रात 2 से 4 बजे के बीच शरीर स्लीप साइकिल के अहम चरण में होता है. इस दौरान ‘कॉर्टिसोल’ जैसे स्ट्रेस हार्मोन का स्तर बढ़ने लगता है, जो हमें सुबह के लिए तैयार करता है. अगर व्यक्ति पहले से तनाव, थकान या चिंता में है तो यही हल्का हार्मोनल बदलाव नींद तोड़ सकता है. ब्लड शुगर गिरने पर ‘एड्रेनालाईन’ रिलीज होता है, जिससे दिल की धड़कन तेज हो सकती है और अचानक जाग आ सकती है. वहीं, रात की शांति में दिमाग का एमिगडाला ज्यादा सक्रिय हो जाता है, जिससे छोटी चिंताएं भी बड़ी लगने लगती हैं. महिलाओं में पेरिमेनोपॉज और मेनोपॉज के दौरान हार्मोनल बदलाव भी सुबह जल्दी नींद खुलने का कारण बन सकते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि रात में थोड़ी देर जागना सामान्य है- घड़ी देखने और फोन इस्तेमाल करने से बचें, गहरी सांस लें और तनाव कम रखें.
हमारा शरीर 24 घंटे की एक जैविक घड़ी (बॉडी क्लॉक) पर काम करता है. रात के करीब 2 से 4 बजे के बीच यह घड़ी अगले दिन के लिए शरीर को तैयार करने लगती है. इसी दौरान स्ट्रेस हार्मोन कॉर्टिसोल धीरे-धीरे बढ़ने लगता है. सामान्य स्थिति में यह प्रक्रिया हमें सुबह उठने में मदद करती है, लेकिन अगर आप पहले से तनाव या थकान में हैं, तो यही हल्का बदलाव नींद तोड़ सकता है. रात के अंतिम हिस्से में ब्लड शुगर थोड़ा गिर सकता है.
यदि आपने देर से खाना खाया है, शराब ली है या दिनभर तनाव में रहे हैं, तो यह गिरावट ज्यादा हो सकती है. शरीर इसकी भरपाई के लिए एड्रेनालाईन रिलीज करता है—जो हमें सतर्क करने वाला हार्मोन है. नतीजा? अचानक आंख खुलना, दिल की धड़कन तेज होना और बेचैनी महसूस होना.
रात के 3 बजे दुनिया शांत होती है न फोन, न शोर, न काम की भागदौड़. इस खामोशी में दिमाग के भावनात्मक हिस्से, खासकर डर और चिंता से जुड़े क्षेत्र, ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं. नींद अधूरी होने पर यह प्रभाव और बढ़ जाता है. इसलिए जो बात दिन में मामूली लगती है, वही रात में बहुत बड़ी समस्या जैसी महसूस हो सकती है. पेरिमेनोपॉज और मेनोपॉज के दौरान हार्मोन स्तर में उतार-चढ़ाव होता है.
एस्ट्रोजन में कमी से शरीर का तापमान और नींद का पैटर्न प्रभावित हो सकता है. यही कारण है कि कई महिलाएं सुबह जल्दी जागने या बार-बार नींद टूटने की शिकायत करती हैं.
हर व्यक्ति रात में कई बार हल्की नींद के चरण से गुजरता है. अक्सर हमें इसका एहसास भी नहीं होता. समस्या तब बनती है जब हम जागने को लेकर परेशान हो जाते हैं और दोबारा सोने की कोशिश में तनाव बढ़ा लेते हैं. सोने से पहले स्क्रीन टाइम कम करें, शाम को कैफीन और शराब से बचें, नियमित समय पर सोने-जागने की आदत बनाएं और नींद खुले तो घड़ी देखने से बचें और धीमी, गहरी सांस लें. याद रखिए, रात के 3 बजे जाग जाना कोई रहस्यमयी संकेत नहीं है.
यह अक्सर शरीर की स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया का हिस्सा होता है. सही समझ और थोड़ी सावधानी से आप अपनी नींद को फिर से संतुलित कर सकते हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
Edited By: Shubhra Rai (Intern)
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