नई दिल्ली: नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट-पोस्टग्रेजुएट (NEET-PG) परीक्षा में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और वास्तविक प्रश्नपत्र व आंसर-की सार्वजनिक करने की मांग को लेकर दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है. जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए. सुनवाई के दौरान जब बोर्ड के वकील ने अमेरिकी चिकित्सा परीक्षा ‘USMLE’ मॉडल का हवाला देते हुए प्रश्नपत्र गोपनीय रखने का तर्क दिया, तो पीठ ने उसे सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि “USMLE हमारा मॉडल नहीं है.” कोर्ट ने एनबीईएमएस को निर्देश दिया कि वह हलफनामा दाखिल कर बताए कि छात्रों के लिए प्रश्नपत्र और उत्तर कुंजी जारी करने में क्या व्यावहारिक बाधा है.
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सत्यम सिंह राजपूत ने दलील दी कि परीक्षा के बाद प्रश्नपत्र और आधिकारिक उत्तर कुंजी जारी न करना मूल्यांकन प्रक्रिया को संदेह के घेरे में खड़ा करता है. इस पर खंडपीठ ने एनबीईएमएस से सीधा सवाल किया कि जब देश की अन्य राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में उत्तर कुंजी और प्रश्नपत्र सार्वजनिक किए जाते हैं, तो मेडिकल पीजी परीक्षा में इस पारदर्शिता से परहेज क्यों किया जा रहा है? कोर्ट ने कहा कि छात्रों को अपने प्रदर्शन का सटीक आकलन करने और मूल्यांकन पर आपत्ति दर्ज कराने का अधिकार मिलना चाहिए.
मामले में खाली सीटों को भरने के लिए कट-ऑफ परसेंटाइल घटाए जाने की नीति को लेकर भी तीखी बहस हुई. केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में बताया कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने संभावित खाली सीटों की बड़ी संख्या को देखते हुए कट-ऑफ कम करने का निर्णय लिया है. सरकार के अनुसार, इस फैसले से तीसरे राउंड की काउंसलिंग के लिए 1,00,054 अतिरिक्त उम्मीदवार पात्र होंगे, जिससे कुल योग्य अभ्यर्थियों की संख्या बढ़कर 2,28,170 पहुंच जाएगी.
दूसरी ओर, सामाजिक कार्यकर्ता हरिशरण देवगन, डॉ. सौरव कुमार, डॉ. लक्ष्य मित्तल और डॉ. आकाश द्वारा दायर जनहित याचिका में कट-ऑफ घटाने की अधिसूचना को मनमाना और असंवैधानिक करार देते हुए रद्द करने की मांग की गई है. याचिका में कहा गया कि सामान्य वर्ग के लिए कट-ऑफ 50 से घटाकर 7 परसेंटाइल और आरक्षित वर्ग के लिए 40 से घटाकर शून्य परसेंटाइल करना अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) तथा NMC एक्ट 2019 का खुला उल्लंघन है. याचिकाकर्ताओं ने आगाह किया कि पोस्टग्रेजुएट स्तर पर मेरिट से समझौता कर शून्य अंक पाने वालों को विशेषज्ञ डॉक्टर बनाने की अनुमति देना देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य और मरीजों की जान के साथ सीधा खिलवाड़ है.
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