Kanwar Yatra 2026: सावन का महीना शुरू होते ही हर तरफ बोल बम और हर हर महादेव के जयकारे गूंजने लगते हैं. सड़कों पर भगवा रंग के कपड़े पहने और कंधे पर कांवड़ लिए शिवभक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है. पैरों में छाले हों या कड़कड़ाती धूप, भोले की भक्ति में डूबे इन कांवड़ियों के कदम कभी नहीं रुकते. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आस्था के इन सबसे लंबे दिनों की शुरूआत आखिर कब और कैसे हुई थी? कौन था दुनिया क पहला कांवड़िया कौन था जिसने सबसे पहले अपने कंधे पर भोलेनाथ की आस्था का भार उठाया था.
हमारे हिंदू धर्म ग्रंथों और लोक कथाओं में इस बात को लेकर बेहद दिलचस्प और अलग-अलग मान्यताएं हैं. कोई भगवान परशुराम को पहला कांवड़िया मानता है, तो किसी कथा में रावण या खुद भगवान श्रीराम का नाम आता है. तो आइए जानते हैं कांवड़ यात्रा के पीछे छिपी चार सबसे प्रसिद्ध कहानियां कौन-कौन सी हैं.
सबसे ज्याद प्रचलित और ऐतिहासिक रूप से मानी जाने वाली कथा भगवान परशुराम से जुड़ी बताई जाती है. कहा जाता है कि जब भगवान परशुराम ने अपने पिता जमदग्नि के कहने पर अपनी मां का वध किया था, तो उन पर अपनी ही माता को मारने का घोर पाप लगा था.इस पाप से मुक्त होने के लिए उन्होंने भोलेनाथ की शरं ली. वे उत्तर प्रदेश के गढ़मुक्तेश्वर गए और वहां से अपनी कांवड़ में पवित्र जल भरकर पैदल यात्रआ पर निकल पड़े. उन्होंने उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में स्थित पुरा महादेव मंदिर पहुंचकर शिवलिंग का जलाभिषेक किया और तभी से इंसानी रूप में इस यात्रा की शुरुआत मानी जाती है.
एक दूसरी बड़ी मान्यता लंकापति रावण को लेकर है. समुद्र मंथन के दौरान जब भगवान शिव ने दुनिया को बचाने के लिए हलाहल विष पी लिया तो उनका कंठ बुरी तरह जलने लगा. वे विष की गर्मी और नकारात्मक शक्तियों से घिर गए थे. अपने आराध्य को इस कष्ट में देख शिवभक्त रावण से रहा नहीं गया. उन्होंने भोलेनाथ के इस ताप को कम करने के लिए नियम-कायदों के साथ कांवड़ उठाई और पवित्र गंगाजल लाकर पुरा महादेव या कुछ अन्य कथाओं के अनुसार वैद्यनाथ धाम में शिव जी का अभिषेक किया जिससे महादेव को शांति मिली.
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आनंद रामायण में एक और बेहद सुंदर कथा मिलती है जिसके अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को दुनिया का सबसे पहला कांवड़िया कहा गया है. त्रेतायुग में प्रभु श्रीराम ने बिहार के सुल्तानगंज से उत्तरवाहिनी गंगा का जल अपनी कांवड़ में भरा था. इसके बाद वे करीब 105 किलोमीटर की कठिन पैदल यात्रा करके झारखंड के देवघर पहुंचे जहां उन्होंने बाबा वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग पर वह पवित्र जल अर्पित किया था. आज भी लाखों श्रद्धालु इसी मार्ग पर चलते हैं.
इनके अलावा दो और पौराणिक मान्यताएं हैं जो हमारे समाज में लंबे समय से रची-बसी हुई हैं. पहली श्रवण कुमार की है जिन्होंने अपने अंधे माता-पिता को कांवड़ में बिठाकर हरिद्वार में गंगा स्नान कराया था और लौटते समय उनके लिए गंगाजल लाए थे.
वहीं दूसरी कहानी सीधे देवलोक से जुड़ी है. शिवपुराण के अनुसार जब विषपान के बाद शिव जी का कंठ नीला पड़ गया था तब सभी देवताओं ने मिलकर पवित्र नदियों का जल लाकर शिव जी पर चढ़ाया था. देवताओं की इसी सेवा को आज कांवड़ यात्रा की मूल प्रेरणा माना जाता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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