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महिला बिल और परिसीमन पर सियासत न करें- पीएम मोदी

संसद के तीन दिवसीय विशेष सत्र के दौरान लोकसभा में इस वक्त एक बेहद अहम और हाई-स्टेक्स बहस देखने को मिल रही है. सदन के भीतर माहौल पूरी तरह राजनीतिक गणित और रणनीति के इर्द-गिर्द घूम रहा है. ताज़ा वोटिंग में 333 सांसदों में से 207 ने विधेयक को पेश करने के पक्ष में वोट दिया, जबकि 126 सांसदों ने इसका विरोध किया. इसी के साथ सदन में सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव और तेज हो गया है.

संविधान संशोधन के लिए कितना बहुमत जरूरी?

संविधान के अनुच्छेद 368 के मुताबिक किसी भी संवैधानिक संशोधन को पास कराने के लिए सिर्फ साधारण बहुमत काफी नहीं होता. इसके लिए सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत तो चाहिए ही, साथ ही उपस्थित और मतदान करने वाले सांसदों में से कम से कम दो-तिहाई समर्थन भी जरूरी होता है. इसके बाद यह विधेयक दोनों सदनों से पास होकर राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाता है.

फिलहाल लोकसभा की प्रभावी ताकत 540 सांसदों की है, क्योंकि तीन सीटें खाली हैं. ऐसे में अगर सभी सदस्य वोटिंग में हिस्सा लेते हैं, तो किसी भी संवैधानिक संशोधन को पास कराने के लिए कम से कम 360 वोटों की जरूरत पड़ेगी.

सत्ता पक्ष राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के पास करीब 292 सांसद हैं, जिससे उसे सदन में साधारण बहुमत तो हासिल है, लेकिन दो-तिहाई का आंकड़ा पार करना उसके लिए आसान नहीं है. इसके लिए उसे अन्य दलों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी.

दूसरी तरफ विपक्षी INDIA गठबंधन के पास लगभग 229 सीटें हैं, जबकि अन्य दलों के पास 12 और सात निर्दलीय सांसद भी सदन में मौजूद हैं.

अगर NDA की संरचना देखें तो भारतीय जनता पार्टी के पास 240 सीटें हैं, तेलुगु देशम पार्टी के 16 सांसद और जनता दल (यू) के 12 सांसद हैं. वहीं विपक्षी खेमे में कांग्रेस के 98, समाजवादी पार्टी के 37, तृणमूल कांग्रेस के 28 और डीएमके के 22 सांसद शामिल हैं.

किन विधेयकों पर हो रही सबसे बड़ी चर्चा?

इस पूरे सियासी समीकरण के बीच तीन बड़े विधेयक चर्चा में हैं. विधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026, जम्मू-कश्मीर कानून (संशोधन) विधेयक 2026 और परिसीमन विधेयक 2026. इन प्रस्तावों को लेकर सदन में तीखी बहस देखने को मिल रही है.

सरकार का प्रस्ताव है कि लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 की जाएं. इसके पीछे महिला आरक्षण कानून को लागू करने की योजना जुड़ी हुई है, जिसे 2023 में पारित किया गया था लेकिन परिसीमन प्रक्रिया पूरी न होने के कारण अब तक लागू नहीं हो सका.

परिसीमन और राज्यों की चिंता

परिसीमन विधेयक के तहत जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं दोबारा तय की जाएंगी. हालांकि विपक्ष, खासकर दक्षिण भारत के राज्य जैसे तमिलनाडु, केरल और तेलंगाना, इस पर आपत्ति जता रहे हैं. उनका कहना है कि इससे उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिल सकता है, जिससे संघीय ढांचे पर असर पड़ेगा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सदन में महिला आरक्षण का समर्थन करते हुए विपक्ष की आलोचनाओं का जवाब दिया. उन्होंने साफ कहा कि जो भी दल इस कानून का विरोध करेगा, उसे आने वाले समय में इसकी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है. साथ ही उन्होंने सभी दलों से अपील की कि इस मुद्दे को राजनीति से ऊपर उठकर देखा जाए और लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में काम किया जाए.

ये भी पढ़ें- कल शाम 4 बजे होगा ‘अग्निपरीक्षा’ का असली फैसला: क्या महिलाओं को मिल पाएगा आरक्षण? लोकसभा में बहुमत के आंकड़े पर फंसा पेंच

-भारत एक्सप्रेस

Shreyansh Choubey

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