केरल की राजनीति में 2026 का विधानसभा चुनाव एक बड़ा मोड़ लेकर आया है. दस साल तक विपक्ष में रहने के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ (United Democratic Front) ने जबरदस्त वापसी करते हुए 102 सीटों पर जीत दर्ज की है. इस जीत को न सिर्फ एक राजनीतिक बदलाव माना जा रहा है, बल्कि इसे कांग्रेस के पुनरुत्थान के तौर पर भी देखा जा रहा है.
इस पूरे चुनावी अभियान के सबसे अहम चेहरे रहे वडासेरी दामोदरन सतीशन (वी.डी. सतीशन), जिन्होंने अपनी जमीनी पकड़ और संगठनात्मक रणनीति से पार्टी को नई दिशा दी.
सतीशन की कहानी किसी पारंपरिक नेता जैसी नहीं रही. 31 मई 1964 को कोच्चि के नेट्टूर में जन्मे सतीशन ने अपनी राजनीतिक यात्रा छात्र जीवन से शुरू की. सैक्रेड हार्ट कॉलेज और बाद में महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी के दौरान वे केएसयू और एनएसयूआई से जुड़े रहे. छात्र राजनीति में सक्रिय रहते हुए उन्होंने यूनिवर्सिटी यूनियन के चेयरमैन के तौर पर भी काम किया.
शिक्षा के मोर्चे पर भी उनका सफर मजबूत रहा. उन्होंने बीए, एमएसडब्ल्यू, एलएलबी और एलएलएम जैसी डिग्रियां हासिल कीं. वकालत की प्रैक्टिस के साथ-साथ वे राजनीति में भी लगातार सक्रिय रहे.
1996 में पहली चुनावी हार के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और 2001 से लगातार उत्तर परवूर सीट से विधायक चुने जाते रहे.
2021 से 2026 तक वे केरल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे. इस दौरान उन्होंने पिनराई विजयन सरकार की नीतियों, भ्रष्टाचार और कई जन मुद्दों पर लगातार मुखर रुख अपनाया. सदन के अंदर और बाहर उनकी आक्रामक लेकिन प्रभावी शैली ने उन्हें कांग्रेस का सबसे मजबूत चेहरा बना दिया.
सतीशन ने यूडीएफ को सिर्फ राजनीतिक गठबंधन नहीं रहने दिया, बल्कि इसे एक व्यापक सामाजिक मंच के रूप में ढालने की कोशिश की. यही वजह रही कि 2024 के लोकसभा चुनाव से लेकर 2025 के स्थानीय निकाय चुनाव तक पार्टी को नई ऊर्जा मिलती दिखी.
चुनाव से पहले उनका एक बयान काफी चर्चा में रहा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर यूडीएफ 100 सीटों से कम पर रुकती है तो वे राजनीति छोड़ देंगे. इस बयान ने कार्यकर्ताओं में जोश भर दिया और नतीजा भी उम्मीद से बेहतर रहा. यूडीएफ ने 102 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की.
इस जीत के बाद सतीशन मुख्यमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार के रूप में उभरे हैं.
अब उनके सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी सरकार चलाने की होगी. साथ ही युवा, किसान और महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर भी उनसे बड़ी उम्मीदें हैं.
चुनाव के बाद राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा रही कि गठबंधन की राजनीति में सहयोगी दलों, खासकर इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की भूमिका कितनी अहम रही. कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे लेकर अलग-अलग राय रखी है. वरिष्ठ पत्रकार रंगनाथ सिंह जैसे कुछ विश्लेषकों ने सोशल मीडिया पर यह सवाल उठाया कि क्या सीएम चयन में सहयोगी दलों की राय का प्रभाव रहा. हालांकि ये पूरी तरह राजनीतिक टिप्पणी और विश्लेषण के दायरे में आता है, और इस पर सभी की अलग-अलग राय हो सकती है.
साथ ही यह भी माना जा रहा है कि केरल की राजनीति इस बार और अधिक बहुकोणीय हो गई है, जहां न सिर्फ यूडीएफ और एलडीएफ बल्कि अन्य दलों की भूमिका भी धीरे-धीरे बढ़ती दिख रही है.
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भारत एक्सप्रेस
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