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Ambedkar Jayanti 2026: बाबा साहेब आंबेडकर यानी डॉ भीमराव आंबेडकर देश के उन महानायकों में शामिल हैं जिन्होंने न केवल भारतीय समाज को बदला बल्कि समाज की नई परिकल्पना को भी आधार दिया. उनका जीवन संघर्ष, ज्ञान और समाज सुधार का प्रतीक बना हुआ है. आंबेडकर ऐतिहासिक व्यक्तित्व होने के साथ ही वह आदर्श हैं जो हमें सिखाता है कि न्याय और समानता लगातार किया गया संघर्ष आपको महान बनाता है. हालांकि, आज के दौर में उनके नाम का उपयोग अब सियासत में खासा होने लगा है. एक बड़ा समुदाय उन्हें भगवान की उपाधि देकर पूजता है. अक्सर उनका नाम केवल संविधान के परिपेक्ष्य में लिया जाता है. हालांकि, संविधान से इतर संविधान बनने से पहले, उस दौरान और उसके बाद बाबा साहेब बहुत कुछ थे जो उनको महान बनाता है.
आज 14 अप्रैल 2026 को भारतीय संविधान के मुख्य वास्तुकार, समाज सुधारक और भारत के मसीहा बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर की 135वीं जयंती मनाई जा रही है. इस दिन को ‘समानता दिवस’ के रूप में भी मनाया जाता है, जो उनके देश के प्रति योगदान और समानता, स्वतंत्रता और न्याय के प्रति समर्पण को याद करता है. अब सवाल ये क्या वाकई आंबेडकर को कोई संविधान के इतर भी जानता है या उन्हें केवल सियासी तौर पर उपयोग कर लिया जा रहा है.
यहां से शुरू होती है कहानी (Dr. BR Ambedkar Biography)
आज से करीब 204 साल पहले ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना मध्य भारत प्रांत के महू में अपनी छावनी बनाती है. इसी छावनी में मूल रूप से महाराष्ट्र के कई हिस्सों से आने वाले लोगों को बतौर सैनिक भर्ती किया जाता है. कुछ सालों बाद रत्नागिरी जिले में आंबडवे गांव के रामजी मालोजी सकपाल ब्रिटिश सेना में भर्ती होते हैं और सेवा देने के लिए वो अपनी भीमाबाई के साथ इंदौर के महू पहुंच जाते हैं. कुछ समय बाद वो ब्रिटिश सेना में सूबेदार के पद पर पदोन्नत हो जाते हैं. महू में यहीं रहने के दौरान 14 अप्रैल 1891 को उनकी 14वीं संतान भिवा का जन्म होता है. जिसका नाम भीमराव रामजी रखा जाता है. यह बच्चा आगे चलकर भारत का भविष्य बनता है.
बच्चा भिवा जब 2 साल का था तो पिता सूबेदार रामजी मालोजी सकपाल सेना से रिटायर हो जाते हैं. इसके बाद वो सतारा शिफ्ट हो गए. भिवा अभी 6 साल का ही हुआ था कि मां भीमाबाई का निधन हो गया. अब सुबेदार रामजी मालोजी पर बच्चे की पूरी जिम्मेदारी आ गई. पिता ने बेटे के भविष्य की चिंता करते हुए उसका दाखिला सरकारी स्कूल में कराने का सोचा लेकिन उनको जातिवाद के दंश का सामना करना पड़ रहा था. ऐसे में मालोजी सकपाल ने एक युक्ति लगाई. 7 नवंबर साल 1900 में वो स्कूल पहुंचे और बेटे के नाम के पीछे से अपना उपनाम ही हटा दिया. उन्होंने अपने गांव आंबडवे के नाम को जोड़ते हुए भीमराव का नाम भिवा रामजी आंबडवेकर दर्ज करा दिया. यही बेटे की शिक्षा होने सगी. इससे पहले पिता 1897 में मुंबई शिफ्ट हो गए थे.
चौथी कक्षा से ही जाग गई थी बौद्ध चेतना (Baba Saheb Ambedkar History)
सतारा के स्कूलों में भी उन दिनों दलितों का छुआछूत का सामना करना पड़ता था. इस कारण किसी दलित का स्कूल में प्रवेश और उसकी शिक्षा तो मुस्किल हुआ ही करती थी. पढ़ाई में अव्वल आना तो बहुत दूर की बात थी. ऐसे में भिवा एक ऐसा बच्चा था जो न केवल तमाम चीजों को सहते हुए पढ़ाई की बल्कि वो किया जो उन दिनों कोई दलित कर भी नहीं सकता था. पहली, दूसरी, तीसरी और फिर लगातार चौथी कक्षा में वो अंग्रेजी माध्यम के साथ उत्तीर्ण हुए. तब ये बेहद असामान्य बात थी इस कारण उनके पास होने का जश्न सामुदायिक रूप से मनाया गया. इसी में शामिल होने के लिए उनके परिवार के मित्र और लेखक दादा केलुस्कर पहुंचते हैं और वो अपनी पुस्तक ‘बुद्ध की जीवनी’ उनको भेट करते हैं. जब भीमराव इसे पढते हैं तो वो बौद्ध चेतना की ओर प्रेरित होने लगते हैं.
आंबडवेकर बन गए आंबेडकर (135th Ambedkar Jayanti)
सतारा के स्कूल में एक तरफ जहां भीवा को छुआछूत का सामना करना पड़ता था. बच्चे तो बच्चे अध्यापक भी उनके साथ द्वयं दर्जे का व्यवहार करते थे. ऐसे में एक ब्राह्मण शिक्षक उनको बेहद प्रेम करते थे. शिक्षक का नाम कृष्णा केशव आंबेडकर था. कृष्णा केशव भीवा की प्रतिभा के कायल थे. उन्होंने सोचा कि बच्चे को जातिवाद का सामना न करना पड़े. इस कारण उन्होंने आंबडवेकर की जगह भीमराव के नाम में आंबेडकर जोड़ दिया. यहीं से भीमराव रामजी, भीमराव आंबेडकर बन जाते हैं.
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