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चाय की टपरी से लेकर सात समंदर पार तक… हर तरफ UPI का जलवा, पीएम मोदी का विजन रंग लाया

आज के दौर में अगर आप घर से बिना बटुआ (वॉलेट) लिए भी निकल जाएं, तो टेंशन नहीं होती. जेब में फोन है और उसमें UPI है, तो समझिए पूरी दुनिया आपकी मुट्ठी में है. चाय की टपरी से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल्स तक, हर जगह स्कैन एंड पे चल रहा है. भारत का यह डिजिटल देसी अंदाज़ अब ना सिर्फ देश में, बल्कि सात समंदर पार भी धूम मचा रहा है.

दिसंबर में टूटा रिकॉर्ड

हाल ही में ‘नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया’ (NPCI) ने दिसंबर महीने के जो आंकड़े जारी किए हैं, उन्हें देखकर किसी की भी आंखें फटी रह जाएंगी. इस साल दिसंबर में UPI ने एक ऐसी छलांग लगाई है कि पिछले सारे रिकॉर्ड धरे के धरे रह गए. आंकड़ों की बात करें तो ट्रांजैक्शन वॉल्यूम में सालाना आधार पर 29% की जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

इसका मतलब यह है कि दिसंबर महीने में करीब 21.63 बिलियन (यानी 2,163 करोड़) बार लेनदेन के लिए UPI का इस्तेमाल हुआ. वहीं अगर हम पैसों की वैल्यू की बात करें, तो यह आंकड़ा 28 लाख करोड़ रुपये के करीब पहुंच गया है, जो पिछले साल के मुकाबले 20% ज्यादा है. यह दिखाता है कि अब भारत का आम आदमी कैश के झंझट से पूरी तरह तौबा कर चुका है.

पीएम मोदी की डिजिटल डिप्लोमेसी का असर

UPI की इस सफलता के पीछे सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि एक मज़बूत विजन भी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद कई देशों के दौरों पर जाकर भारतीय पेमेंट सिस्टम की ताकत को दुनिया के सामने रखा. नतीजा आज सबके सामने है—फ्रांस से लेकर सिंगापुर और श्रीलंका से लेकर यूएई तक, कई देशों ने भारतीय UPI को हरी झंडी दिखा दी है. इसका सबसे बड़ा फायदा उन भारतीयों को मिल रहा है जो पढ़ाई, नौकरी या घूमने के लिए विदेश जाते हैं. अब उन्हें विदेशी मुद्रा यानी फॉरेन करेंसी के लिए भटकना नहीं पड़ता, बस फोन निकाला और पेमेंट कर दी.

आखिर क्यों बढ़ रहा है UPI का क्रेज?

यूपीआई की इस ग्रोथ के पीछे सबसे बड़ी वजह है इसकी सादगी. न कार्ड स्वाइप करने का झंझट, न ही पिन भूलने का डर (बायोमेट्रिक से भी काम चल जाता है). ऊपर से छोटे से छोटे दुकानदार का इसमें भरोसा जताना इस क्रांति को और बड़ा बना रहा है. आज हालत यह है कि भारत में ट्रांजैक्शन का मतलब ही UPI बन गया है.

दुनिया भर में आज भारत के इस डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का डंका बज रहा है. विकसित देश भी हैरान हैं कि कैसे भारत ने इतनी बड़ी आबादी को इतनी जल्दी डिजिटल पेमेंट से जोड़ दिया. दिसंबर के ये आंकड़े सिर्फ नंबर नहीं हैं, बल्कि ये बदलते और आत्मनिर्भर होते भारत की एक शानदार तस्वीर पेश करते हैं.

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-भारत एक्सप्रेस

Shreyansh Choubey

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