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Ambedkar Jayanti 2026: ‘मैं अछूत हिंदू के रूप में पैदा तो हुआ हूं, लेकिन हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं.’ डॉ. आंबेडकर के इस एक संकल्प ने भारत के सामाजिक और धार्मिक इतिहास की दिशा बदल दी. सीरीज के इस अंतिम भाग में हम उस महामानव के ‘बाबा साहेब’ बनने की प्रक्रिया को समझेंगे. यह कहानी केवल संविधान लिखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कहानी है उस संघर्ष की जिसने महिलाओं को हक दिलाने के लिए मंत्री पद छोड़ दिया और उस शांति की तलाश की, जो अंततः नागपुर की दीक्षाभूमि पर बौद्ध धर्म के रूप में पूरी हुई.
देश आजाद हो गया था लेकिन इसके बाद भी भीमराव आंबेडकर का सपना सच होता नहीं दिख रहा था. कई मौकों पर उनको और पूरे दलित समाज को भेदभाव का सामना करना पड़ रहा था. उन्हें लगने लगा था कि बौद्ध धर्म में प्रज्ञा, करुणा, और समता का संदेश मिलता है जिसका हिंदू धर्म में अभाव है. वो कुरूतियों और छुआछूत से परेशान हो गए थे. इसी का परिणाम था कि उन्होंने 14 अक्टूबर, 1956 को नागपुर की दीक्षाभूमि पर अपने 3.65 लाख समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म में शामिल होने का फैसला ले लिया.
हालांकि, उन्हें चौथी कक्षा में बौद्ध धर्म से संबंधित किताब मिली थी. इसके बाद उनको बौद्ध बनने में 52 साल का समय लग गया. बौद्ध संन्यासी भिक्खु चंद्रामणि दीक्षित किया. इसी दिन के भाषण ली गईं उनकी 22 प्रतिज्ञाएं काफी चर्चा में रहती हैं. जिसमें उन्होंने कहा था कि मैं अछूत हिंदू जरूर पैदा हुआ हूं लेकिन हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं. इसी दिन से उनके नाम के साथ बाबा साहेब जुड़ गया.
भले बाबा साहेब कानून मंत्री बन गए थे लेकिन कई मामलों पर उनकी सरकार से नहीं बनती थी. इसका वो कड़ा विरोध करते थे. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 का स्पष्ट रूप से विरोध किया. उनका तर्क था कि यह भारत के हितों के खिलाफ है. हालांकि, उनके विरोध के बावजूद संविधान में शामिल किया गया. इसे लेकर जब संसद में चर्चा हुई तो उन्होंने इसमें भाग नहीं लिया और खुद को चर्चा से अलग कर लिया. इससे पहले संविधान सभा में रहते हुए समान नागरिक संहिता की वकालत करते रहे हैं. 1951 में जब उनके हिंदू कोड बिल का प्रस्ताव रोका गया तो उन्होंने कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद वो लोकसभा चुनाव हार गए हालांकि, राज्यसभा में उनका चुनाव किया गया.
बाबा साहेब के पूरे जीवन काल के कई पहलू हैं लेकिन उन सभी पहलुओं में जो एक पहलू सबसे कॉमन है वो है जातिवाद और उसका विरोध. उन्होंने बचपन से इसका नुकसान उठाया है. कई बार उनके इस कारण भेदभाव का सामना करना पड़ा और नौकरी तक छोड़नी पड़ी. लेकिन कहते हैं न आप में ज्ञान है तो आप कुछ भी कर सकते हैं यही कारण है कि स्कूल में छुआछूत का विरोध करने वाला बच्चा आजीवन इसके लिए लड़ता रहा और आखिर तक काफी कुछ ऐसा कर गया जो आज देश को नई दिशा दे रहा है.
गांधी और कांग्रेस की आलोचना के बाद भी डॉ. भीमराव आंबेडकर की विद्वता और विधिवेत्ता का हर कोई कायल था. उनकी प्रतिष्ठा ने उनको देश का पहले कानून और न्याय मंत्री बनाया. इसके बाद वो संविधान सभा के अध्यक्ष भी नियुक्त हुए. जब 1949 को संविधान अपनाया गया तो आंबेडकर ने कहा था कि संविधान तभी सफल होगा जब इसे लागू करने वाले लोग नैतिक होंगे.
आंबेडकर का सपना ऐसे भारत का निर्माण था हर व्यक्ति को समान अधिकार मिले और उसके साथ जाति या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव न हो. उनका कहना था कि सामाजिक सुधार और समरसता ही भारत के उज्ज्वल भविष्य की चाबी है. आज आंबेडकर सामाजिक न्याय, समानता और अधिकारों की लड़ाई के लिए प्रेरणा हैं. उनकी शिक्षा और संघर्ष आधुनिक समाज को नई रहा दे सकता है. ऐसे में हमारा ये दायित्व है भी है कि हम समग्र आंबेडकर को पढ़े, जानें और उसके अनुसार अपने तर्क विकसित कर देश को नई दिशा में ले जाने का काम करें. ऐसा न हो की बाबा साहेब केवल सियासी चर्चाओं तक ही सीमित रहें.
बाबा साहेब पार्ट-1: क्या हम संविधान के इतर अपने महानायक को जानते हैं? पढ़ें सकपाल से आंबडवेकर फिर आंबेडकर बनने की कहानी
बाबा साहेब पार्ट-2: नौकरी छूटी, सियासी एंट्री; लेबर पार्टी से संविधान सभा तक कैसे बदली अपनी किस्मत?
‘सकपाल’ से शुरू होकर ‘आंबेडकर’ और फिर ‘बाबा साहेब’ तक का यह सफर हमें सिखाता है कि शिक्षा वह शेरनी का दूध है जो इसे पिएगा वह दहाड़ेगा. आज उनकी 135वीं जयंती पर उन्हें केवल मूर्तियों या सियासी नारों में कैद करना उनके विचारों के साथ अन्याय होगा. उनकी असली विरासत वह ‘समानता’ और ‘तर्क’ है, जिसे हमें अपने समाज और व्यवहार में उतारना है. आइए, संविधान के इस शिल्पकार को केवल पढ़ें नहीं, बल्कि उनके बताए ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो’ के मंत्र को जीकर एक बेहतर भारत का निर्माण करें.
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