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पोर्नोग्राफी पर बैन की मांग; सुप्रीम कोर्ट का तुरंत सुनवाई से इनकार, कहा- रजिस्ट्रार के पास जाएं

सुप्रीम कोर्ट ने पोर्नग्राफी पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया है. जस्टिस बी. वी नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील को रजिस्ट्रार के समक्ष मेंशन करने को कहा है. यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता बीएल जैन की ओर दायर दायर किया गया है.

पिछली सुनवाई में याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील वरुण ठाकुर ने कहा था कि युवाओं के लिए डिजिटल पहुच की शुरुआत खासकर कोविड 19 महामारी के बाद 14 से 18 साल के बच्चों को बस एक क्लिक में पोर्नग्राफी के संपर्क में ला दिया है. दायर याचिका में केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की गई है कि वह अश्लील सामग्री तक पहुंच को रोकने के लिए, विशेष रूप से नाबालिगों के बीच एक राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना तैयार करे और सार्वजनिक स्थानों पर ऐसी सामग्री देखने पर प्रतिबंध लगाए.

सरकारी आंकड़ों को हवाला देते हुए कहा गया है कि भारत मे लाखों अश्लील वेबसाइट उपलब्ध है और 20 करोड़ से ज्यादा पोर्न वीडियो या पोर्न क्लिपिंग, जिनमें चाइल्ड पोर्नग्राफी भी शामिल है, खुलेआम उपलब्ध है. जिनमें बाल यौन शोषण को दर्शाने वाले वीडियों भी शामिल है. याचिका में यह भी कहा गया है कि 2005 से हर सेकेंड 5 हजार पोर्न साइट्स देखी जा रही हैं. हर साल इंटरनेट या पोर्न वीडियो के जरिए 2 करोड़ से ज्यादा पोर्न वीडियो या पोर्न क्लिप जारी की जा रही है.

2024 में सुप्रीम कोर्ट ने चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर दिया था फैसला

दायर याचिका में धारा 69 A का भी जिक्र किया गया है. जो केंद्र सरकार को किसी भी कंप्यूटर संसाधन के जरिए किसी भी जानकारी तक जनता की पहुच को रोकने के लिए निर्देश जारी करने का अधिकार देती है. हालांकि याचिकाकर्ता का कहना है कि उक्त प्रावधान के तहत मिली शक्तियों के बावजूद, केंद्र सरकार ने ऐसा कोई प्रतिबंध नही लगाया है. बता दें कि वर्ष 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने चाइल्ड पोर्नोग्राफी को लेकर ऐतिहासिक फैसला दिया था. कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया था.

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि फोन में पोर्न वीडियो को सिर्फ रखने से किसी को पॉक्सो एक्ट और आईटी कानून की धारा 67B के तहत आरोपी नहीं बनाया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि मोबाइल फोन में पॉर्न रखना और देखना दोनों अपराध है.

कोर्ट ने यह भी कहा था कि अगर किसी से गलती से डाउनलोड हो जाता है और वह डिलीट कर देता है तो वह अपराध नही होगा. लेकिन अगर मोबाइल फोन से डिलीट नही करता है तो वह अपराध है.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से चाइल्ड पोर्नग्राफी शब्द को बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री से बदलने के लिए अध्यादेश जारी करने का सुझाव दिया था. कोर्ट ने देश के सभी अदालतों को भी निर्देश दिया था कि वे चाइल्ड पोर्नग्राफी शब्द का उपयोग न करें.

ये भी पढ़ें: ‘प्राइवेट छात्र होने से नहीं रोक सकते रिजल्ट’; सऊदी अरब के प्रांशु पटेल की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सीबीएसई को दिए थे निर्देश

-भारत एक्सप्रेस

गोपाल कृष्ण

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