अजब-गजब

शव को खाने की रस्म! इस जनजाति में अपनों की लाश को खा जाना था प्यार की निशानी

दुनिया जितनी आधुनिक दिखती है, उतनी ही रहस्यमयी भी है. आज भी धरती के कुछ कोनों में ऐसी जनजातियां बसी हैं, जिनकी परंपराएं और विश्वास आम इंसान की सोच से बिल्कुल अलग हैं. इन्हीं में से एक है एक ऐसी जनजाति, जिसके बारे में जानकर आपके होश उड़ जाएंगे.

रहस्यमयी जनजातियों में से एक

दुनिया भर में हजारों जनजातियां रहती हैं. किसी की संस्कृति अनोखी है, तो किसी का खान-पान अलग. लेकिन कुछ जनजातियां ऐसी भी हैं, जिनके रीति-रिवाज आज के समय में चौंका देने वाले लगते हैं. पापुआ न्यू गिनी में रहने वाली फोर जनजाति भी उन्हीं में से एक है. इसे लंबे समय तक दुनिया की सबसे खतरनाक और रहस्यमयी जनजातियों में गिना जाता रहा है.

मरने के बाद भी नहीं मिलता सुकून

फोर जनजाति की मान्यता थी कि किसी अपने को मरने के बाद जलाना या दफनाना सही नहीं है. उनका विश्वास था कि ऐसा करने से आत्मा को शांति नहीं मिलती. इसी सोच के चलते उन्होंने एक ऐसी परंपरा अपनाई, जिसे सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं. इस जनजाति में अगर कोई मर जाता था, तो उसके शव को पूरे सम्मान के साथ खा लिया जाता था.

मां-बाप तक को नहीं बख्शा

यह रस्म सिर्फ दुश्मनों या बाहरी लोगों तक सीमित नहीं थी. फोर जनजाति के लोग अपने ही परिवार के सदस्यों, यहां तक कि मां-बाप के शव को भी खा जाते थे. इसे वे प्यार और सम्मान की अंतिम अभिव्यक्ति मानते थे. उनका मानना था कि ऐसा करने से मृतक की आत्मा परिवार के भीतर ही बनी रहती है.

दिमाग को माना जाता था सबसे खास

इस परंपरा में सबसे पहले मृतक का दिमाग खाया जाता था. जनजाति के लोगों का विश्वास था कि दिमाग में इंसान की ताकत और आत्मा बसती है. मरने के बाद पूरे गांव के लोग इकट्ठा होते, दावत होती और शव को सब मिलकर खाते थे. यह सुनने में जितना अजीब है, उनके लिए उतना ही सामान्य था.

1960 के दशक तक चलता रहा रिवाज

वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के मुताबिक, फोर जनजाति में यह परंपरा 1960 के दशक तक जीवित थी. दुनिया जब चांद पर जाने की तैयारी कर रही थी, उसी दौर में यहां इंसानों को खाने की यह प्रथा जारी थी.

लेकिन इस परंपरा का अंजाम बेहद खतरनाक साबित हुआ. शव खाने की वजह से जनजाति में एक गंभीर बीमारी फैल गई, जिसे बाद में कुरु बीमारी कहा गया. इस बीमारी में लोगों का दिमाग धीरे-धीरे काम करना बंद कर देता था. लोग बिना वजह हंसते रहते और अंत में दर्दनाक मौत मर जाते थे.

सरकार ने लगाई सख्त रोक

जब हालात काबू से बाहर हो गए, तब पापुआ न्यू गिनी की सरकार ने दखल दिया और इस प्रथा पर पूरी तरह रोक लगा दी. इसके बाद धीरे-धीरे यह परंपरा खत्म हुई और जनजाति को आधुनिक जीवन की ओर ले जाया गया.

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-भारत एक्सप्रेस

Vaibhav Gupta

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