भारतीय इतिहास के पन्नों में जब भी मैसूर और दक्षिण भारत की बात आती है, तो जेहन में कई जाने-पहचाने किस्से तैरने लगते हैं. लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि उन कहानियों के पीछे की सच्चाई क्या थी? इतिहासकार और स्वतंत्र शोधकर्ता पुष्पा कुरूप की नई किताब ‘मालाबार, मैसूर एंड ए टेल ऑफ टू सुल्तांस’ (Malabar, Mysore and A Tale of Two Sultans) इसी उलझन को सुलझाने की एक बेहद शानदार कोशिश है. लगभग 500 से ज्यादा पन्नों की यह किताब सिर्फ राजाओं के उठने-बैठने की कहानी नहीं कहती, बल्कि उन आम लोगों और परिवारों का दर्द सामने लाती है, जिन्होंने मैसूर सल्तनत के दौर में भारी कीमत चुकाई थी.
अगर हम 18वीं सदी के इतिहास पर नजर डालें, तो मैसूर की गद्दी पर वोडेयार राजवंश का शासन हुआ करता था. लेकिन सदी के बीच में हैदर अली ने ताकत के बल पर गद्दी अपने हाथ में ले ली. उन्होंने करीब दो दशकों तक अपनी सीमाओं को फैलाया और अंग्रेजों से लोहा लिया. उनके बाद उनके बेटे टीपू सुल्तान ने लगभग 16 साल तक राज किया.
कहानी का अंत 1799 में चौथे आंग्लो-मैसूर युद्ध के दौरान हुआ, जब श्रीरंगपट्टनम का पतन हो गया और टीपू सुल्तान की मौत हो गई. इसके बाद अंग्रेजों ने सत्ता वापस वोडेयार परिवार को सौंप दी. इस तरह मैसूर में इन दो सुल्तानों का दौर जितनी तेजी से शुरू हुआ था, उतनी ही नाटकीयता के साथ खत्म भी हो गया.
आज के समय में आम तौर पर टीपू सुल्तान को एक ऐसे नायक के रूप में देखा जाता है, जो अंग्रेजों के खिलाफ अकेले खड़े रहे और शहीद हो गए. लेकिन इस किताब में लेखिका ने इस सोच पर बड़े सवाल खड़े किए हैं.
लेखिका ने इस किताब में किसी एक पक्ष को पूरी तरह खलनायक या नायक नहीं बनाया है. वह टीपू सुल्तान के प्रशासनिक सुधारों, उनकी सैन्य तकनीक और श्रृंगेरी मठ जैसे कुछ मंदिरों को दिए गए संरक्षण का भी जिक्र करती हैं.
इसके साथ ही, टीपू की फारसी में लिखी गई ‘ड्रीम बुक’ (जिसमें उनके 37 सपने दर्ज हैं) और युद्ध के समय उनकी मानसिक उथल-पुथल जैसे पहलुओं को भी बहुत बारीकी से सामने लाया गया है.
आज के समय में जब इतिहास को अक्सर राजनीतिक चश्मे से देखा और परोसा जाता है, तब यह किताब एक बेहद जरूरी हस्तक्षेप साबित होती है. यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि इतिहास को सिर्फ काले और सफेद यानी नायक और खलनायक के खानों में बांटकर नहीं देखा जा सकता. हैदर अली और टीपू सुल्तान अपने समय के बेहद महत्त्वाकांक्षी और चालाक रणनीतिकार थे, लेकिन उनके फैसलों का खमियाजा वहां की आम जनता और स्थानीय समुदायों को भुगतना पड़ा.
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-भारत एक्सप्रेस
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