Mirpur Tragedy: 26 अक्टूबर 1947 का दिन जम्मू-कश्मीर के इतिहास में बेहद अहम माना जाता है. इसी दिन महाराजा हरि सिंह ने जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे. इसके साथ ही रियासत कानूनी रूप से भारत का हिस्सा बन गई. लेकिन पाकिस्तान ने इस फैसले को स्वीकार नहीं किया और जल्द ही कबायली लड़ाकों के साथ पाकिस्तानी सेना की मदद से जम्मू-कश्मीर पर हमला शुरू हो गया.
इस संघर्ष का सबसे दर्दनाक अध्याय मीरपुर में सामने आया. आज मीरपुर पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर के हिस्से में आता है. 1947 से पहले यह इलाका एक समृद्ध व्यापारिक केंद्र था, जहां अलग-अलग समुदायों के लोग रहते थे. उस समय यहां हिंदू और सिख आबादी भी अच्छी संख्या में मौजूद थी. विभाजन के बाद पश्चिमी पंजाब से आए शरणार्थियों के कारण इस आबादी की संख्या और बढ़ गई थी.
जब हमलावर मीरपुर की ओर बढ़े तो स्थानीय हिंदू-सिख समुदाय ने आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया. राज्य सेना की छोटी टुकड़ी और स्थानीय युवाओं ने मिलकर शहर की रक्षा करने की कोशिश की. हालांकि, हथियारों और सैन्य ताकत में भारी अंतर के कारण हालात तेजी से बदलते गए.
24 और 25 नवंबर 1947 को मीरपुर की स्थिति बेहद भयावह हो गई. भारी गोलाबारी के बाद पाकिस्तानी सेना और कबायली लड़ाके शहर में दाखिल हो गए. इसके बाद आगजनी, लूटपाट और बड़े पैमाने पर हिंसा की घटनाएं हुईं.
विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों, प्रत्यक्षदर्शियों के संस्मरणों और इतिहासकारों के अनुमानों के अनुसार, इस दौरान हजारों हिंदू और सिख मारे गए. कई अनुमानों में मृतकों की संख्या 18 हजार से 20 हजार या उससे अधिक बताई गई है. बड़ी संख्या में महिलाओं और बच्चों को बंदी बनाया गया. कई महिलाओं के अपहरण और उनके साथ अत्याचार की घटनाओं का भी उल्लेख मिलता है. कुछ रिपोर्टों में अपहृत महिलाओं की संख्या करीब 5 हजार तक बताई गई है.
मीरपुर से बचकर निकलने वाले कई लोग अलीबेग के गुरुद्वारे पहुंचे, लेकिन वहां भी उनकी मुश्किलें खत्म नहीं हुईं. उस स्थान को बंदीगृह की तरह इस्तेमाल किया गया और बड़ी संख्या में लोग मारे गए. बाद में अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस की मदद से मार्च 1948 में करीब 1,600 लोगों को बचाया जा सका.
समय के साथ पुराना मीरपुर शहर मंगला बांध की झील में समा गया, लेकिन 1947 की घटनाओं की याद आज भी लोगों के बीच मौजूद है. जम्मू-कश्मीर में हर साल 25 नवंबर को “मीरपुर दिवस” के रूप में इस त्रासदी को याद किया जाता है. जम्मू में इसके लिए एक शहीदी स्मारक भी बनाया गया है.
मीरपुर की घटना को समझने के लिए यह भी जरूरी है कि 1947 का विभाजन पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए बेहद हिंसक दौर था. उस समय जम्मू क्षेत्र में मुसलमानों के खिलाफ भी बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी, जिसके आंकड़े अलग-अलग स्रोतों में अलग-अलग बताए जाते हैं. इतिहासकार मानते हैं कि विभाजन की हिंसा कई इलाकों में अलग-अलग रूपों में सामने आई.
करीब आठ दशक बाद आज मीरपुर और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में एक अलग तरह का संघर्ष दिखाई दे रहा है. पिछले कुछ वर्षों से वहां बिजली के बढ़ते बिल, महंगाई, गेहूं की कीमतों और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं.
2026 में ये आंदोलन और तेज हो गए. जॉइंट अवामी एक्शन कमिटी (JAAC) जैसे संगठनों ने स्थानीय अधिकारों और आर्थिक राहत की मांग उठाई. विरोध प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों के साथ टकराव की खबरें भी सामने आईं. प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि कई जगहों पर निहत्थे लोगों पर बल प्रयोग किया गया, जबकि पाकिस्तानी अधिकारियों ने इसे कानून-व्यवस्था बनाए रखने की कार्रवाई बताया.
ब्रिटेन समेत कई देशों में रहने वाले मीरपुरी प्रवासी समुदाय ने भी इन घटनाओं पर चिंता जताई है.
मीरपुर की कहानी केवल 1947 की एक दुखद घटना तक सीमित नहीं है. यह उस दौर की याद दिलाती है जब राजनीतिक फैसलों और सैन्य संघर्षों की कीमत आम लोगों को चुकानी पड़ी. हजारों निर्दोष लोगों की मौत, महिलाओं के साथ हुई हिंसा और परिवारों के उजड़ने की पीड़ा आज भी इतिहास का हिस्सा है.
साथ ही, वर्तमान घटनाएं यह सवाल भी उठाती हैं कि किसी भी क्षेत्र में लंबे समय तक शांति तभी संभव है जब लोगों की आवाज, अधिकार और सम्मान को महत्व दिया जाए.
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-भारत एक्सप्रेस
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