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Ambedkar Jayanti 2026: सतारा के स्कूलों में जातिवाद का दंश झेलने वाले जिस ‘भिवा’ ने अपनी प्रतिभा से शिक्षकों को चौंका दिया था, अब उसके सपनों की उड़ान सात समंदर पार जाने वाली थी. लेकिन यह सफर इतना आसान नहीं था. एक तरफ आर्थिक तंगी थी और दूसरी तरफ पिता का साया उठने का गम. इस भाग में हम जानेंगे कि कैसे बड़ौदा के महाराजा की मदद से भीमराव ने कोलंबिया और लंदन में ज्ञान का लोहा मनवाया और कैसे एक ‘सैन्य सचिव’ की ऊंची नौकरी को जातिगत भेदभाव के कारण छोड़कर उन्होंने सक्रिय राजनीति के जरिए देश की किस्मत बदलने का फैसला किया.
अगले कुछ सालों में आंबेडकर पिता के साथ मुंबई शिफ्ट हो जाते हैं और आगे की शिक्षा के लिए मुंबई के एल्फिंस्टन हाई स्कूल में दाखिला लेते हैं. 1907 में वो मैट्रिक पास होते हैं. वे अपनी जाति से पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने इस स्तर की शिक्षा प्राप्त हासिल की थी. सफर आगे बढ़ता है और वो एल्फिंस्टन कॉलेज से 1912 में अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में स्नातक की डिग्री भी हासिल कर लेते हैं. एक साल बाद ही यानी 1913 में पिता का निधन हो जाता है. इसके बाद भी वो हार नहीं मानते और आगे की पढ़ाई जारी रखते हैं. यहां भी उनके काम आते हैं दादा केलुस्कर जो आगे की शिक्षा के लिए उनका सपोर्ट करते हैं.
1912 में ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल करने के बाद बड़ौदा राज्य सरकार में नौकरी ऑफर हो गई जहां वो काम करने के लिए चले गए. कुछ दिनों बाद ही पिता बीमार रहने लगे जिनकी देखभाल के लिए वापस मुंबई आ गए. 2 फरवरी 1913 को पिता का देहावास हो जाता है. पिता की मौत के बाद बाबा साहब भीमराव आंबेडकर को अकेले अकेले से हो गए थे. हालांकि, इसके बाद भी उन्होंने किताबों का साथ नहीं छोड़ा. उनकी इच्छा विदेश जाकर पढ़ाई करने की थी. ऐसे में फिर से उनके काम दादा केलुस्कर आए. उन्होंने वडोदरा राज्य की शिक्षावृत्ति के लिए बाबा साहब के पक्ष में साक्षी दी. जिसके बाद वो पढाई के लिए कोलंबिया यूनिवर्सिटी पहुंच गए.
साल 1917 में छात्रवृत्ति की अवधि समाप्त होने के कारण उनको भारत लौटना पड़ा. आते ही उनको बड़ौदा के महाराजा का सैन्य सचिव नियुक्ति मिल गई. हालांकि, इतना ऊंचा कद हो जाने के बाद भी जाति ने उनका पीछा नहीं छोड़ा जिस कारण उन्हें मजबूरन पद छोड़ना पड़ा. बड़ौदा से मुंबई लौटने के बाद एक कॉलेज में पढ़ाना शुरू कर दिया. जहां उन्हें छात्रों का बड़ा प्यार मिला. हालांकि, अभी उन्हें और पढ़ने की इच्छा थी. इसका सम्मान कोल्हापुर के महाराज ने किया और उनको लंदन में कानून और अर्थशास्त्र की पढ़ाई करने के लिए आर्थिक सहायता दी.
लंदन यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने के साथ ही उन्होंने प्रोविंशियल डिसेंट्रलाइजेशन ऑफ इम्पीरियल फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया’नाम से थीसिस लिखी. इसके बाद कुछ समय के लिए जर्मनी की बॉन यूनिवर्सिटी में बिताया. 1923 में उन्हें वकीलों के बार में बुला लिया गया. अब बाबा साहेब को अपने असल उद्देश्य की चिंता सताने लगी थी. इसलिए वो 1924 में भारत लौटे और दलित वर्गों के कल्याण के लिए एसोसिएशन शुरू कर दिया. दलित समस्याओं को हल करने के लिए उन्होंने 3 अप्रैल, 1927 को बहिष्कृत भारत समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू कर दिया. 1928 में बंबई के लॉ कॉलेज से जुड़े और 1935 में यही प्रिंसिपल बने गए. इसके बाद 1938 में इस्तीफा दे दिया.
साल 1938 में प्रिंसिपल पद से इस्तीफा देने से पहले उनकी सियासत में एंट्री हो गई थी. 1926 में उनको बॉम्बे के गवर्नर ने विधान परिषद के सदस्य के रूप में नामित कर दिया था. जहां उन्होंने 1936 तक बतौर काउंसिल सदस्य के रूप में काम किया. अब वो सक्रिय राजनीति में आने का मन बना चुके थे. इस कारण उन्होंने 15 अगस्त 1936 को डॉ. भीमराव आंबेडकर स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की. इसका काम सामाजिक न्याय और समानता के लिए संघर्ष करना था. पार्टी की स्थापना के अलगे साल ही उन्होंने विधान सभा चुनावों में दम लगाया और 13 सीटें हासिल कर ली. खुद भी बॉम्बे विधान सभा से चुने गए और कुछ समय के लिए विपक्ष के नेता के नेता के रूप में काम किया.
बॉम्बे विधान सभा में रहते हुए उन्होंने 1938 में उन्होंने कांग्रेस के अस्पृश्यों के नाम में बदलाव के प्रस्ताव का विरोध किया. 1942 में वह भारत के गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद में श्रम सदस्य के रूप में शामिल हुए. 1946 में बंगाल से संविधान सभा के सदस्य चुने गए और इसी साल प्रसिद्ध पुस्तक “हू वर शूद्र?” प्रकाशित की. भारत को आजादी मिलने के बाद वो पंडित जवाहरलाल नेहरू की कैबिनेट में विधि एवं न्याय मंत्री बने. इस पद पर रहते हुए उन्होंने एक न्यायपूर्ण समाज की नींव रखी. हालांकि, हिंदू कोड बिल और विदेश नीति के मामले में उनकी सरकार से नहीं जम पाई और उन्होंने इस्तीफा दे दिया.
पार्ट-3 में पढ़ें: लाखों समर्थकों के साथ दीक्षा, नागपुर का वो मोड़ जब भीमराव बने ‘बाबा साहेब’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
इससे पहले पार्ट-1 में बाबा साबेह के सकपाल से आंबडवेकर फिर आंबेडकर बनने की कहानी बताई गई है. पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
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