्ट के समक्ष मेंशनिंग कर जल्द सुनवाई की मांग की गई.
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने दलील दी और कहा कि यह मामला कैदियों के मौलिक अधिकारों और कारागार प्रशासन की नीतियों से जुड़ा है, लिहाजा याचिका पर जल्द सुनवाई कर लिया जाए. पैरोल और फर्लो, दोनों सशर्त रिहाई का एक रूप हैं, जिसका अर्थ है कि कैदी को फरलो या पैरोल की अनुमति देने वाले आदेश में निर्धारित शर्तों का पालन करना होता है.
फरलो और पैरोल हिरासत में एक अल्पकालिक रिहाई की परिकल्पना करते है, दोनों कैदियों के प्रति सुधरात्मक कदम है. फरलो को कैदियों के अधिकार के रूप में दिया जाता है. बता दें कि एक मामले की सुनवाई के दौरान हालही में केरल हाई कोर्ट ने कहा था कि कैदियों के पास पैरोल का कोई अंतर्निहित या मौलिक अधिकार नहीं होता.
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अदालत ने कहा कि अस्थायी रिहाई (पैरोल) का दावा केवल तभी किया जा सकता है, जब जेल अधिनियम और संबंधित नियमों में निर्धारित वैधानिक शर्ते पूरी हों, और इसे देना या न देना पूरी तरह सक्षम प्राधिकारी के वेवेक पर निर्भर करता है. अदालत ने यह भी माना था कि यदि कोई दोषी कैदी पात्रता की सभी शर्ते पूरी करता है, तब भी ठोस कारणों के आधार पर प्राधिकारी पैरोल देने से इनकार कर सकता है.
कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कर दिया था कि नियम 397 छुट्टी के लिए पूर्ण अधिकार प्रदान नही करता, और यदि इसे इस तरह समझा जाए तो यह अधिनियम की तुलना में नियमों को प्राथमिकता देने जैसा होगा, जो कानूनी तौर पर गलत है.
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-भारत एक्सप्रेस
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