Independence Day 2026:भारत की आजादी के 79 साल पूरे हो चुके हैं और इस दौरान देश ने कई मोर्चों पर लंबा सफर तय किया है. लेकिन अगर इस बदलाव को टेक्नोलॉजी की नजर से देखें, तो तस्वीर और भी दिलचस्प नजर आती है. एक दौर था जब भारत मशीनों से लेकर तकनीक तक के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहता था. आज वही देश सॉफ्टवेयर, डिजिटल पेमेंट, इलेक्ट्रॉनिक्स और अंतरिक्ष तकनीक में अपनी पहचान बना चुका है. अब अगला लक्ष्य आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में मजबूत पकड़ बनाना है.
इस कहानी की शुरुआत आजादी के बाद नहीं, बल्कि उससे भी पहले हो चुकी थी. 1905 के स्वदेशी आंदोलन में लोगों से विदेशी सामान का बहिष्कार करने और देश में ही चीजें बनाने की अपील की गई थी. उस समय स्वदेशी का मकसद आर्थिक आत्मनिर्भरता था. आज यही विचार आधुनिक रूप ले चुका है. फर्क सिर्फ इतना है कि अब बात कपड़े या रोजमर्रा के सामान की नहीं, बल्कि चिप, इलेक्ट्रॉनिक्स, सॉफ्टवेयर और AI जैसी अत्याधुनिक तकनीकों की हो रही है.
आजादी के शुरुआती वर्षों में भारत ने यह समझ लिया था कि मजबूत देश बनने के लिए वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता जरूरी है. 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग बना. इसके बाद 1954 में परमाणु ऊर्जा विभाग और 1958 में DRDO की स्थापना हुई. 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना शुरू हुई और इसी साल IIT खड़गपुर ने भी काम शुरू किया.
अंतरिक्ष के क्षेत्र में भी भारत ने धीरे-धीरे अपने कदम मजबूत किया. 1969 में ISRO की स्थापना हुई और 1975 में देश का पहला उपग्रह आर्यभट्ट अंतरिक्ष में भेजा गया. टेलीकॉम में स्वदेशी तकनीक विकसित करने के लिए 1984 में C-DOT ने काम शुरू किया.
कंप्यूटर तकनीक में भी भारत ने पीछे हटने के बजाय अपनी राह बनाने की कोशिश की. अमेरिका से सुपरकंप्यूटर की तकनीक नहीं मिलने के बाद 1988 में C-DAC की स्थापना हुई. आगे चलकर इसी संस्था ने PARAM सुपरकंप्यूटर की सीरीज विकसित की. यह उस दौर में आत्मनिर्भर तकनीक की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था.
भारत की टेक्नोलॉजी कहानी में तेजी 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद आई. निजी कंपनियों के लिए रास्ता खुला, टेलीकॉम का विस्तार हुआ और इंटरनेट धीरे-धीरे लोगों की जिंदगी में जगह बनाने लगा. TCS, Infosys, Wipro और HCL जैसी कंपनियां तेजी से आगे बढ़ीं. बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे देश का बड़ा टेक्नोलॉजी हब बन गया.
Y2K संकट ने भी भारतीय IT कंपनियों को पूरी दुनिया के सामने अपनी क्षमता दिखाने का मौका दिया. इसके बाद BPO और IT सेवाओं के क्षेत्र में भारत की पकड़ मजबूत होती चली गई. जिस सेक्टर की शुरुआत छोटे स्तर से हुई थी, वह अब 315 अरब डॉलर से ज्यादा के उद्योग का रूप ले चुका है. इस क्षेत्र से करीब 60 लाख लोगों को सीधे रोजगार मिलता है.
स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट ने भारत के डिजिटल बदलाव को नई रफ्तार दी. आधार ने करोड़ों लोगों को डिजिटल पहचान दी, जनधन खातों ने बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने में मदद की और मोबाइल इंटरनेट ने इन सुविधाओं को आम लोगों तक पहुंचाया.
इसके बाद UPI ने डिजिटल भुगतान की दुनिया ही बदल दी. NPCI के आंकड़ों के मुताबिक जुलाई 2026 में UPI पर 23.66 अरब ट्रांजैक्शन हुए, जिनकी कुल कीमत करीब 29.88 लाख करोड़ रुपये रही. जून 2026 तक देश में UPI यूजर्स की संख्या 55.49 करोड़ से ज्यादा हो चुकी थी.
UPI की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसमें बैंक, फिनटेक कंपनियां, दुकानदार और ग्राहक एक ही डिजिटल सिस्टम से जुड़ जाते हैं. छोटे दुकानदार से लेकर बड़े कारोबार तक, डिजिटल भुगतान अब रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है.
भारत की टेक्नोलॉजी कहानी अब केवल IT और सॉफ्टवेयर तक सीमित नहीं है. सरकार इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को भी बढ़ावा दे रही है. PLI योजनाओं के तहत मार्च 2026 तक 2.40 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश आया और 14.15 लाख से ज्यादा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा हुए. इसी दौरान 15.2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का निर्यात भी हुआ.
इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में भी निवेश बढ़ा है. मार्च 2026 तक इस क्षेत्र में निवेश 20,600 करोड़ रुपये से अधिक पहुंच चुका था. इसका मतलब साफ है कि भारत अब सिर्फ टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करने वाला बाजार नहीं रहना चाहता, बल्कि उत्पादन की वैश्विक सप्लाई चेन में भी अपनी जगह मजबूत करना चाहता है.
अगला बड़ा मोर्चा सेमीकंडक्टर है. आज मोबाइल फोन से लेकर कार, टेलीकॉम उपकरण, डिफेंस सिस्टम, डेटा सेंटर और AI तक लगभग हर आधुनिक तकनीक किसी न किसी रूप में चिप पर निर्भर है. जुलाई 2026 में केंद्र सरकार ने Semicon 2.0 को मंजूरी दी, जिसके लिए 1.27 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है.
AI के क्षेत्र में भी भारत अपनी क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. IndiaAI Mission के लिए 10,371.92 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है. AI से जुड़ी कंप्यूटिंग क्षमता बढ़ाने के लिए 2026 की शुरुआत तक 38,000 से ज्यादा GPUs जोड़े जा चुके थे.
भारत में काम कर रहे Global Capability Centres (GCC) की भूमिका भी तेजी से बदल रही है. पहले इन्हें अक्सर कंपनियों के बैक ऑफिस के तौर पर देखा जाता था, लेकिन अब यहां AI, साइबर सिक्योरिटी, क्लाउड, सेमीकंडक्टर और इंजीनियरिंग से जुड़े महत्वपूर्ण काम हो रहे हैं. 2024 में भारत में 1,700 से ज्यादा GCC थे, जिनमें करीब 19 लाख प्रोफेशनल काम कर रहे थे.
फिर भी भारत के सामने कुछ बड़ी चुनौतियां हैं. सबसे अहम चुनौती रिसर्च और डेवलपमेंट की है. 2020-21 में भारत का R&D खर्च GDP का केवल 0.64 फीसदी था. ऐसे में आने वाले समय में सिर्फ ज्यादा इंजीनियर तैयार करना पर्याप्त नहीं होगा. देश को विश्वविद्यालयों, निजी कंपनियों, रिसर्च संस्थानों, निवेश, मैन्युफैक्चरिंग और नई तकनीक के बीच बेहतर तालमेल बनाना होगा.
1905 में स्वदेशी का मतलब था कि भारत में इस्तेमाल होने वाली चीजें भारत में बनाई जाएं. आज इस विचार का दायरा बहुत बड़ा हो चुका है. अब लक्ष्य सिर्फ विदेशी तकनीक का विकल्प तैयार करना नहीं, बल्कि अपनी तकनीक विकसित करना, उसकी बौद्धिक और औद्योगिक ताकत अपने पास रखना और उसे दुनिया के दूसरे देशों तक पहुंचाना है.
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-भारत एक्सप्रेस
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