क्या हंटावायरस भी COVID-19 की तरह ले सकता है एक महामारी का रूप?
दुनिया अभी कोरोना और इबोला वायरस के जख्मों से पूरी तरह उबर भी नहीं पाई कि एक और खतरनाक वायरस ने चिंता बढ़ा दी है. हाल ही में अटलांटिक महासागर में सफर कर रहे ‘एमवी होंडियस’ (MV Hondius) नाम के एक क्रूज शिप पर हंटावायरस (Hantavirus) का प्रकोप देखने को मिला है. इस घटना के बाद से आम लोगों के मन में यह सवाल उठने लगा है कि क्या हंटावायरस भी कोविड-19 की तरह पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लेगा? क्या यह एक नई वैश्विक महामारी का रूप ले सकता है? आइए जानते हैं कि इस गंभीर विषय पर दुनिया भर के और भारत के बड़े डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का क्या कहना है.
इस बीमारी की ताजा विभीषिका की शुरुआत अप्रैल 2026 में अर्जेंटीना से रवाना हुए एक डच क्रूज शिप ‘एमवी होंडियस’ से हुई. इस जहाज पर 23 देशों के लगभग 147 यात्री और क्रू मेंबर्स सवार थे. सफर के दौरान अचानक यात्रियों में तेज बुखार और सांस लेने में गंभीर तकलीफ के लक्षण दिखने लगे. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) की रिपोर्ट के अनुसार, इस क्रूज पर हंटावायरस के 8 मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें से 6 की लैब में पुष्टि हो चुकी है. सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि संक्रमितों में से 3 लोगों की दर्दनाक मौत हो चुकी है, जिससे इसका मृत्यु दर (फैटालिटी रेट) लगभग 38 प्रतिशत तक पहुंच गया है. इस प्रकोप के बाद कई देशों ने अपने नागरिकों को वहां से सेना के विशेष विमानों के जरिए निकाला है.
राहत की बात यह है कि वर्तमान में भारत में हंटावायरस का कोई नया आउटब्रेक या सामूहिक प्रकोप नहीं देखा गया है. हालांकि, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने पुष्टि की है कि प्रभावित क्रूज शिप ‘एमवी होंडियस’ पर दो भारतीय नागरिक भी मौजूद थे. गनीमत यह रही कि दोनों भारतीयों में संक्रमण के कोई लक्षण नहीं मिले हैं और उन्हें नीदरलैंड में सुरक्षित रूप से क्वारंटाइन (निगरानी) में रखा गया है.
प्रसिद्ध स्वास्थ्य विशेषज्ञ और एशियन सोसाइटी फॉर इमरजेंसी मेडिसिन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. तमोलीश कोले के अनुसार, भारत में तुरंत घबराने की कोई जरूरत नहीं है. हालांकि, भारत में पहले भी छिटपुट (स्पोराडिक) रूप से हंटावायरस के कुछ मामले सामने आते रहे हैं, लेकिन यहां इसका बड़े पैमाने पर फैलना बेहद दुर्लभ है. भारत का स्वास्थ्य मंत्रालय, नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (NCDC) और इंटीग्रेटेड डिजीज सरवेलांस प्रोग्राम (IDSP) के साथ मिलकर इस पूरी स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए है.
आम लोगों के मन में सबसे बड़ा डर यही है कि क्या यह कोरोना की तरह हवा के जरिए फैलेगा? हैदराबाद के यशोदा हॉस्पिटल के संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. हरी किशन बूरुगु ने इस पर स्थिति साफ की है. उनका कहना है कि हंटावायरस और कोविड-19 में बहुत बड़ा अंतर है. कोविड-19 एक इंसान के खांसने या छींकने से हवा के जरिए बहुत तेजी से दूसरे इंसान में फैलता है, जिससे वह महामारी बन गया. इसके विपरीत, हंटावायरस मुख्य रूप से ‘जूनोटिक’ (Zoonotic) संक्रमण है, जो जानवरों से इंसानों में आता है.
हंटावायरस मुख्य रूप से चूहों और गिलहरियों जैसे कतरने वाले जानवरों (रोडेंट्स) के जरिए फैलता है. जब कोई व्यक्ति इन संक्रमित चूहों के मलमूत्र, थूक या लार के सीधे संपर्क में आता है, तभी वह बीमार पड़ता है. हालांकि, इस बार क्रूज शिप पर पाया गया वायरस ‘एंडीज स्ट्रेन’ (Andes Strain) है, जिसमें बहुत ही सीमित स्तर पर इंसानों से इंसानों में फैलने की क्षमता होती है, लेकिन इसके लिए भी बहुत लंबे समय तक और बेहद नजदीकी संपर्क की जरूरत होती है. इसलिए, इसका कोविड-19 की तरह तेजी से गली-मोहल्लों में फैलना नामुमकिन जैसा है.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि वैश्विक यात्राओं में बढ़ोतरी और पर्यावरण के साथ हो रही छेड़छाड़ के कारण इस तरह के वायरस इंसानों के करीब आ रहे हैं. पूर्व अध्यक्ष (IAPSM) डॉ. सुनीला गर्ग का कहना है कि कोविड-19, निपाह और हंटावायरस जैसी बीमारियां सीधे तौर पर प्रकृति के विनाश से जुड़ी हैं. चूहों की आबादी बढ़ने और इंसानों के जंगली इलाकों में दखल देने से यह खतरा बढ़ा है.
हंटावायरस इंसानों के शरीर में जाने के बाद दो तरह से हमला करता है. पहला है हंटावायरस पल्मोनरी सिंड्रोम (HPS), जो सीधे फेफड़ों पर असर करता है और सांस रुकने की नौबत आ जाती है. दूसरा है हेमोरेजिक फीवर विद रीनल सिंड्रोम (HFRS), जो किडनी को पूरी तरह फेल कर देता है.
डॉक्टरों का साफ कहना है कि हंटावायरस को लेकर पैनिक यानी डर का माहौल बनाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि आम जनता के लिए इसका खतरा बहुत कम है. इससे बचने के लिए अपने घरों और आसपास के इलाकों में साफ-सफाई रखें ताकि चूहे न पनप सकें. अगर घर में चूहे हैं, तो उनके मलमूत्र को साफ करते समय मास्क और ग्लव्स का इस्तेमाल करें. चूंकि इस बीमारी का कोई पक्का इलाज या सटीक एंटीवायरल दवा नहीं है, इसलिए अस्पतालों में लक्षणों के आधार पर ही मरीज को सपोर्टिव ट्रीटमेंट (जैसे ऑक्सीजन या वेंटिलेटर सपोर्ट) दिया जाता है. सतर्कता और स्वच्छता ही इस वायरस से बचने का सबसे बड़ा हथियार है.
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