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विज्ञान का मल्टीवर्स और सनातन का ब्रह्मांड, क्या अरबों साल पहले ही हो चुकी थी समानांतर दुनिया की परिकल्पना?

जब आज विज्ञान की दुनिया में मल्टीवर्स यानी एक से ज्यादा ब्रह्मांडों की संभावना पर चर्चा होती है, तो आमतौर पर बात आधुनिक भौतिकी, क्वांटम सिद्धांत और अलग-अलग संभावित वास्तविकताओं तक पहुंचती है. लेकिन भारतीय दर्शन की ओर देखें तो तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है. सनातन धर्म की परंपरा में ब्रह्मांड को लेकर सोच हजारों साल पुरानी है और इसमें अस्तित्व को सिर्फ हमारी पृथ्वी या दिखाई देने वाले आकाश तक सीमित नहीं माना गया.

हिंदू धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथों में ऐसे विचार मिलते हैं, जहां असंख्य ब्रह्मांडों, अलग-अलग लोकों और भौतिक दुनिया से परे मौजूद आध्यात्मिक आयामों का वर्णन किया गया है. खास तौर पर भागवत पुराण में सृष्टि को लेकर जो विस्तृत कल्पना सामने आती है, वह अस्तित्व को बेहद व्यापक और बहुस्तरीय रूप में देखने का नजरिया देती है.

हालांकि, यहां एक जरूरी अंतर समझना होगा. इन प्राचीन ग्रंथों को आधुनिक विज्ञान की किताब मानना सही नहीं होगा. उनमें बताए गए ब्रह्मांड और लोक वैज्ञानिक प्रयोगों या आधुनिक उपकरणों से प्रमाणित किए गए मॉडल नहीं हैं. फिर भी, उनकी कल्पना और आधुनिक मल्टीवर्स की चर्चा के बीच एक दिलचस्प समानता जरूर दिखाई देती है.

भागवत पुराण में कैसी है ब्रह्मांड की तस्वीर?

भागवत पुराण में सृष्टि को किसी एक समय पर शुरू होकर हमेशा के लिए चलने वाली प्रक्रिया के तौर पर नहीं देखा गया. इसके बजाय सृष्टि का निर्माण, उसका पालन और फिर उसका विलय एक लगातार चलने वाले चक्र का हिस्सा माना गया है.

इस दृष्टिकोण में ब्रह्मांड कोई स्थिर व्यवस्था नहीं है. समय के विशाल पैमाने पर सृष्टियां प्रकट होती हैं, अपना क्रम पूरा करती हैं और फिर समाप्त हो जाती हैं. इसके बाद एक नए चक्र की शुरुआत होती है.

इसी संदर्भ में अनेक ब्रह्मांडों या ‘ब्रह्मांडों’ की कल्पना सामने आती है. ग्रंथों में ब्रह्मांड को कई बार ‘ब्रह्मांड’ या ‘कॉस्मिक एग’ यानी ब्रह्मांडीय अंडे के रूप में समझाया गया है. प्रत्येक ब्रह्मांड में अलग-अलग ग्रह, जीव और अस्तित्व के स्तर बताए गए हैं.

इस तरह देखा जाए तो यहां दुनिया की कल्पना केवल उस धरती तक सीमित नहीं है, जिसे इंसान अपनी आंखों से देख सकता है. इसके पीछे एक बहुत बड़ी और जटिल कॉस्मिक व्यवस्था की तस्वीर पेश की जाती है.

सिर्फ भौतिक दुनिया ही सब कुछ नहीं

सनातन धर्म की ब्रह्मांड संबंधी सोच का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वास्तविकता को केवल पदार्थ और दिखाई देने वाली चीजों तक सीमित नहीं माना जाता.

हिंदू cosmology में अलग-अलग लोकों और अस्तित्व के स्तरों का उल्लेख मिलता है. इनमें सांसारिक, दिव्य, सूक्ष्म और आध्यात्मिक स्तरों की चर्चा की जाती है. इसका अर्थ यह है कि इंसान जिस वास्तविकता को अपनी इंद्रियों से महसूस करता है, उसे पूरी सृष्टि का अंतिम रूप नहीं माना जाता.

यहीं से चेतना का सवाल भी सामने आता है.

सनातन परंपरा में यह विचार महत्वपूर्ण है कि किसी जीव का अनुभव केवल बाहरी दुनिया पर निर्भर नहीं करता. उसकी चेतना, कर्म और आध्यात्मिक स्थिति भी इस बात से जुड़ी मानी जाती है कि वह अस्तित्व को किस तरह अनुभव करता है.

यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बाहर कितने संसार मौजूद हैं. सवाल यह भी है कि उन्हें अनुभव करने वाला कौन है और उसकी चेतना की सीमा क्या है.

क्या यह आधुनिक मल्टीवर्स की भविष्यवाणी थी?

यही वह जगह है जहां सावधानी जरूरी है. आज विज्ञान में ‘मल्टीवर्स’ शब्द का इस्तेमाल कई अलग-अलग सैद्धांतिक अवधारणाओं के लिए किया जाता है. कुछ वैज्ञानिक मॉडल अलग-अलग ब्रह्मांडों या संभावित वास्तविकताओं की संभावना पर विचार करते हैं. लेकिन इन वैज्ञानिक विचारों और प्राचीन हिंदू cosmology को एक ही चीज कहना उचित नहीं होगा.

भागवत पुराण ने आधुनिक अर्थों में parallel universes का वैज्ञानिक सिद्धांत पेश नहीं किया था. न ही यह दावा किया जा सकता है कि प्राचीन ऋषियों ने आधुनिक भौतिकी के प्रयोगों के परिणाम पहले ही खोज लिए थे.

फिर भी, समानता इस बात में दिलचस्प है कि दोनों में मानव अनुभव से कहीं बड़ी वास्तविकता की संभावना पर विचार किया जाता है. अंतर यह है कि आधुनिक विज्ञान इसे गणित, सिद्धांत और परीक्षण के माध्यम से समझने की कोशिश करता है, जबकि सनातन धर्म का दृष्टिकोण मुख्य रूप से आध्यात्मिक और दार्शनिक है.

सृष्टि को चक्र के रूप में देखने की सोच

सनातन धर्म में समय की कल्पना भी काफी विशाल है. यहां समय को केवल मानव जीवन या कुछ हजार वर्षों के पैमाने पर नहीं देखा जाता.

सृष्टि के निर्माण से लेकर उसके विलय तक की प्रक्रिया को अत्यंत लंबे चक्रों में समझाया गया है. ब्रह्मांड बनता है, चलता है और फिर एक समय पर उसका अंत होता है. उसके बाद सृष्टि का नया क्रम शुरू होता है.

यह सोच उस सामान्य धारणा से अलग है जिसमें ब्रह्मांड को एक बार शुरू हुई और लगातार आगे बढ़ रही व्यवस्था माना जाता है.

इस चक्रीय दृष्टिकोण में निर्माण और विनाश एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. दोनों सृष्टि की प्रक्रिया के हिस्से हैं.

अलग-अलग लोक और अलग अनुभव

हिंदू दर्शन में लोकों की चर्चा भी इस ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण हिस्सा है. विभिन्न लोकों को अस्तित्व के अलग स्तरों के रूप में देखा जाता है और अलग-अलग प्रकार के जीवों के निवास से जोड़ा जाता है.

यह विचार इस बात की ओर इशारा करता है कि वास्तविकता हर प्राणी के लिए एक जैसी और पूरी तरह सीमित नहीं है. कर्म, चेतना और आध्यात्मिक स्थिति के आधार पर जीव की यात्रा और उसका अनुभव अलग हो सकता है.

यहीं पर सनातन धर्म का मल्टीवर्स जैसा विचार केवल ‘कितने ब्रह्मांड हैं’ वाले सवाल से आगे निकल जाता है. यह इंसान को यह सोचने के लिए भी प्रेरित करता है कि जीवन का उद्देश्य क्या है और क्या भौतिक दुनिया से परे भी कोई स्थायी सत्य मौजूद है.

आज के दौर में क्यों महत्वपूर्ण है यह विचार?

आज मल्टीवर्स को लेकर लोगों की दिलचस्पी सिर्फ वैज्ञानिकों तक सीमित नहीं है. फिल्मों, किताबों और लोकप्रिय विज्ञान के जरिए भी वैकल्पिक वास्तविकताएँ (alternate realities) और समानांतर दुनियाएँ (parallel worlds) आम चर्चा का हिस्सा बन चुके हैं.

ऐसे समय में हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान (cosmology) की प्राचीन अवधारणाएं एक अलग तरह का नजरिया सामने रखती हैं.

आधुनिक विज्ञान पूछता है कि ब्रह्मांड कितना बड़ा है, उसकी संरचना क्या है और क्या हमारे ब्रह्मांड के अलावा भी कुछ हो सकता है. सनातन दर्शन इसके साथ कुछ और सवाल जोड़ देता है कि चेतना क्या है? देखने वाला कौन है? जन्म और मृत्यु के पार क्या है? क्या दिखाई देने वाली दुनिया ही अंतिम सत्य है?

इन सवालों की वजह से प्राचीन विचार आज भी दार्शनिक स्तर पर प्रासंगिक बने हुए हैं.

विज्ञान और आध्यात्म के बीच संतुलित नजरिया

प्राचीन ग्रंथों और आधुनिक विज्ञान के बीच तुलना करते समय दो अतियों से बचना जरूरी है. एक तरफ यह कहना सही नहीं होगा कि प्राचीन ग्रंथों ने आधुनिक मल्टीवर्स सिद्धांत को वैज्ञानिक रूप से साबित कर दिया था. दूसरी तरफ, इन ग्रंथों में मौजूद व्यापक ब्रह्मांडीय कल्पना को केवल इसलिए नजरअंदाज करना भी उचित नहीं है क्योंकि वह आधुनिक वैज्ञानिक भाषा में नहीं लिखी गई.

इसे एक दार्शनिक समानता के रूप में देखना ज्यादा उचित है.

भागवत पुराण और हिंदू cosmology का उद्देश्य प्रयोगशाला में ब्रह्मांडों की संख्या गिनना नहीं था. उनका मुख्य उद्देश्य सृष्टि, जीव, कर्म, चेतना और परम सत्य को समझने की दिशा में मनुष्य का मार्गदर्शन करना था.

इस दृष्टि से इस पूरी अवधारणा को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है. पहला, ब्रह्मांडीय स्तर, जहां अनगिनत संसारों और विशाल सृष्टि की कल्पना है; दूसरा, दार्शनिक स्तर, जहां इंसान को अपनी सीमित समझ पर सवाल करने के लिए प्रेरित किया जाता है; और तीसरा, आध्यात्मिक स्तर, जहां लक्ष्य अस्थायी संसारों से आगे किसी शाश्वत सत्य की खोज करना है.

सनातन धर्म की यह ब्रह्मांडीय कल्पना आखिरकार सिर्फ ‘कितने ब्रह्मांड हैं’ का सवाल नहीं पूछती. इसका गहरा सवाल इंसान की अपनी सीमाओं को लेकर है. जिस दुनिया को हम रोज देखते हैं, उसे ही पूरी वास्तविकता मान लेना शायद बहुत सीमित नजरिया हो सकता है. प्राचीन भारतीय चिंतन इसी धारणा को चुनौती देता है और कहता है कि अस्तित्व हमारी सामान्य इंद्रियों और समझ से कहीं बड़ा हो सकता है.

भागवत पुराण में वर्णित असंख्य ब्रह्मांडों की कल्पना इसी व्यापक सोच का हिस्सा है. इसे आधुनिक विज्ञान का प्रमाण मानने के बजाय एक प्राचीन आध्यात्मिक cosmology के रूप में समझना अधिक सही है.

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-भारत एक्सप्रेस

Prashant Kumar

CEO – Bharat Express Digital Chief Advisor to the Chairman & Managing Director and Editor-in-Chief Mr. Prashant Kumar is a digital, media and growth transformation leader with 18+ years of experience across strategy, technology, AI, marketing and business transformation, having worked with leading organisations including Amazon, IBM, Adidas and Tata Consumer Products. At Bharat Express, he leads digital transformation, audience growth, technology, partnerships, monetisation and new business initiatives to build a scalable, future-ready media ecosystem.

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