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दिल्ली हाईकोर्ट ने सैनिकों के लिए विकलांगता पेंशन को आवश्यक बताया, केंद्र की अपील खारिज

दिल्ली हाईकोर्ट ने सैन्य जीवन में तनाव एवं दबावों से जूझने वाले सैनिकों के लिए विकलांगता पेशन के महत्व को रेखांकित किया और दो सैनिकों को विकलांगत पेंशन देने के सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) के फैसले को बरकरार रखा और उसके खिलाफ दाखिल केंद्र सरकार की अपील खारिज कर दी.

जस्टिस सी. हरि शंकर एवं जस्टिस अजय दिगपॉल की पीठ ने कहा कि जब कोई सैनिक के रूप में देश की सेवा करने जाता है तो बीमारी और विकलांगता की संभावना एक पैकेज डील के रूप में सामने आती है. बहादुर सैनिक जिन परिस्थितियों देश की सेवा करता है, उसमें शारीरिक बीमारियों का शिकार होने की संभावना होती है. यह कभी-कभी अक्षम करने वाली हो सकती है जिससे वह सैन्य सेवा में बने रहने में असमर्थ हो जाता है. ऐसी दशा में निस्वार्थ सेवा करने वाले सैनिकों को देश जीवन पर्यत तक उसे आराम और सांत्वना प्रदान कर सकता है.

क्या सैनिकों की सेवा का मुआवजा संभव है?

अदालत ने कहा कि इसी कारण से विकलांगता पेंशन शुरू किए गए हैं, जिससे इस तरह के सैनिकों की मदद की जा सके. अदालत ने यह भी सवाल खड़ा किया कि क्या सैनिकों की सेवा को कभी भी सही मायने में मुआवजा दिया जा सकता है.

पीठ ने जॉन एफ कैनेडी के बयान को उद्धृत करते हुए कहा कि जब हम चिमनी के पास अपनी गर्म कैपुचीनो की चुस्की ले रहे होते हैं तो सैनिक सीमा पर बर्फीली हवाओं का सामना कर रहे होते हैं. वे एक पल की सूचना पर अपनी जान देने को तैयार रहते हैं. क्या राष्ट्र और हम मातृभूमि के इन सच्चे सपूतों को जो कुछ भी देते हैं, वह कभी भी बहुत अधिक हो सकता है? उसने यह टिप्पणी दो सैनिक गवास अनिल मैडसो व अमीन चंद के मामलों में की.

उन दोनों को 20 फीसदी विकलांगता के आधार पर सैन्य सेवा से छुट्टी दे दी गई थी. एक रिलीज मेडिकल बोर्ड (आरएमबी) ने कहा कि वे जीवन भर 20 फीसदी विकलांगता से पीड़ित रहेंगे, लेकिन विकलांगता पेंशन के हकदार नहीं हैं. सैनिकों ने उसे एएफटी में चुनौती दी जिसने सरकार से दोनों को विकलांगता पेंशन देने को कहा था. सरकार ने फिर उसे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.

ये भी पढ़ें: दिल्ली हाईकोर्ट का नोटिस: PG प्रवेश के लिए अतिरिक्त काउंसिलिंग न करने पर केंद्र और एम्स को जवाब देने का आदेश

-भारत एक्सप्रेस 

गोपाल कृष्ण

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