विश्लेषण

दारा शिकोह: उपनिषदों को दुनिया से रू-ब-रू कराने वाला मुगल शहजादा, जिसे औरंगजेब ने दी थी दर्दनाक मौत

Dara Shikoh Death Anniversary: भारत के इतिहास में दारा शिकोह का स्थान एक योद्धा, कवि और महान मुक्त-चिंतक के रूप में सुरक्षित है. 30 अगस्त 1659 को आज ही के दिन मुगल बादशाह औरंगजेब ने अपने बड़े भाई दारा शिकोह का सिर कलम करवा दिया था. यह घटना मुगल काल की सबसे दर्दनाक और प्रतीकात्मक घटनाओं में से एक मानी जाती है.

उत्तराधिकार का संघर्ष

शाहजहां के बाद दारा शिकोह दिल्ली की गद्दी के वैध उत्तराधिकारी थे. वे शाहजहां और उनकी दूसरी पत्नी मुमताज महल के सबसे बड़े पुत्र थे. जन्म 1615 में हुआ था. लेकिन कट्टरपंथियों ने उन पर ‘बुतपरस्त’ (मूर्तिपूजक) होने का आरोप लगाया. इस आरोप का फायदा उठाकर औरंगजेब ने विद्रोह किया और सत्ता हथिया ली. 30 अगस्त 1659 को दिल्ली में दारा शिकोह को मौत की सजा दी गई. उनका सिर काटकर आगरा ले जाया गया और धड़ को दिल्ली में हुमायूं के मकबरे के परिसर में दफनाया गया. मुगलकाल में दारा के अलावा ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता जिसमें किसी मुगल शहजादे का सिर कलम कर सिर्फ धड़ दफनाया गया हो. औरंगजेब ने दारा का कटा हुआ सिर शाहजहां को भी भिजवाया था.

दारा शिकोह की बौद्धिक विरासत

दारा शिकोह सिर्फ एक राजकुमार नहीं थे. उन्होंने गीता और 52 उपनिषदों का पहली बार संस्कृत से फारसी में अनुवाद किया. इस अनुवाद के बाद ही पूरी दुनिया भारतीय सनातन संस्कृति से रू-ब-रू हुई. इससे पहले उपनिषदों का ज्ञान मुख्य रूप से उच्च जातियों के हिंदुओं तक सीमित था. दारा ने इस ज्ञान को व्यापक बनाया. पुरातत्वविद् केके मुहम्मद ने उन्हें अपने समय का महानतम मुक्त-विचारक कहा है. उन्होंने बताया कि दारा को उपनिषदों का महत्व समझ आया और उन्होंने उनका अनुवाद किया. इस अनुवाद ने बाद में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा समेत कई लोगों को प्रेरित किया.

आधुनिक सम्मान और खोज

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी दारा शिकोह को एक आदर्श मुसलमान मानता आया है. जनवरी 2020 में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने उनकी कब्र तलाशने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की सात सदस्यीय टीम गठित की थी. माना जाता है कि दारा शिकोह की कब्र हुमायूं का मकबरा परिसर में मौजूद लगभग 140 कब्रों में से एक है.

दारा शिकोह का जीवन और मृत्यु हमें याद दिलाती है कि ज्ञान, सहिष्णुता और मुक्त-चिंतन सत्ता के संघर्ष में कितनी आसानी से कुचला जा सकता है. उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को फारसी माध्यम से विश्व पटल पर लाने का काम किया. आज भी उनकी विरासत हमें धार्मिक कट्टरता के बजाय संवाद और समझ की राह दिखाने वाली है.

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-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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