सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) से जुड़े मामले पर तत्काल या जल्द सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया है. CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने याचिकाकर्ता की उस मांग को खारिज कर दिया, जिसमें पश्चिम बंगाल के रेजीनगर और नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्रों में होने वाले उपचुनावों से पहले इस मामले पर सुनवाई की गुहार लगाई गई थी.
इन दोनों सीटों पर आगामी 6 अक्टूबर को उपचुनाव होना है. सुनवाई के दौरान सीजेआई ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि “ये सिर्फ उपचुनाव हैं”, और यह मामला पहले से ही आगामी 5 अक्टूबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है.
इस मामले में चुनाव आयोग (EC) की ओर से पहले ही एक विस्तृत हलफनामा दाखिल किया जा चुका है, जिसमें अपीलों के निपटारे, नाम हटाए जाने, नाम दोबारा जोड़ने और चुनाव परिणामों पर एसआईआर के कथित असर से जुड़े तमाम आंकड़े सामने रखे गए हैं:
चुनाव आयोग के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के तहत अब तक कुल 38.3 लाख से ज्यादा अपीलें दाखिल की जा चुकी हैं. इनमें से 10 सितंबर तक केवल करीब 1.26 लाख अपीलों पर ही फैसला हो सका है. वर्तमान में ट्रिब्यूनलों के सामने लगभग 37,05,235 मामले लंबित हैं. जिन 1.26 लाख अपीलों पर अब तक फैसले आए हैं, उनमें से 1,13,943 लोगों के नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल किए गए हैं. यानी जिन मामलों का निपटारा हुआ, उनमें 90 प्रतिशत से अधिक फैसले नाम वापस जोड़ने के पक्ष में रहे.
ये भी पढ़ें: महिला पहलवानों की अपील पर राऊज एवेन्यु कोर्ट ने बृजभूषण और विनोद तोमर को नोटिस जारी कर मांगा जवाब
आयोग ने कोर्ट को बताया कि यदि इसी मौजूदा रफ्तार से अपीलों का निपटारा किया जाता रहा और ट्रिब्यूनल हफ्ते के सातों दिन काम करें, तो भी सभी मामलों का निबटारा करने में 146 महीने (लगभग 12 साल) का समय लग जाएगा. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को सुझाव दिया है कि पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों के हिसाब से कम से कम एक-एक ट्रिब्यूनल का गठन किया जाना चाहिए. इसके अलावा, आयोग ने यह प्रस्ताव भी दिया है कि न्यायिक अधिकारियों को ‘वर्क फ्रॉम होम’ और डिजिटल सुनवाई की अनुमति दी जाए ताकि प्रक्रिया में तेजी लाई जा सके.
चुनाव आयोग ने उन दावों को भी खारिज किया जिनमें कहा जा रहा है कि एसआईआर के कारण चुनाव परिणाम प्रभावित हो सकते हैं. आयोग का कहना है कि यदि किसी विधानसभा क्षेत्र में 10 हजार नाम हटाए जाते हैं और जीत का अंतर 5 हजार रहता है, तो केवल इन दोनों आंकड़ों को जोड़कर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हटाए गए मतदाताओं की वजह से चुनाव परिणाम बदला. इसके लिए यह देखना जरूरी है कि उनमें से कितने लोग वास्तव में पात्र मतदाता थे, कितनों ने अपील की और उन अपीलों का परिणाम क्या रहा. यह पूरा मामला पश्चिम बंगाल कांग्रेस की एसआईआर समिति के अध्यक्ष प्रसेनजीत बोस द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने पहले चुनाव आयोग से जवाब तलब किया था.
लखनऊ में आयोजित मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के कार्यकर्ता सम्मेलन में डॉ. इंद्रेश कुमार ने देश…
प्रधानमंत्री मोदी नई दिल्ली के आईपी एक्सटेंशन में दशहरा समारोह में शामिल हो सकते हैं.…
Ardhanarishvara Story: मां सिद्धिदात्री को नवदुर्गा का नौवां रूप माना जाता है. प्रचलित कथा के…
Asian Para Games 2026 PM Modi Indian contingent: जापान के आइची-नागोया में एशियन पैरा गेम्स…
Maa Durga weapons to kill Mahishasura: महिषासुर वध के लिए मां दुर्गा को परमेश्वर शिवजी…
Firing On Tiger Shroff: अभिनेता टाइगर श्रॉफ को लेकर बड़ी खबर सामने आई है. जुहू…