देश-दुनिया में इस बार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व 16-17 अगस्त को मनाया जाएगा. करोड़ों श्रद्धालु श्रीकृष्ण की लीलास्थली ब्रजभूमि पहुंचेंगे और कृष्ण मंदिरों के दर्शन करेंगे. इस अवसर पर यहां BharatExpress.Com पर आपके लिए लाए हैं विशेष कहानियां, जिनमें आपको मिलेगी भगवान कृष्ण से जुड़ी नॉलेज..
इस आलेख में जानिए — क्या श्रीकृष्ण ही महाकाल थे? उन्होंने अर्जुन से क्यों कहा कि सबकुछ छोड़कर युद्ध अवश्य करो?
भारत में जहां हरियाणा का कुरुक्षेत्र जिला है – वहां लगभग 5 हजार साल पहले संसार का सबसे विनाशकारी युद्ध लड़ा गया था. उस युद्ध में कई महारथियों समेत लाखों योद्धा मारे गए थे. विश्व की बड़ी-बड़ी सेनाएं और उनके अधिपतियों ने लड़ाई लड़ी थी. जिसे हमारे इतिहास में ‘महाभारत’ का युद्ध कहा गया.
‘महाभारत’ का युद्ध शुरू होने से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में महारथी अर्जुन को भगवद्गीता का ज्ञान दिया था. उस दौरान श्री कृष्ण अर्जुन को कहते हैं- मैं ही बढ़ा हुआ महाकाल हूं…हे अर्जुन तुम जिन योद्धाओं से युद्ध नहीं करना चाहते, उन्हें मारना नहीं चाहते, वे तो अपने कुकर्मों और बुराइयों में लिप्त होने के कारण पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं. तुम्हारे द्वारा युद्ध न करने पर भी वे सब मेरे द्वारा मारे जाएंगे. इसलिए, तुम केवल निमित्त मात्र बन जाओ!
भगवद्गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को स्पष्ट रूप से बताया कि वे इस धरती पर केवल एक सारथी नहीं, बल्कि “काल” रूप में प्रकट हुए हैं — महाकाल, जो समय और मृत्यु का स्वरूप है. उन्होंने यह भी कहा कि दोनों पक्षों (कौरव और पांडव) के करोड़ों योद्धाओं का अंत पहले ही हो चुका है, और वे केवल निमित्त (माध्यम) बनाकर अर्जुन से कर्म करवाना चाहते हैं.
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श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग), श्लोक 32
“कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः.
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥”
🕉️ शाब्दिक अर्थ:
मैं काल (महाकाल) हूँ, संसार को नष्ट करने वाला.
अब मैं इन लोकों को संहार करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ.
तेरे बिना भी (यदि तू युद्ध न करे), ये सब योद्धा जो शत्रु पक्ष में हैं, नष्ट हो ही जाएँगे.
श्रीकृष्ण का उद्देश्य: धर्म की पुनर्स्थापना
📚 गीता – अध्याय 4, श्लोक 7-8
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत.
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽअत्मानं सृजाम्यहम्॥”
“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्.
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥”
जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है,
तब-तब मैं (ईश्वर) अवतरित होता हूँ –सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश, और धर्म की पुनः स्थापना हेतु.
…
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हां, परंतु स्वयं नहीं — “नियति” के रूप में.
श्रीकृष्ण नियंता (controller) हैं, परंतु युद्ध उन्होंने अर्जुन व अन्य महारथियों से करवाया. उन्होंने कहा कि ये सब योद्धा पहले से ही नियति द्वारा मारे जा चुके हैं, तू केवल निमित्त (instrument) बन.
📚 गीता – अध्याय 11, श्लोक 33
“तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्.
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥”
इसलिए हे अर्जुन! उठ, विजय प्राप्त कर, यश और समृद्धि अर्जित कर.
इन सब शत्रुओं का वध मैंने पहले ही कर दिया है.
तू केवल निमित्तमात्र बन – कर्म करने वाला साधन.
श्रीकृष्ण का स्वरूप स्वयं काल (महाकाल) रूप हैं – समय, मृत्यु और नियति का प्रतिनिधि.
युद्ध का उद्देश्य केवल वध नहीं, बल्कि धर्म की पुनर्स्थापना और पृथ्वी का भार हरण.
दोनों पक्षों की मृत्यु पहले से ही नियत (destined) थी – श्रीकृष्ण ने केवल माध्यम चुने.
अर्जुन का कर्तव्य निमित्त मात्र बनना और धर्म के पक्ष में युद्ध करना.
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