दुनिया की राजनीति इन दिनों किसी एक खेमे में बंटी हुई नहीं है. अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा, रूस और पश्चिम के बीच तनाव और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते समीकरणों ने देशों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. ऐसे समय में भारत की विदेश नीति को समझने का सबसे सही तरीका शायद यही है कि नई दिल्ली किसी एक शक्ति के साथ पूरी तरह खड़े होने के बजाय कई ताकतों के साथ अपने हित के हिसाब से रिश्ते आगे बढ़ा रही है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौर में भारत की विदेश नीति में इस सोच को और सक्रिय रूप मिला है. एक तरफ भारत अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वाड जैसे मंच पर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग बढ़ा रहा है, तो दूसरी तरफ रूस, चीन और दूसरे उभरते देशों के साथ BRICS जैसे मंचों पर भी लगातार जुड़ा हुआ है.
पहली नजर में यह विरोधाभास लग सकता है. आखिर भारत एक ही समय में अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी भी मजबूत कर रहा है और रूस के साथ पुराने रिश्ते भी बनाए हुए है. चीन के साथ सीमा विवाद है, लेकिन दोनों देश BRICS में साथ बैठते हैं. यही भारतीय विदेश नीति की खासियत है. यह किसी एक खेमे में जाने के बजाय अपने लिए ज्यादा से ज्यादा रणनीतिक गुंजाइश बनाए रखने की कोशिश करती है.
इसका जवाब है कि दोनों मंच भारत के लिए अलग-अलग काम करते हैं. क्वाड के जरिए भारत अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा, समुद्री सहयोग, तकनीक, साइबर क्षेत्र और सप्लाई चेन जैसे मुद्दों पर काम करता है. चीन की बढ़ती समुद्री और क्षेत्रीय गतिविधियों को देखते हुए यह सहयोग भारत के रणनीतिक हितों से जुड़ा हुआ है.
दूसरी ओर, BRICS भारत को विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आवाज को मजबूत करने का मंच देता है. यहां भारत बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, वैश्विक संस्थाओं में सुधार, विकास के लिए वित्तीय संसाधन और ग्लोबल साउथ की भूमिका जैसे मुद्दे उठा सकता है.
इसलिए भारत का दोनों मंचों में रहना महज किसी तरह बीच का रास्ता निकालने की कोशिश नहीं है. इसके पीछे एक सोची-समझी रणनीति है—रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना और जरूरत के मुताबिक सक्रिय साझेदारियां करना.
भारत की विदेश नीति में गैर-पक्षपात यानी Non-Alignment कोई नई अवधारणा नहीं है. आजादी के बाद भारत ने शीत युद्ध के दौरान अमेरिका या सोवियत संघ के नेतृत्व वाले किसी सैन्य गुट में शामिल होने से दूरी बनाए रखी थी.
लेकिन मोदी सरकार के दौर में यही सोच ज्यादा सक्रिय और व्यावहारिक रूप में दिखाई देती है. आज भारत अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग देशों के साथ सहयोग कर सकता है.
उदाहरण के लिए, समुद्री सुरक्षा और हिंद-प्रशांत में भारत अमेरिका के साथ काम करता है. रक्षा और ऊर्जा के क्षेत्र में रूस के साथ अपने पुराने रिश्तों को महत्व देता है. चीन के साथ सीमा पर गंभीर मतभेद हैं, लेकिन जरूरी बहुपक्षीय मंचों पर संवाद भी जारी रहता है.
यानी भारत की कोशिश यह नहीं है कि हर मुद्दे पर सभी देशों के साथ एक जैसा रुख अपनाया जाए. बल्कि वह मुद्दे और राष्ट्रीय हित के आधार पर अपनी साझेदारी तय करता है.
सबसे बड़ा फायदा रणनीतिक आजादी का है. अगर भारत किसी एक बड़ी शक्ति पर पूरी तरह निर्भर हो जाए, तो विदेश नीति में उसके विकल्प सीमित हो सकते हैं. अलग-अलग देशों के साथ संबंध बनाए रखने से भारत के पास संकट के समय ज्यादा रास्ते खुले रहते हैं.
दूसरा फायदा सुरक्षा के मोर्चे पर मिलता है. क्वाड भारत को हिंद-प्रशांत में समुद्री सुरक्षा, नई तकनीक, साइबर सहयोग और भरोसेमंद सप्लाई चेन जैसे क्षेत्रों में साझेदारियां मजबूत करने का अवसर देता है.
तीसरा पहलू आर्थिक और कूटनीतिक प्रभाव का है. BRICS जैसे मंच भारत को उभरती अर्थव्यवस्थाओं और ग्लोबल साउथ के मुद्दों पर अपनी बात रखने का मौका देते हैं.
इसके अलावा, जब भारत एक साथ कई शक्ति केंद्रों के संपर्क में रहता है, तो अंतरराष्ट्रीय बातचीत में उसकी सौदेबाजी की क्षमता भी बढ़ सकती है. मल्टी-अलाइनमेंट सुनने में जितना आसान लगता है, व्यवहार में उतना ही मुश्किल है. वजह साफ है—भारत जिन देशों के साथ संबंध रखता है, उनके बीच खुद कई बड़े मतभेद हैं.
अमेरिका चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंतित है और भारत से हिंद-प्रशांत में ज्यादा सक्रिय भूमिका की उम्मीद करता है. वहीं रूस भारत के साथ अपने लंबे समय से चले आ रहे रक्षा और रणनीतिक संबंधों को महत्वपूर्ण मानता है. चीन का मामला तो और भी जटिल है. भारत और चीन के बीच सीमा विवाद है और दोनों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी है. फिर भी दोनों देश BRICS और शंघाई सहयोग संगठन जैसे बहुपक्षीय मंचों पर साथ मौजूद हैं.
ऐसे में भारत के सामने लगातार यही चुनौती रहती है कि अलग-अलग साझेदारियों को इस तरह संभाला जाए कि किसी एक रिश्ते को मजबूत करने की कीमत दूसरे रिश्ते में तनाव बढ़ाकर न चुकानी पड़े.
भारत की चीन नीति को केवल टकराव के नजरिए से देखना सही नहीं होगा. सीमा पर तनाव और चीन की क्षेत्रीय गतिविधियों को लेकर भारत की सुरक्षा चिंताएं अपनी जगह हैं. इसी कारण हिंद-प्रशांत में भारत दूसरे साझेदारों के साथ सहयोग बढ़ाता है.
लेकिन इसके साथ ही चीन को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी संभव नहीं है. दोनों देशों के बीच लंबी साझा सीमा है, व्यापारिक संबंध हैं और कई बहुपक्षीय संगठनों में वे एक साथ काम करते हैं.
इसलिए भारत की नीति में एक तरफ सुरक्षा और प्रतिरोध की तैयारी है, तो दूसरी तरफ बातचीत के लिए दरवाजा खुला रखने की कोशिश भी है. यही संतुलन भारत की मौजूदा चीन नीति को जटिल बनाता है.
भारत और रूस के रिश्ते कई दशकों पुराने हैं और इनका आधार सिर्फ रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं है. ऊर्जा, परमाणु क्षेत्र, अंतरिक्ष, व्यापार और राजनीतिक संवाद भी इस संबंध का हिस्सा हैं.
जुलाई 2024 में प्रधानमंत्री मोदी की रूस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने रक्षा, ऊर्जा, परमाणु सहयोग, अंतरिक्ष, व्यापार और राजनीतिक संपर्क सहित कई क्षेत्रों में सहयोग जारी रखने पर जोर दिया था.
भारत के लिए रूस का महत्व इसलिए भी है क्योंकि उसका रक्षा तंत्र लंबे समय से रूसी मूल के उपकरणों और तकनीक से जुड़ा रहा है. इसके अलावा, ऊर्जा सुरक्षा और महाद्वीपीय भू-राजनीति के लिहाज से भी रूस भारत के लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार बना हुआ है.
यही कारण है कि पश्चिमी देशों के साथ भारत की नजदीकी बढ़ने के बावजूद नई दिल्ली ने रूस के साथ अपने रिश्तों को पूरी तरह छोड़ने का रास्ता नहीं चुना.
भारत की कोशिश सिर्फ यह तय करने की नहीं है कि वह अमेरिका के करीब जाए या रूस के, अथवा चीन से दूरी बनाए या उसके साथ संवाद करे.
बड़ी तस्वीर यह है कि भारत खुद को वैश्विक व्यवस्था में एक प्रभावशाली शक्ति केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहता है.
क्वाड भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग देता है. BRICS भारत को ग्लोबल साउथ और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की बहस में जगह देता है. रूस के साथ रिश्ते भारत को रक्षा और ऊर्जा के मोर्चे पर विकल्प देते हैं, जबकि अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों के साथ साझेदारी तकनीक, निवेश, सुरक्षा और वैश्विक संस्थानों में सहयोग के नए अवसर खोलती है.
यानी भारत की विदेश नीति का मूल संदेश यही है कि देश अपने राष्ट्रीय हित के आधार पर साझेदारियां तय करेगा, किसी एक शक्ति की छाया में नहीं चलेगा.
अगर इसे परीक्षा के नजरिए से याद रखना हो, तो पूरी रणनीति को पांच शब्दों में समझा जा सकता है. रणनीतिक स्वायत्तता और मल्टी-अलाइनमेंट.
भारत के लिए असली चुनौती तब सामने आएगी जब अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा और तेज होगी या रूस और पश्चिम के बीच तनाव और बढ़ेगा. ऐसे हालात में केवल संतुलन की बात करना पर्याप्त नहीं होगा; भारत को हर संकट में अपने हितों के मुताबिक स्पष्ट और व्यावहारिक फैसले लेने होंगे.
यही वजह है कि मोदी सरकार की विदेश नीति को केवल ‘दो नावों पर पैर रखने’ वाली नीति कहना सही तस्वीर नहीं देता. भारत दरअसल ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में अपनी जगह को हिंद-प्रशांत में रणनीतिक गहराई देता है, जबकि BRICS उसे रूस, चीन और ग्लोबल साउथ के साथ संवाद बनाए रखने का मंच देता है बनाने की कोशिश कर रहा है, जहां पुराने गठजोड़ बदल रहे हैं और नए शक्ति केंद्र उभर रहे हैं.
क्वाड भारत को हिंद-प्रशांत में रणनीतिक गहराई देता है, जबकि BRICS उसे रूस, चीन और ग्लोबल साउथ के साथ संवाद बनाए रखने का मंच देता है. इन दोनों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है, लेकिन यही लचीलापन भारत को अपनी विदेश नीति में ज्यादा स्वतंत्रता देता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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