सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने शनिवार को भोपाल स्थित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में आयोजित जस्टिस जी.पी. सिंह चौथे स्मृति व्याख्यान में न्यायपालिका, लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विश्वविद्यालयों की भूमिका पर खुलकर अपने विचार रखे. उन्होंने कहा कि भारत में असहमति व्यक्त करने के लिए सार्वजनिक स्थान लगातार सिमटते जा रहे हैं और शांतिपूर्ण विरोध करने वाले छात्रों व नागरिकों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई चिंताजनक है. अपने संबोधन की शुरुआत में जस्टिस भुइयां ने कहा कि वह स्वयं सुप्रीम कोर्ट का हिस्सा हैं, लेकिन अदालत के कामकाज की आलोचना करने से कभी पीछे नहीं हटते.
उन्होंने कहा कि यदि न्यायपालिका आत्ममंथन नहीं करेगी तो व्यवस्था में सुधार संभव नहीं होगा. उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाली संस्थाएं नहीं हैं, बल्कि ऐसे स्थान होने चाहिए जहां छात्रों को सवाल पूछने, बहस करने और स्थापित विचारों को चुनौती देने की पूरी आजादी मिले. उनके अनुसार यदि छात्र सवाल पूछना छोड़ देंगे तो वे केवल किताबों की बातें दोहराने वाले बनकर रह जाएंगे. उन्होंने यहां तक कहा कि न्यायपालिका के फैसलों की भी आलोचनात्मक समीक्षा होनी चाहिए और किसी फैसले की आलोचना का मतलब न्यायाधीश की आलोचना नहीं होता.
जस्टिस भुइयां ने कहा कि भारत के राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय अच्छा काम कर रहे हैं, लेकिन यह भी सोचना होगा कि वैश्विक स्तर पर भारतीय विश्वविद्यालय पीछे क्यों हैं. उन्होंने सवाल किया कि जिन लोगों के पास संसाधन हैं, वे अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए विदेश क्यों भेजते हैं. उनका कहना था कि विश्वविद्यालयों को अकादमिक स्वतंत्रता के साथ नए और कठिन विषयों पर शोध और चर्चा का माहौल बनाना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि कुछ विश्वविद्यालयों में सवाल पूछने वाले छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाती है, जो शिक्षा के मूल उद्देश्य के विपरीत है. उनके मुताबिक विश्वविद्यालयों को असहज सवालों से डरने के बजाय उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए.
जस्टिस भुइयां ने हाल के दिल्ली मेट्रो मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) मामले के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और आर्बिट्रेशन समुदाय में चिंता पैदा की. उन्होंने कहा कि इसके बाद सरकार और कई सार्वजनिक उपक्रमों ने बड़ी राशि वाले विवादों में मध्यस्थता से दूरी बनाने की नीति अपनाई, जो भारत को वैश्विक आर्बिट्रेशन हब बनाने के लक्ष्य के विपरीत है. उन्होंने कहा कि यदि अदालतों में आर्बिट्रेशन से जुड़े मामलों का निस्तारण तीन से पांच वर्ष तक चलता रहेगा और नीतियां भी प्रतिकूल होंगी, तो विदेशी निवेशकों का भरोसा कैसे बढ़ेगा.
जस्टिस भुइयां ने संविधान में शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को लोकतंत्र की आधारशिला बताया. उन्होंने कहा कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीन पैरों वाले स्टूल की तरह हैं. यदि इनमें संतुलन बिगड़ता है तो पूरी व्यवस्था कमजोर हो जाती है.
उन्होंने बिना नाम लिए पूर्व प्रधान न्यायाधीश के राज्यसभा जाने और न्यायपालिका व कार्यपालिका के बीच “पुल” बनने संबंधी बयान पर भी सवाल उठाए. उनके अनुसार यह शक्तियों के पृथक्करण के संवैधानिक सिद्धांत के विपरीत है.
उन्होंने कहा कि केसवानंद भारती का फैसला भारतीय संविधान की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक व्याख्याओं में से एक है, जिसने यह सिद्धांत स्थापित किया कि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती. उन्होंने कहा कि इस फैसले की वैधता पर सवाल उठाना उचित नहीं है क्योंकि इसी सिद्धांत ने भारतीय लोकतंत्र को मजबूत किया है.
न्यायपालिका को जनता का विश्वास बनाए रखना होगा. जस्टिस भुइयां ने कहा कि न्यायपालिका के पास न तो तलवार है और न ही धन की शक्ति. उसकी सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास है. उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को अपनी महानता का प्रमाण स्वयं नहीं देना चाहिए, बल्कि जनता तय करेगी कि वह कितनी विश्वसनीय है. उन्होंने यह भी कहा कि अदालतों को समय-समय पर आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या वे प्रवासी मजदूरों, बुलडोजर कार्रवाई और अन्य संवेदनशील मामलों में और बेहतर भूमिका निभा सकती थीं. उन्होंने बुलडोजर कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की सराहना करते हुए कहा कि यह फैसला दो वर्ष पहले आना चाहिए था और इसके बावजूद जमीनी स्तर पर इसका प्रभाव बहुत सीमित दिखाई देता है.
अपने संबोधन के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से में जस्टिस भुइयां ने कहा कि भारत में अलग राय रखने वालों के लिए सार्वजनिक स्थान लगातार सिमटते जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना और अपनी बात रखना नागरिकों का मौलिक अधिकार है तथा बहस और असहमति लोकतंत्र की आत्मा हैं.
उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण की मांग करने वाले लोगों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया जाता है. विश्वविद्यालय परिसरों में विरोध करने वाले छात्रों को गिरफ्तार किया जाता है, उन्हें लंबे समय तक जमानत नहीं मिलती और निलंबन के खिलाफ भी उन्हें अदालतों का दरवाजा खटखटाना पड़ता है.
उनके अनुसार अदालतें अंततः राहत तो देती हैं, लेकिन कई बार वह राहत इतनी देर से मिलती है कि उसका महत्व कम हो जाता है. उन्होंने यह भी चिंता जताई कि जमानत देते समय लगाई जाने वाली कठोर शर्तें कहीं नागरिकों को असहमति व्यक्त करने से हतोत्साहित तो नहीं कर रहीं.
जस्टिस भुइयां ने एक मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ युवाओं को गंगा किनारे रोजा खोलते समय चिकन बिरयानी खाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. उन्होंने कहा कि चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है और न ही ऐसा कोई कानून है जो गंगा के किनारे इसे प्रतिबंधित करता हो. इसके बावजूद उन युवाओं को तीन महीने तक जेल में रहना पड़ा और उसके बाद जमानत मिली. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ऐसे मामलों में लोगों को महीनों तक जेल में रखना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है.
अपने पूरे व्याख्यान में जस्टिस उज्जल भुइयां ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, नागरिक स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक असहमति और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा को भारतीय लोकतंत्र की मजबूती के लिए सबसे महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि यदि न्यायपालिका, विश्वविद्यालय और अन्य संस्थाएं आत्ममंथन करती रहें और जनता का विश्वास बनाए रखें, तभी संविधान की मूल भावना सुरक्षित रह सकती है.
-भारत एक्सप्रेस
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