सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली जिमखाना क्लब के सरकारी अध्यक्ष मलय सिन्हा को अवमानना याचिका में नोटिस जारी किया है. क्लब पर भ्रष्टाचार, फर्जी सदस्यता, सीसीटीवी नष्ट करने, गवाहों को धमकाने और वित्तीय घोटालों के आरोप पहले से ही लगे हुए हैं. सबसे अहम बात यह है कि क्लब के घोटालों की जांच के लिए मनोनीत सरकारी निदेशकों ने आज घोटाले की जांच की और ना ही किसी के खिलाफ कार्रवाई की है. इससे भी अहम बात यह है कि इन पर क्लब का पैसा उड़ाने और खुद भ्रष्टाचार के आरोप भी लग रहे हैं.
क्लब के पूर्व सीईओ आशीष खन्ना की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सी.ए. सुंदरम ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि एनसीएलएटी द्वारा 21 अक्टूबर 2024 को दिए गए आदेश, जिसने एनसीएलटी 2022 के निर्देशों को बरकरार रखा था, का उल्लंघन किया जा रहा है. इन निर्देशों में तीन महीने पर एक बार Action Taken Report दाखिल करना, वित्तीय रिपोर्ट देना और 30 जून 2025 तक चुनाव कराना शामिल था. लेकिन सरकारी मेहरबानी से यहां तैनात निदेशकों ने ऐसा नहीं किया.
खास बात यह है कि इस मामले की सुनवाई के दौरान एनसीएलएलटी ने 13 अगस्त को तथ्यों को नजरअंदाज कर आशीष खन्ना की अवमानना याचिका को ख़ारिज कर दिया था. एनसीएलएटी और एनसीएलटी क्लब से जुड़े मामलों में तथ्यों की अनदेखी भी हो रही है. जिसके आधार पर खन्ना ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. उनका आरोप है कि आईबी से विशेष निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए जिमखाना के अध्यक्ष मलय सिन्हा के अलावा निदेशक आशीष वर्मा और नलिन कोहली की अनुशंषा पर एक वकील को 6 करोड़ रुपये तो केवल फीस के तौर पर ही चुका दिए गए हैं. उनकी याचिका पर जस्टिस जे.के. महेश्वरी और विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने 11 सितंबर 2025 को छह सप्ताह में जवाबी दाखिल करने का आदेश दिया था.
जून 2021 में क्लब के छह पूर्व निदेशकों और चार कर्मचारियों के खिलाफ 45 करोड़ रुपये की वित्तीय गड़बड़ी और चोरी के मामले में एफआईआर दर्ज हुई थी, जिसे अदालत के आदेश पर आर्थिक अपराध शाखा (EOW) के हवाले किया गया. 2022 की फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट में 46 करोड़ रुपये के 20 निवेशों का हवाला दिया गया, जिन्हें क्लब की जनरल कमेटी की मंजूरी के बिना किया गया था. इसमें ‘हितों के टकराव’ की ओर भी इशारा किया गया जिसमें आरोपी निदेशक मनदीप कपूर के किरायेदार राहुल शर्मा को निवेश सलाहकार नियुक्त किया गया था.
पटियाला हाउस अदालत्त के मजिस्ट्रेट यशदीप चहल ने 29 मई 2024 के आदेश में गवाहों की सुरक्षा को लेकर दिल्ली पुलिस की ईओडब्ल्यू इकाई की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की थी और विशेष आयुक्त व संयुक्त आयुक्त को निष्पक्ष जांच करने के निर्देश दिए थे. आरोप है कि सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी मलय सिन्हा ने अदालत के आदेशों की अनदेखी करने के लिए ईओडब्ल्यू को निर्देशित किया और जांच के नाम पर खानापूर्ति की गई. एनसीएलएटी ने 21 अक्टूबर 2024 के अपने फ़ैसले में इस आदेश और गवाहों के बयान को भ्रष्टाचार साबित करने के साक्ष्य के रूप में उद्धृत किया. वहीं शिकायतकर्ता श्रीमती निधि सपरा ने कहा कि ‘एनसीएलटी तो केवल ईओडब्ल्यू एफआईआर के आरोपी गौरव लिबरान और मनदीप कपूर की रक्षा कर रहा है.’
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-भारत एक्सप्रेस
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